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बच्चों से संवादः ‘कहीं खो न जाए ख़ुशी’

मैं सातवीं क्लॉस बच्चों से बात करने के लिए अंग्रेजी के कालांश में गया। उनसे बात होने लगी कि किस-किस को अंग्रेजी पढ़नी आती है तो कई सारे बच्चों नें कहा कि हमारी क्लॉस में कुछ बच्चों को तो ABCD…लिखना भी नहीं आता। मुझे उनकी इस बात पर यकीन नहीं हुआ। मैने उन दो बच्चों में से एक सुयश को अपने पास बुलाया और चॉक देकर ब्लैकबोर्ड एबीसीडी लिखने के लिए कहा। तो सुयश कुछ शब्द लिखने के बाद ठिठक गया।
लिखने के दौरान उसके गलती करने पर कुछ बच्चे हँस भी रहे थे। मैनें कक्षा के सभी बच्चों से पूछा कि अगर तुम्हारे किसी दोस्त का पाँव केले के छिलके पर पड़कर फिसल जाए तो क्या करोग? क्या आप केवल हँसकर रुक जाओगे? या अपने दोस्त को उठाने के लिए आगे भी आओगे? तो कक्षा के बच्चों का जवाब था कि हम अपनी हँसी तो रोक नहीं सकते। लेकिन दोस्त उठाने के लिए आगे भी आएंगे। मुझे बच्चों के जवाब में सोचने की परिपक्वता झलकती दिखी।
 
मैंने ख़ुद सुयश की मदद न करके क्लॉस के बच्चों से उसे A,B,C,D… लिखने में सहायता करने के लिए कहा। लेकिन एक शर्त थी कि उन्हें केवल उसे इशारे से बताना है। इस दौरान उनको बोलना नहीं है। सुयश उनकी सहायता से अंग्रेजी के अक्षरों को बोर्ड पर लिखने लगा। वह एक शब्द लिखता और मदद के लिए मुड़कर पीछे देखता। उसको असहाय देखकर मुझे दुःख हो रहा था, तो वहीं दूसरी तरफ मैंं उसके कोशिश करने के जज्बे को सलाम कर रहा था।
एक सातवीं कक्षा के बच्चे का अपने साथियों की सहायता से एबीसीडी लिखने की कोशिश करना मेरे लिए तो बहुत बड़ी बात थी। कक्षा के लड़के उसे इशारे से समझा रहे थे कि J,K,L,M.. कैसे लिखना है? लेकिन कक्षा में बैठी लड़कियों की तरफ़ सुयश ध्यान नहीं था। मैनें सुयश को अब केवल लड़कियों की सहायता से आगे के अक्षरों को पूरा करने की बात कही। ताकि ब्लैकबोर्ड पर आने वाले अक्षरों और सुयश की कोशिश में उनकी भागीदारी भी शामिल हो सके। अब सातवीं कक्षा की लड़कियां अपने सहपाठी को पूरी तन्मयता से विभिन्न अक्षरों की बनावट के बारे में बता रही थीं। उनका समझाने का तरीका और सुयश की उलझन को कम करने का उत्साह देखने लायक था।
 
इस तरह से मेरे न्यूनतम हस्तक्षेप और उत्साहवर्धन के साथ यह पूरी प्रक्रिया संपन्न हुई। मैने सुयश के चेहरे पर संतोष और खुशी का भाव देखा। A से Z तक लिखने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद सभी बच्चों से सुयस के लिए ताली बजाने की बात कही। ताकि सुयश की ख़ुशी कुछ सहपाठियों के उपेक्षापूर्ण कहकहों में गुम न हो जाए। इसके बाद मैने सारे बच्चों से पूछा कि सुयश का एबीसीडी लिखना सबको कैसा लगा? कुछ बच्चों ने कहा कि उनको बुरा लगा है। मैंने उन बच्चों की राय जानने की कोशिश करी कि उनको बुरा क्यों लगा? उनसे मिले जवाब बहुत सी महत्वपूर्ण बातों को सामने लाते हैं।
 
कक्षा के बच्चों का कहना था कि सुयश अपनें मन से नहीं लिख रहा था, वह लिखनें में गलतियां कर रहा था, वह बहुत बड़े अक्षर लिख रहा था, उसके लिखे अक्षर तिरछे थे, वह लोगों से पूछ-पूछ कर लिख रहा था, वह हर अक्षर को बहुत पास-पास लिख रहा था, उसनें एबीसीडी लिखने में बहुत देर लगाई। इस कारण से सुयश के एबीसीडी पूरा लिखने के बावजूद उनको अच्छा नहीं लग रहा था।
इसके बाद मैनें सुयश से फिर पूछा कि उसको कैसा लग रहा है तो उसका जवाब बहले जैसा ही था कि उसको अच्छा लग रहा है।
 
