Advertisements
News Ticker

एडमीशन का सवालः दाख़िले की दौड़ में जो पीछे छूट गए

दिल्ली विश्वविद्यालय में दाख़िले की दौड़ में तमाम युवा पराजित महसूस कर रहे हैं. उनको न तो मनचाहा विषय मिल रहा है. मनचाहा कॉलेज तो दूर की बात है. उनके घर वाले भी उनको अच्छी मेहनत न करने और घूमने, फ़िल्मे देखने और मस्तू करने के नाम पर कोस रहे होंगे. 
भारतीय रुपए के साथ-साथ भारत के कॉलेजों में मिलने वाले नंबरों की भी कीमत दिनों दिन गिरती जा रही है. उसकी साख को भी बट्टा लग रहा है. किसी समय पर 60 और 70 फसीदी नंबर पाने वाले ख़ुशी से लड्डू बांटते थे. आज तो उनको एडमीशन के लाले पड़े हुए हैं. गांव और शहर के बच्चों को कोचिंग वाले सपना दिखाते हैं. बचपन बीतने के पहले उनको स्कूल में दाख़िला करवा दिया जाता है. 
ऊपर से हर बार क्लॉस में आगे रहने का दबाव बनाया जाता है कि अगर आगे नहीं रहे तो तमाम उपहार नहीं मिलेंगे और बात बंद करने की धमकी अलग से…..कैसे लोभी माता-पिता की कहानियां लिख रहे हैं हम.

कभी बस्तों के बोझ तले बचपन दब रहा था तो सुप्रीम कोर्ट तक बात पहुंची. बस्तों का बोझ तो दूर करने की कोशिश में बच्चों के विषय बढ़ते जा रहे हैं. उनको न तो ढंग से हिन्दी सिखाई जाती है, न अंग्रेजी, ऊपर से आगे जाकर धीमे सीखने वाले का ठप्पा अलग लगा देते हैं. उसका खामियाज़ा आने वाले सालों में भुगतते हैं. जब उनके वरिष्ठ साथी कहते हैं कि बीए-एम ए हो गया और अभी मात्रा लगाना तक नहीं सीखे…नकल मारने के अलावा खुद से लिखना नहीं सीखे. लिखने के नाम पर बहुत सारे लोग डरते हैं.

अगर तमाम प्रोफेसरों को पेपर देकर परीक्षा में बैठाया जाय तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि वे बच्चों से भी कम नंबर लेकर आएंगे. वे तो अपना विषय ही नहीं संभाल पाते, इतने सारे विषय और सवालों को कौन संभालेगा? असल मामला तो यह है कि वे ऐसा काम कर रहे हैं जिसमें उनका खुद का भरोसा नहीं है. अगर चार साल वाले पाठ्यक्रम के लिए विश्वविद्यालय के प्रोफेसर तैयार नहीं हैं तो उसका क्रियान्वयन कैसे होगा…? आधे-अधूरे मन से होगा. परिणाम भी वही ढाक के तीन पात रहने वाले हैं. जब भेदभाव की नींव पर प्रवेश हो रही है तो आगे की तरक्की भी भेदभाव की चासनी में लिपटी हुई होगी. 
भेदभाव की मानसिकता से ओतप्रोत लोगों से समता भरे व्यवहार की अपेक्षा कितनी सही है? जिस चीज़ को किसी ने खुद अपने जीवन में कभी महसूस नहीं किया उसे वह किसी और को क्या देगा? ऐसे ही आगे बढ़ रहा है अपना भारतीय समाज. वस्तुनिष्ठता से देखने वाले खूब समझते हैं. लेकिनव राष्ट्रवाद के चश्मे से देखने वालों को तो अभी भी सोने की चिडिया दिखाई देती है. दूध और दही की नदिया दिखायी देते हैं. दूध-दही देखने से मन को खुशी को मिलती है. अगर वह भी देखना छोड़ दें तो मन की ख़ुशी भी मारी जाय. वर्तमान दौर में ही नज़रिए और साफ नज़र की बहुत जरुरत है, अग सच देखने, समझने और जानने की जिज्ञासा को बचाए-बनाए रखना है.
Advertisements

4 Comments on एडमीशन का सवालः दाख़िले की दौड़ में जो पीछे छूट गए

  1. थोपे गए काम के क्रियान्वयन को देखना दिलचस्प होगा.विकास और रोज़गार के लिए शिक्षा को टूल के रुप में देखने की स्थिति सतह पर आ गई है. बहुत-बहुत शुक्रिया अपने विचार साझा करने के लिए…अभी तो एडमीशन के साथ सत्र के दौरान नए-नए सवालों के लिए तैयार रहिए…शिक्षा का कॉमनवेल्थ खेल शुरु हो गया है.

    Like

  2. थोपे गए काम के क्रियान्वयन को देखना दिलचस्प होगा.विकास और रोज़गार के लिए शिक्षा को टूल के रुप में देखने की स्थिति सतह पर आ गई है. बहुत-बहुत शुक्रिया अपने विचार साझा करने के लिए…अभी तो एडमीशन के साथ सत्र के दौरान नए-नए सवालों के लिए तैयार रहिए…शिक्षा का कॉमनवेल्थ खेल शुरु हो गया है.

    Like

  3. अगर चार साल वाले पाठ्यक्रम के लिए विश्वविद्यालय के प्रोफेसर तैयार नहीं हैं तो उसका क्रियान्वयन कैसे होगा…? ……….यही मैं भी सोच रहा था। शिक्षा की वास्‍तविक बातें पिछड़ गईं हैं, और ही और अव्‍यावहारिक फैसले शिक्षा के बारे में लिए जा रहे हैं। बहुत अच्‍छा विश्‍लेषण परोसा है आपने।

    Like

  4. अगर चार साल वाले पाठ्यक्रम के लिए विश्वविद्यालय के प्रोफेसर तैयार नहीं हैं तो उसका क्रियान्वयन कैसे होगा…? ……….यही मैं भी सोच रहा था। शिक्षा की वास्‍तविक बातें पिछड़ गईं हैं, और ही और अव्‍यावहारिक फैसले शिक्षा के बारे में लिए जा रहे हैं। बहुत अच्‍छा विश्‍लेषण परोसा है आपने।

    Like

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: