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कैसे गठित होती है स्कूल में एसएमसी….

माथापनवा स्कूल में प्रधानाध्यापक और एसएमसी के सदस्य
आज स्कूल में एसएमसी का गठन होना था। लोगों ने भागीदारी करते हुए, अपनी मर्जी से एक व्यक्ति को अध्यक्ष मनोनीत किया। चुनाव जैसी स्थिति वहां पर नहीं थी। इसलिए सहजता से एसएमसी का गठन हो गया। 

सभी सदस्यों को महीने में एक बैठक आयोजित करन के संबंध में प्रधानाध्यापक जी नें जानकारी दी। अगले पंद्रह दिन में एक बैठक आयोजित करके उनको एसएमसी के अधिकारों और मद के खर्चों के संबंध में जानकारी प्रदान करने की योजना है। प्रधानाध्यापक जी नें बताया कि 24 तारीख को सूचना निकाली थी, लेकिन मात्र 20-25 लोग ही एसएमसी पुर्नगठन के अवसर पर उपस्थित हुए।
महिलाओं की संख्या पूर्वानुमान के मुताबिक कम थी। एक बच्चे की मां उसको स्कूल में पढ़ने के लिए लेकर आईं थीं। वह कक्षा में बैठा। लेकिन फिर बाहर आ गया। वापस घर चला गया था। उसके घर वाले उसे अपने साथ लेकर वापस आए थे। वे कह रहे थे कि कक्षा आठवीं मे पढ़ रहे हो, कुछ महीनों की बात है। इसे पास कर लो। उसके बाद सोचना कि यहां पढ़ाई करनी है कि नहीं। लेकिन वह नहीं मान रहा था। उसका कहना है कि वह काम करना चाहता है। पढ़ाई करने के बजाय वह पैसे कमाना चाहता है। प्रधानाध्यापक जी उसे पिछले दो दिन से समझा रहे हैं लेकिन वह मानने को तैयार नहीं है। प्रधानाध्यापक जी का कहना है कि वह आसपास के लड़कों के प्रभाव में आ गया है। जो अहमदाबाद और मुंबई में काम करते हैं।
उसको लगता है कि उनकी जिंदगी बहुत बेहतर है। उनकी बाहरी चमक-दमक और रौनक तो दिखाई पड़ती है, लेकिन भीतरी तकलीफ तो वे बताते नहीं कि कितनी दिक्कत होती है। प्रधानाध्यापक जी नें कहा कि भटकने की यह कौन सी उम्र है। उसके बाद उसके भाई से बात हो रही थी। जो बाहर काम करता है। उसनें भी उसे समझाने की कोशिश करी, लेकिन सारी बातों का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उसने बोला किसी से शादी करनी है क्या, गांव में घूमना है क्या, क्या करना है बताओ….लेकिन उसके दिमाग में एक ही बात घुसी है कि काम करना है। पैसे कमाने हैं। पढ़ाई नहीं करनी है। 
प्रधानाध्यापक जी नें बताया कि उसी कक्षा में एक और लड़का है सागर नाम का। वह दो साल पहले मेडिकल में काम करता था। वह वहां पर रहता तो दवाई इत्यादि का नाम तो सीख ही लेता। लेकिन उसका मालिक उससे चौबिसो घंटे काम करवाता था। जिससे परेशान होकर उसने काम छोड़ दिया। उसके माता-पिता ने कई बार कहा कि मेरे लड़के का एडमीशन ले लो तो फिर मैनें एडमीशन लिया। लड़का भी रो रहा था कि काम नहीं करना है। मुझे तो पढ़ाई करनी है। अब वह आठवीं में है। नियमित स्कूल आ रहा है। तो मैनें कहा कि उससे बात करवा दीजिए, हो सकता है कुछ असर पड़े। उन्होनें बताया कि उससे बात हुई। लेकिन फिर भी उसके मन पर कोई असर नहीं हुआ। दोपहर के समय उसकी मम्मी उसे अपने साथ स्कूल लेकर आयी थीं। उसे मैं लेकर कक्षा में गया, सारे बच्चों से पूछा कि पहचानते हो इसे तो सारे एक श्वर में बोले…हां पहचानते हैं। उनकी खुशी और उत्साह देखने लायक था।
अंतत- प्रधानाध्यापक जी नें बोला कि समय ले लो। सोच लो। उसके बाद फैसला करो कि पढ़ाई करनी है या काम करना है। हम अभी कह रहे हैं, अगर मान लेते हो तो पढ़ाई आगे की जिंदगी में काम आने वाली है। लाइसेंस बनवाने के लिए और अनेक तरह के कामों के लिए आठवीं के प्रमाण पत्र व अंकपत्र की जरूरत होती है। अतः कुछ महीनों की बात है, आठवीं तक की पढ़ाई तो पूरी कर लो। इसके अतिरिक्त एसएमसी की बैठक में भागीदारी करी। प्रधानाध्यापक जी नें मुझसे कहा कि आप भी कुछ बात करिए। तो मैनें कहा कि आप लोग स्कूल में आइए। इससे बच्चों को भी लगेगा कि आप उनकी पढ़ाई-लिखाई को लेकर गंभीर हैं।
आपको स्कूल में अध्यापकों से बात करता देख उनको लगेगा कि आप उनके बारे में बात कर रहे हैं कि वे घर पर क्या करते हैं, पढ़ाई करते हैं या नहीं। इससे उनके ऊपर एक सकारात्मक असर पड़ेगा। आप उनको घर पर बैठाकर पढ़ाइए, अगर पढ़ाना संभव न हो तो उनके पास एक घंटे बैठना भी काफी मददगार हो सकता है। 