इसके बाद मैने बाकी बच्चों से पूछा कि वे अपनी राय बताएं कि सुयश का एबीसीडी पूरा लिखना उन्हें क्यों अच्छा लगा? उनके जवाब भी बेहद रूचिकर थे। वह भी एक से बढ़कर। उनका कहना था कि सुयश ने सबकी सहायता लेकर पूरा लिखा इसलिए उन्हें बहुत अच्छा लगा। कक्षा की एक लड़की ने कहा कि सुयश ने हमारा इशारा समझा और अभ्यास करके लिखा इसलिए उसे अच्छा लगा। वहीं कक्षा की एक अन्य लड़की ने कहा कहा कि उनको भी बोलने का मौका मिला इस कारण सुयश के एबीसीडी पूरी लिखने पर वह बहुत खुश है। बाकी बच्चों का जवाब था कि सुयश ने कोशिश करके सही-सही लिखा इसलिए उनको सुयश का लिखना बहुत अच्छा लगा।
सभी बच्चों की राय जानने के बाद मैनें कहा कि मैं अपनी राय कल बताऊंगा तो सब एक साथ बोले नहीं…। जब दोबारा मैने अपनी राय कल बताने की बात कही तो उन्होने कहा कि नहीं आज ही बताइए।
 
तो मैने कहा चलो जब तुम लोग जानना ही चाहते हो तो मैं भी अपने मन की बात बताता हूं कि मुझे सुयश का एबीसीडी पूरा करना क्यों अच्छा लगा?
जवाब से पहले मैनें उनसे फिर पूछा कि सुयश किस क्लॉस में पढ़ता है ? तो वे सारे एक साथ बोले सातवीं में। मैने पूछा कि सुयश को A,B,C,D से Z लिखने में किस क्लॉस के बच्चों नें मदद की? तो फिर से जवाब मिला कि सातवीं क्लॉस के। मैने कहा कि इसीलिए मुझे सुयश का एबीसीडी से लेकर जेड तक लिखना बहुत अच्छा लगा। उसके लिखनें में सारे बच्चों नें सहयोग दिया। दूसरी बात सुयश ने भी कोशिश की और हार नहीं मानी। इस कारण से भी मुझे उसका लिखना पसंद आया।
 
इस पूरी बातचीत के बाद मैनें फिर पूछा कि इतनी सारी बात करके किसको अच्छा लगा? तो जवाब में सारे हाथ ऊपर थे। उस वक़्त मुझे महसूस हुआ कि पूरी क्लॉस भावना के स्तर पर एक जैसा महसूस कर रही थी और पूरा संवाद एक सार्थकता के साथ पूरा हुआ। इसके बाद मैने उनसे कहा कि जिस तरह से हमने आज सुयश को एबीसीडी लिखने में सहायता की है, उसी तरीके से हमें पढ़ाई में कमज़ोर बाकी साथियों की भी मदद करनी चाहिए ताकि पूरी क्लॉस के बच्चे पढ़ाई में अच्छे हो सकें। नहीं ज्यादा तो जाते-जाते पढ़ना और लिखना सीख सके जो उनके आगे की जिंदगी में बहुत काम आएगा।
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5 Comments on बच्चों से संवादः ‘कहीं खो न जाए ख़ुशी’

  1. बहुत-बहुत शुक्रिया संगीता जी।

  2. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 01-03 -2012 को यहाँ भी है ..शहीद कब वतन से आदाब मांगता है .. नयी पुरानी हलचल में .

  3. बृजेश जी , मैंने भी कुछ समय तक शिक्षण कार्य किया है ॥ और इस तरह की भागीदारी मैंने भी बच्चों से करवाई है … बच्चे जब खुद ऐसी क्रियाओं में भाग लेते हैं तो उनका उत्साह देखते ही बनता है … इसी लिए मुझे आपकी इस तरह की पोस्ट पढ़ने में बहुत आनंद आता है … शुक्रिया

  4. बहुत-बहुत शुक्रिया संगीता जी। मैं बच्चों से संवाद की प्रक्रिया को समझने की कोशिश कर रहा हूं ताकि इसे और सहभागी बनाया जा सके।

  5. शिक्षण को रोचक बनाने के अच्छे गुर

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