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डाइट प्रिंसिपल आभा मेहता से एक मुलाकात

वर्तमान में “डाइट” डूंगरपुर की प्रिंसिपल आभा मेहता से मिलना मेरे लिए एक यादगार अनुभव रहा। वहां का माहौल बहुत सकारात्मक है। उनका काम के प्रति रुझान और रुचि देखकर अच्छा लगा। कुछ दिन पहले मेरे कुछ साथी मैम से मिलकर आए थे।
ऐडेप्स के नाम से एक योजना का शुभारंभ राजस्थान के डूंगरपुर जिले के पच्चीस स्कूलों में प्रयोग के स्तर पर शुरू किया गया है। जिसका भविष्य में अन्य स्कूलों तक प्रसार होना लगभग तय है। इसके लिए पढ़ाई को गतिविधि आधारित बनाने के साथ-साथ बच्चों को सीखने का एक माहौल उपलब्ध कराने पर अधिक ध्यान दिया जाएगा। जिसके लिए अध्यापकों के सहयोग से शिक्षा के स्तर में सुधार लाने का प्रयत्न किया जाएगा।
इस कार्यक्रम में मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय द्वारा तय किए गए मानदण्डों के अनुरूप सर्वशिक्षा अभियान व जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान तथा यूनिसेफ के सहयोग से मूर्त रूप देने का प्रयास किया जा रहा है। इसका मुख्य मकसद प्राथमिक स्कूलों को मॉडल स्कूलों के रूप में विकसित करना है। ताकि प्रतिस्पर्धाविहीन स्थिति से गुजर रहे अध्यापकों व स्कूलों को आगे आने के लिए प्रेरित किया जा सके।

हमारी बातचीत स्कूल के प्रधानाध्यापकों के व्यवहार, व्यवस्था के महत्वपूर्ण बिंदुओं से होते हुए , प्रशासनिक व शैक्षणिक  मॉनिंटरिंग की स्थिति , जिम्मेदारियों के प्रति नजरिए से लेकर, भाषा व बोली के सवालों से होते हुए बहुत आगे तक गुजरी। मुलाकात के मुख्य बिंदुओं की तरफ वापस  आते हैं।

1.कार्य़क्रम का प्रारंभ करने से पहले हमने बीइओ और आरपी की ट्रेनिंग एसआईइआरटी में रखी थी ताकि उस स्तर से लोगों का सहयोग प्राप्त किया जा सके। लेकिन उस स्तर से बहुत कम रुचि देखने को मिली। जिसे भविष्य में बढ़ाने की संभावनाओं पर सोचने की जरूरत है। ताकि एक बेहतर सपोर्ट सिस्टम विकसित हो सके। हेडमास्टर को आरपी से , आरपी को एबीइओ से, एबीओं को डीईओ से सपोर्ट मिल सके। इस पूरी व्यव्स्था से डाइट को सपोर्ट मिले और अगर डाइट कोई काम कर रही है तो उसको एसआईइआरटी से पूरा सहयोग मिले। जहां पर एसआईइआऱटी को लगता है कि वह मदद करने में सक्षम नहीं है तो एनसीईआरटी से सहयोग लेकर हमारी मदद के ताकि हम हम अपने काम को सक्रियता से कर पाएं। काम में आने् वाली किसी तरह की मुश्किल का शीघ्रता से समाधान खोजा जा सके।

2. उन्होनें बताया कि प्रारंभ में प्रधानाध्यापकों को एडेप्स के लिए प्रेरित करना एक बड़ी चुनौती थी। इसलिए हमनें सबके साथ गुजरात के स्कूलों की विजिट करने के साथ-साथ वहां के प्रधानाध्यापकों से इनके संवाद का कार्यक्रम रखा। इनके सवाल थे कि क्या आपको भी डाक बनानी पड़ती है, जनगणना का काम करना पड़ता है तो उनके जवाब थे कि हां करना पड़ता है। आप कैसे अपने स्कूलों को इतना व्यवस्थित रख पाते हैं। तो जवाब मिला कि यहां का सपोर्ट सिस्टम बहुत अच्छा है। किसी परेशानी का निदान करने के लिए एख प्रभावशाली व्यवस्था काम कर रही है। जिसके कारण हम अपने काम को बेहतर ढंग से कर पा रहे हैं। वहां की विजिट के बाद हमनें यहां लागू हो सकने वाली गतिविधियों का चयन किया और ऊपर से अनुमोदन लिया। अब इससे जुड़े प्रधानाध्यापकों में सकारात्मक  बदलाव आ रहा है। बच्चों की भी स्कूल में दिलचस्पी बढ़ रही है। वै भी बढ़चढ़कर स्कूल में होने वाली गतिविधियों में अपनी भागीदारी दर्ज करा रहे हैं।

