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दस साल बाद मैं बड़ी सी कार खरीदुंगा…

सातवीं कक्षा के छात्रों ने “मन की बात” में अगले दस साल के बदलावों का चित्र खींचा है। अपने भविष्य की कल्पनाओं को शब्दों में ढालते हुए एक छात्र जितेन्द्र लिखता है कि अगले दस सालों में आठवीं पास करके दूसरी स्कूल जाना पड़ेगा। इसके बाद बड़ी स्कूल (दसवीं-बारहवीं) जा सकता हूं। 

इसके बाद डूंगरपुर कॉलेज में पढ़ाई के लिए जा सकता हूं। उसके बाद कोई नौकरी करुंगा। अगर अध्यापक की नौकरी मिल जाती है तो अपने छोटे भाई-बहिन को आगे तक पढ़ाऊंगा। वे भी पढ़कर नौकरी पर लग जाएंगे तो अपने बच्चों को आगे बढ़ाएंगे। दस साल के भीतर मेरी शादी हो जाएगी। मेरे छोटे-छोटे बच्चे होंगे। मैं गाड़ी या बड़ी सी कार ला सकता हूं। दस साल के बाद मैं अपना पक्का मकान बनाऊंगा। मेरे भाई-बहिन तब तक बड़े हो जाएंगे। उनकी भी शादी होगी। मुझे खेती भी करनी पड़ेगी। दस साल के बाद तो मेरे भाई-बहिन के बी बच्चे हो जाएंगे। 
दस साल के बाद मैं दूसरे गरीब लोगों की मदद करुंगा। दुकान और कुएं बनाऊंगा। अगर किसी गरीब को मेरे मदद की जरूरत होगी तो मना नहीं करंगा। अपने दोस्तों का सहायता करुंगा। मेरे काका-बाबा के छोटे बच्चों को ज्ञान दूंगा। मेरे काका के बच्चे भी स्कूल पढ़ने जा सकते हैं। बड़े होकर एक अध्यापक बन सकते हैं। मेरे बच्चों को बी पढ़ने के लिए भेजुंगा। वे भी पढ़-लिखकर अध्यापक बन सकते हैं। नौकरी के लिए माता-पिता हमें पढ़ाते हैं। इसलिए उनको नौकरी करके पैसे देने पड़ते हैं। अगले दस सालों में गांव में यातायात के साधन बढ जाएंगे। हमारी स्कूल भी हम जिसमें पढ़ रहे हैं, दसवीं तक बढ़ सकती है। मैं बहुत धनवान बनुंगा। गरीब बन सकता हूं। कोई काम कर सकता हूं। इंजीनियर बन सकता हूं। 
दस साल में गांव में दूसरी नई सड़क बन सकती है (गांव के बीच से हाइवे-नं 8 गुजरती है)। हमारे गांव में दूसरी कोई स्कूल खुल सकती है। हमारे बच्चे धनवान या गरीब बन सकते हैं। मेरे परिवार में सभी बच्चे पढ़ेंगे और कमजोर नहीं रहेंगे। कुछ बच्चों ने लिखा कि वे किराणा की दुकान खोलेंग और धंधा करेंगे। उन्होनें संभावना जाहिर करी कि अगर परिवार में सब नौकरी पेशा हो जाएंगे तो उनका परिवार धनवान बन जाएगा। एक बच्चे का सपना है कि वह बड़ा होकर पेंटर बने। लोगों के घरों में शादी के अवसरों पर फूल-मोर-गाय-आदि का चित्र बनाएगा। वह भी गाड़ी खरीदना चाहता है। वह कहता है कि गाड़ी आने के बाद किसी के घर शादी अटेंड करने के लिए गाड़ी लेकर जाऊंगा।
आने वाले कल का जो चित्र बच्चों ने खींचा है। उससे उनके यथार्थ से जुड़े होने की बात को आधार मिलता है। उनके बेफिक्र होने की बात सोचने वाले मनोवैज्ञानिकों की फिक्र होने लगती है जो बच्चों को बेफिक्र कहते हैं। बच्चे आने वाले कल की भूमिकाओं, जिम्मेदारियों के प्रति सचेत हैं। वे जीवन के उतार-चढ़ाव व परिस्थितियों को समझते हैं। उनके लेखन से विचारों की स्पष्टता की झलक मिलती है। एक बच्चा लिखता है कि दस साल बाद मेरा भाई बड़ा हो जाएगा। उसकी शादी होगी। मेरी भाभी आ जाएगी। मेरी बहन बड़ी हो  जाएगी। उसकी भी शादी हो जाएगी। उनके बच्चे हो जाएंगे। पढ़ने के लिए जाएंगे। मेरे भैया नौकरी करेंगे। भाई का पक्का मकान बनाऊंगा। अभी मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता हूं। दस साल बाद में पुलिस बन जाऊंगा। सब बदमाशों को पीटुंगा। जो दारू पीकर आएगा, उसको जेल में डाल दूंगा। 
बच्चों की बातों का यथार्थ से जुड़ाव और कल्पना से संवाद होता है। उनकी सहज जिज्ञासाएं और सपने मन  को आकर्षित करते हैं। वे वर्तमान से भविष्य के बीच में आवाजाही करते हुए, अपनी भूमिकाए बदलते हैं। कभी अध्यापक बनते हैं तो कभी पुलिस बन दारू पीने वालों को सजा देते हैं। एक बच्चा लिखता है कि मैं कॉलेज जाऊंगा। चित्रकला और कम्पयूटर सीखुंगा। तब तक मेरी भी शादी हो जाएगी। बच्चे हो जाएंगे। बच्चे बड़े हो जाएंगे। पढ़कर आगे बढ़ेगें। मैं भी जो कुछ नौकरी मिले उसको करंगा। उनके विचारों का लचीलापन उनके सोच की परिपक्वता को दिखाता है कि वे परिस्थितियों की तमाम संभावनाओं और चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हैं। उनको अपने सपने पता हैं। मंजिल की राह में मील के पत्थरों को टटोलने में बड़े उनकी कुछ सहायात कर सकते हैं।
संयोग से आज के दिन आठवीं कक्षा के साथ प्रधानाध्यापक जी और दो अध्यापकों नें संवाद किया। उनसे पूछा कि वे आठवीं के बाद आगे पढ़ने के लिए कहां जाना चाहते हैं। क्यों किसी खास स्कूल में जाना चाहते हैं कौन छात्रावास में जाना चाहता है किसके भाई-बहिन बाहर पढ़ रहे हैं जो उनके पास जाना चाहते हैं उनके घर वाले उनके भविष्य के बारे में क्या सोच रहे हैं उनको उनकी तरफ से कैसे मदद मिल सकती है। आदि तमाम बातों के बारे में वे सोच रहे थे उन्होनें बच्चों को अपने अध्यापकीय जीवन के तमाम अनुभव भी सुनाए। उनके स्कूल में प्रधानाध्यापक बनने की शुरुआत से अब तक की स्थिति के बारे में बताया। उन्होनें अपने क्रिकेट खेल में दिलचस्पी लेनें और कमेंट्री सुनने के शौक के बारे में बताया।
पास-फेल की स्थितियों में हुए बदलाव के बारे में बताया। उन्होनें उनको अपने वक़्त के आज्ञाकारी बच्चों की कहानी सुनाते हुए कहा कि सबसे अच्छा बनने के बजाय। अच्छे बच्चे बनो। अध्यापकों से सवाल पूछो। अपनी जिज्ञासाओं को शांत करो। शिक्षा ग्रहण करो और जीवन में तरक्की करो। उन्होनें कुछ बच्चों के व्यक्तित्व में हुए बदलाओं का भी उल्लेख किया। उन्होनें बच्चों को आगे बढ़ने के लिए शाबाशी दी। उनके साथ मित्रवत संवाद किया। जो भविष्य के बदलाओं के ओर संकेत करता है कि अध्यापक बच्चों के सपनों को पूरा करनें में अपनी भूमिका आदा कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए बच्चों से संवाद करके उनके सपनों को जानने की कोशिश करनी चाहिए। इससे अध्यापक-बच्चे-अभिभावक और बेहतर भारत के भविष्य निर्माण के सपनें को हकीकत में बदलने की हसरतों को मंजिल मिल सकती है।
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