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भाषा सीखने की रोमांचक प्रक्रिया

प्रकृति से संवाद की एक तस्वीर 

हम खुली आंखों से दिखने वाली दुनिया को इतना अमूर्त बना देते हैं कि वह हमारे समझ के दायरों से परे हो जाती है। हम अपने आसपास की प्रकृति को व मानवीय गतिविधियों को सहजता से एक अर्थ दे पाते हैं। 

लेकिन बात जब घटना के घटित होने की प्रक्रिया की होती है तो हमारी पलकें नींद से बोझिल होने लगती हैं। हमारा दिमाग ट्रैक से थोड़ी देर के लिए उतर जाता है। हम तमाम प्रतीकों और आवाजों से अपने लिए कोई मतलब नहीं निकाल पाते। हमारे सोचने की क्षमता और बुद्धिमत्ता पर उलझन का कोहरा छा जाता है।

इसी बिंदु पर शिक्षक और छात्रों के बीच का फासला बहुत कम हो जाता है। आसान शब्दों में बड़े बच्चों की तरह उलझकर रह जाते हैं। कई विचारकों नें प्रकृति को एक शिक्षक के रूप में मान्यता दी है। जो हमें खुद को समझने की भाषा भी देती है। इसके साथ-साथ अपनी चित्रात्मक, ध्वन्यात्मक और रूपक भाषा में समझाने की कोशिश भी करती है। ऐसे संवाद के क्षणों में वह हमें मंत्रमुग्ध भी करती है। इसी कारण से रुसों जैसे दार्शनिकों नें प्रकृति की ओर वापस लौटने की बात कही थी। रूसों कहते हैं कि बच्चा प्राकृतिक रूप से सीखने वाला है। इसके साथ-साथ वह ज्ञान का स्वाभाविक निर्माता भी है।

भाषा पर होने वाली बहस बहुत खतरनाक तरीके से उलझ गई थी। शब्दों के साथ खेलने वाले लोग शब्दों के जाल में उलझकर रह गए थे। सारा विमर्श कांव-कांव को समझने की कोशिश जैसी कवायद सा लग रहा थी। उस कमरे में बैठना मुश्किल हो रहा था। बच्चे के रोने से लेकर, शब्द, बोली तक का जिक्र हो रहा था। सारी बौद्धिक समझ बच्चे की तुतलाहट (बैबलिंग) में उलझकर रह गई थी। मैं वहां से ताजी हवा में राहत की सांस लेने के लिए कमरे से बाहर निकला।

मेरा सारा ध्यान कैंपस में लगे नारियल के पेड़ को निहारने लगा। उसके पत्ते की की बनावट, पेंड़ के बढ़ने का सिलसिला, धूप, छाया, गुरुत्वाकर्षण, खाद-पानी से पोषण पाने की प्रक्रिया….और इन सारी गतिविधियों के अंतर्संबंधों का समच्चय मन में पनपने लगा। सारे अमूर्त संप्रत्यय मूर्त होने लगे। जो बात लोग पिछले कुछ घंटों से समझने के लिए माथापच्ची में उलझे हुए थे, खुले आसामान के नीचे खड़ा नारियल का पेड़ मुझे सहजता से समझा रहा था।

मुझे लगा कि चित्र, ध्वनि, अनुभूति, कुछ कहने की ललक में प्रतीकों को गढ़ने की कोशिशों में भाषा निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई होगी। ताकि लोग आपस में बातचीत, संवाद, विमर्श कर सकें। अपनी बातों को एक दूसरे तक काफी स्पष्टता के साथ एक-दूसरे तक ज्यों का त्यों समझा सकें। इसके साथ-साथ उसे भविष्य में संदर्भ के रूप में संभालकर रखने में भी सहूलियत का रास्ता खोल सकें।
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