    एसएमसी गठित हो गई। लोगों नें अपनी मर्जी से सदस्यों का चुनाव किया। जिन दो लोगों की जमीन के बीच स्कूल आ रही है, उनको भी स्कूल की एसएमसी के सदस्य के रूप में चुना गया। ताकि स्कूल के लिए जमीन के विवाद का निपटारा हो सके। इस बार के एसएमसी के अध्यक्ष का सरपंच के साथ तालमेल अच्छा है। जिससे स्कूल में काम होनें की उम्मीद बंधती है। एक रिटायर्ट एसआई से शाम को मुलाकात हुई। उनको भी हेडमास्टर नें एसएमसी गठन की मीटिंग में बुलाया था। लेकिन वै ग्यारह बजे के समय के कारण नहीं आए।
   शाम को आने के बाद उनके पहले शब्द थे क्षमा-क्षमा-क्षमा, काफी जोशीले अंदाज में बात कर रहे थे, उन्होनें बताया कि उनका अपना दौर अलग था। जब उनकी खूब पिटाई होती थी। पाठ को याद करने के लिए। वे अपनी नौकरी का श्रेय भी उन्हीं को दे रहे थे। वे कह रहे थे कि वे लोग दर्शनीय हैं। ऐसे लोगों से मिलना चाहिए। एचएम बच्चे को समझा रहे थे कि हम अपने अध्यापकों को क्या वापस कर दिया, हम तो अपने बच्चों को पाल रहे हैं। अपने परिवार के लिए पैसे खर्च करते हैं। लेकिन वे हमसे कोई बात कहते हैं तो हमारे भले के लिए कहते हैं।
     वे बता रहे थे कि जब तक राजनीतिक माहौल नहीं बदलता है। तब तक बदलाव मुमकिन नहीं हैं। अगर कोई बड़ा अधिकारी चाहता है कि स्कूल का माहोल बदले तो बदलाव हो सकता है। वे प्रधानाध्यापक जी से कह रहे थे कि शिक्षा के स्तर में सुधार की कोशिश करिए। वह काम तो भौतिक संसाधनों से काफी अलग है। तो उन्होनें कहा कि अकेला आदमी क्या कर लेगा, तो उन्होनें इस बात से अपनी सहमति जताई। उनके विचारों की स्पष्टता काबिल-ए-गौर थी। बच्चों के छः घंटे तक स्कूल में बिना एमडीएम के रुकने वाली बात वाजिब नहीं है। 

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