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शिक्षण प्रक्रिया पर कुछ विचार…

कक्षा में पहुंचने के बाद बच्चों के साथ हम कैसे पेश आते हैं?  उनको क्या पढ़ाते हैं ? अपनी बात उन तक कैसे पहुंचाते हैं ? किसी स्कूल में पढ़ाई को क्लॉस रूम (कक्षा ) के संदर्भ में देखने हेतु तीनों सवाल बहुत महत्वपूर्ण हैं। अगर तीनों सवालों को कुछ शब्दों की आधारशिला पर रखकर देखा जाए तो तीन शब्द हमारे सामने आते हैं। मनोविज्ञान, विषयवस्तु और संचार। 
तीनों शब्दों के समुच्चय को शिक्षण प्रक्रिया के संदर्भ में विश्लेषित करके कक्षा में शिक्षण प्रक्रिया को बारीकी से समझा जा सकता है। एक अध्यापक के लिए बाल मनोविज्ञान की समझ बहुत जरूरी होती है। इसके साथ-साथ उस समझ का गहराई में उतरना और व्यावहारिक अनुभव से संपृक्त होना बहुत जरूरी है। अपने मनोविज्ञान की अध्यापिका से मिलने के बाद मुझे सुझाव मिला कि मैं बाल मनोविज्ञान से जुड़ी कुछ किताबें जरूर पढ़ूं ताकि अपनी समझ को पुख़्ता बना सकूं। 
शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावी बनाने में विषयवस्तु (कंटेंट) की भी महत्वपूर्ण भूमिका होता है। हर विषय को पढ़ाने का अपना विशिष्ट तरीका हो सकता है।एक शिक्षक अपनी क्षमता व बच्चों की रुचि को ध्यान में रखते हुए कुछ नए तरीके भी ईजाद कर सकता है। मसलन कविता, कहानी, शब्द-चित्र, समूह-चर्चा व तात्कालिक लेखन व तात्कालिक विचारों का आमंत्रित करते हुए बात आगे बढ़ाई जा सकती है। सवाल-जवाब का तरीका भी एक सुंदर विकल्प हो सकता है। यह  बच्चों को सोचने के लिए प्रेरित करने का सबसे बेहतर तरीका है। विषयवस्तु के अनुरूप माध्यम का चयन किया जा सकता है। ताकि शिक्षण प्रक्रिया को और भी प्रभावी बनाया जा सकता है। विज्ञान, गणित , भाषा , कला व सामाजिक विषय पढ़ाने के संदर्भ में इसको बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।
अंततः बात संचार पर आकर रुकती है। कक्षा में हमारे संचार करने के कौशल पर निर्भर है कि बच्चों को हम अपनी बात किस गहराई में समझा सकते हैं। संचार की सबसे खास विशेषताओं मौखिक व लिखित के साथ-साथ चित्रों का समावेश होना चाहिए। बच्चों के साथ शुरुआती स्तर पर करते समय इशारों की भाषा का प्रयोग करना बहुत सहायक होता है। खेल के माध्यम से निर्देशों को समझने की ललक भाषा को सीखने में मदद करती है। बातचीत के दौरान प्रयोग किए गए शब्दों के अर्थ निर्माण में एक रोचक भूमिका अदा करती है। 
आज पहली-दूसरी के बच्चों के साथ शेर-बकरी का खेल खेलते हुए, इस बात को गहराई से महसूस कर पा रहा था। संचार की प्रक्रिया अगर दो-तरफा हो तो ज्यादा बेहतर होता है। छोटे बच्चों के साथ यह बात विशेष तौर पर लागू होती है। किसी संवाद का संचार प्रारंभ में हो सकता है कि एक-तरफा हो। मसलन कहानी सुनाते समय। लेकिन इसको भी हुंकारी भरवाकर दो-तरफा बनाया जा सकता है। इसके अलावा कहानी सुनाने के बाद उस पर बच्चों को अपनी बात रखने का मौका देकर भी उसको दो-तरफा बनाया जा सकता है। स्थानीय परिवेश का ध्यान रखते हुए भाषा का प्रयोग प्रभावी ढंग से अपनी बात को उन तक पहुंचानें में मदद करता है। 
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2 Comments on शिक्षण प्रक्रिया पर कुछ विचार…

  1. उपयोगी अवलोकन..

  2. उपयोगी अवलोकन..

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