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शिक्षा विमर्शः ‘आठवीं की बोर्ड परीक्षा बंद होने से गिरा पढ़ाई का स्तर’

कक्षा में किताबें पढ़ती छात्राएं
निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून-2009 के आने के बाद से स्कूलों में आठवीं कक्षा में बोर्ड की परीक्षाओं पर रोक लग गई। जिसका मकसद था कि बच्चों के मन से परीक्षाओं का खौफ कम हो और परीक्षा के आधार किसी बच्चे को फेल न किया जाय। ताकि आठवीं तक की प्राथमिक शिक्षा से कोई भी वंचित न रहे। छः साल की उम्र में स्कूलों में पहली कक्षा में उनका प्रवेश होना चाहिए। अगर किसी की उम्र अधिक है तो आयु के अनुरूप ही उसको कक्षाओं में बैठाया जाय। आठवीं पास करने पर उनको एक प्रमाण पत्र देना है कि बच्चे में आठवीं पास करने की योग्यता है। यही उनका अंकपत्र होगा।
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अधिकांश शिक्षकों और प्रधानाध्यापकों का मानना है कि आठवीं में बोर्ड की परीक्षाओं के समय स्कूलों में पढ़ाई का बेहतर माहौल था। बेहतर परिणाम के लिए शिक्षक रुचिपूर्वक पढ़ाते थे। बच्चे भी गंभीरता से अध्ययन करते थे। अभिभावक भी हमारी बातों पर ध्यान देते थे। विषय अध्यापक अपने-अपने विषयों पर ध्यान देते थे। इसके कारण आठवीं तक आते-आते लगभग सारे बच्चों को पढ़ना-लिखना-गणित के सवाल हल करना आ जाता था। लेकिन अभी आठवीं कक्षा के बच्चों को पढ़ने-लिखनें में दिक्कत होती है। उनके ऊपर कोई दबाव वाली बात तो है नहीं। उनको लगता है कि पास तो हो ही जाएंगे फिर पढ़ने का क्या मतलब ?
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वर्तमान में माहौल में वे साल दर साल पढ़ने की आदतों से विमुख हो जाते हैं। उनकी रुचि पढ़नें में विकसित नहीं हो पाती। शिक्षक के पास भी समय का अभाव होता है। तीस मिनट- पैंतालिस मिनट के कालांश में हर बच्चे पर वह चाहते भी ध्यान नहीं दे सकता है। हम अगर एक-एक पाठ बच्चों को समझाकर आगे ले जाना चाहें तो पाठ्यक्रम पूरा करने का दबाव आड़े आ जाता है। हम चाहते हुए भी मन का काम नहीं कर पाते। छोटे बच्चे पढ़ाई का महत्व अभी नहीं समझ रहे हैं । आगे जाकर उनको तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। लिखने और पढ़ने के कौशल के अभाव में उनकी दौड़ नौवीं दसवीं तक जाकर रुक जाएगी।
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उन्होनें अपना पुराना अनुभव सुनाते हुए कहा कि जब मैं स्कूल में चयनित हुई थी तो प्रधानाध्यापिका जी नें मुझे गणित पढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी। उन्होनें कहा कि बच्चों को पढ़ाने के लिए खुद तैयारी करके पढ़ाना बेहतर होगा। इससे आपकी झिझक भी दूर होगी। आगे जाकर आप गणित विषय को बेहतर ढंग से बच्चों को पढ़ा भी पाओगे।
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वे कक्षा कक्ष में बैठकर देखती थीं कि हम कैसे पढ़ा रहे हैं उनके काम के तरीके का लाभ हमको मिल रहा है। अगर उनकी जगह कोई और होता तो हम भी जैसे तैसे कोर्स पूरा करने और पढ़ाने के आदती हो गए होते। उनकी बातों को सुनते हुए एक प्रधानाध्यापक की शिक्षक के जीवन में भूमिका का पता चलता है कि कैसे एक प्रधानाध्यापक दायित्व निर्वहन के लिए अपनी टीम को प्रेरित करता है। ताकि स्कूल का परीक्षा परिणाम बेहतर हो सके। बच्चों की पढ़ाई अच्छे से हो सके।
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उनसे बात करते हुए एक बात मन में आती है कि परीक्षाओं में जो बच्चे पर्चे पर केवल सवाल उतारते हैं, क्या वे पढ़ना नहीं चाहते ऐसा तो नहीं प्रतीत होता अगर बच्चों का पढ़ाई में मन नहीं लग रहा है तो हमारे पढ़ाने के तरीके में सुधार की आवश्यकता हो सकती है हमको बच्चों से पेश आने के तरीके के बारे में नए सिरे से विचार करने की जरूरत होती है अध्यापक होने के बाद खुद अध्ययन करने की आदतों पर गौर फरमाने की जरूरत है।
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हमें अपने बचपन की तरफ एक बार लौटकर देखने की जरूरत है कि जब हमारे बगल की कक्षा में सारे बच्चे मुंह फुलाकर और हांथ बांधकर बैठे होते थे तो क्या उनको खुशी होती थी अनुशासन के नाम पर बच्चों को शारीरिक दंड देने और मानसिक प्रताड़ना देने वाली बातों से सहमति जाहिर करने का समय गुजर गया। नए दौर का सामना करने के लिए नए सिरे से तैयारी करनी होगी। तभी हम बतौर शिक्षक अपनी भूमिका से न्याय कर पाएंगे। इसके साथ-साथ समाज के लिए भी कुछ योगदान दे पाएंगे।
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