3. हम उनको समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि एडेप्स को नई गतिविधि की तरह मत देखिए। आपकी कुछ जिम्मेदारियां हैं। इसमें उन्हीं को शामिल किया गया है। इस तरह के कार्यक्रमों से आपकी क्षमता में इजाफा होगा । जिसका फायदा बच्चों तक पहुंचेगा। इसका इंचार्ज किसी को मत बनाइेगा। इसको लागू करने की जिम्मेदारी पूरे स्टॉफ की है। इसालिए हमने हर स्कूल के दो-दो अध्यापकों को ट्रेंनिंग के लिए बुलाया ताकि उनके स्तर पर भी इसकी स्वीकार्यता सुनिश्चित की जा सके। हमनें स्टॉफ मीटिंग को सक्रिय बनाने के भी प्रयास किए हैं। ताकि उसके माध्यम से स्कूल के अध्यापकों को बेहतर दिशा में सोचने हेतु प्रेरित किया जा सके।

4. इसके साथ-साथ मैनें क्यों ? वाले पहलू पर बात करने की जरूरत पर जोर दिया। अगर हम कोई कार्यक्रम या गतिविधि लागू कर रहे हैं तो अध्यापकों के अलावा बच्चों से भी बात हो। उनको बताया जाय कि हम इस गतिविधि को क्यों कर रहे हैं हमें इससे क्या फायदा होने वाला है। अगर हम उनको समझाने की कोशिश करेंगे तो उनके सवालों की दिशा बदल जाएगी। जो काम को आसान और प्रभावशाली बनाने के इर्द-गिर्द घूमेगी।

5. अध्यापकों में भी पढ़ने की प्रवृत्ति विकसित करने की कोशिश की जाए। ताकि उनको वर्तमान में हो रहे नवीन प्रयोगों से रूबरू करवाया जा सके। पढ़ने से उनको अपना काम ज्यादा बेहतर ढंग से करने के लिए विचार भी मिलेंगे। वे यथास्थिति से बाहर आकर चीजों के बारे में सोचना शुरू करेंगे। जो बदलाव की प्रक्रिया में उनको संबल प्रदान करेगा।

6. हमने पासबुक के प्रभाव पर भी बात करी कि कैसे यह बच्चों के सोचने की क्षमता को प्रभावित कर रही है। इसके बारे में गंभीरता से सोचने की जरूरत है ताकि कोई विकल्प खोजा जा सके। इस तरह तमाम मुद्दों को छूने और उसके बारे में अपनी समझ को साफ करने का मौका मिला। इसका एक सुझाव आया कि बच्चे और अध्यापक मिलकर सवालों के जो जवाब तैयार करें उसे आगे के सत्र के लिए सहायक सामग्री की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

आभा जी ने अपने कार्य़काल के दौरान कई प्रयोग किए “कर्म” विच्छीवाड़ा में उन्होनें सक्रियता से काम किया। जो कमजोर बच्चों को जीरो पीरियड बनाकर सपार्ट देने के कांसेप्ट पर काम करता है। इसमें बच्चों को उनकी बोली “बागड़ी” में पढ़ाना भी शामिल है। ताकि उनके स्थानीय ज्ञान व जानकारी को सीखने की प्रक्रिया में सहायक बनाया जा सके। इसके बाद उन्होनें “एडेप्स” ( एडवांसमेंट इन एजूकेशन परफोरमेंस थ्रू टीचर्स सपोर्ट ) की क्रियान्विति का रोडमैप और गाइड लाइन बनाने की आपने जिम्मेदारी ली है। बच्चों के लिए बालगीत की सीडी बनवाने का सुंदर काम आपने किया।

स्थानीय परिवेश , भाषा , बोली और संस्कृति को एक समग्रता में देखने का उनका नजरिया काबिल-ए-तारीफ है। पिछले साल आपने प्रायवेट स्कूलों में बच्चों को प्रवेश देने के लिए हेल्पलाइन का प्रारंभ किया था।वर्तमान में पाठ्यक्रम में बदलाव के बाद से हेल्प लाइन शुरू करने का काम किया। जिस पर अध्यापक अपने सवाल पूछ सकते हैं। जिसका जवाब चौबीस घंटे में देने की कोशिश की जाएगी। तमाम अभिनव प्रयोगों का कांरवा अभी सफर में है। जिसे सहयोग की जरूरत है। आभा जी का एक सपना है कि शिक्षा में अगर सिस्टम अप्रोच के तहत सबको साथ लेते हुए, सारी व्यवस्था को मद्देनजर रखते हुए काम किया जाय तो कोई बात बन सकती है। ऐसा करने के लिए हमें कुछ कड़े फैसले लेने होंगे। इस बात की जरूरत पर भी वे जोर देती है। ऐसा करने में कुछ साल तो लगेंगे। तब तक लगातार कोशिश जारी रखनी होगी।
मिलने का अवसर देने के लिए आभा जी का बहुत-बहुत आभार।
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