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मिड डे मील खाने के बाद बच्चों की मौत से उठते सवाल?

बिहार के छपरा ज़िले में एमडीएम खाने के बाद बच्चों की मौत के बाद सरकारी नींद से जागने का स्वांग रच रही है. महज पचास-साठ रुपए के तेल के लिए बच्चों की ज़िंदगी तक से खिलवाड़ करने में लोग चूकते नहीं. संवेदनहीनता अपने चरम है. बच्चों की मौत के बाद नेता उनको उनको दो लाख रुपए देकर खमोश करने की कोशिश

कर रहे हैं. 

बिहार के स्कूलों की वास्तविक स्थिति के बारे में एक शिक्षक ने बड़े विस्तार से बताया. उनसे हुई बातचीत का आपसे साझा है. उन्होनें पांच साल के अनुभव के बारे में बताया कि वहां कैसे प्राथमिक शिक्षा भ्रष्टाचार के शिकंजे में अतिम सासें गिन रही है. एमडीएम खाने के बाद होने वाली मौतें उसके ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकती है. 

सोच और संवेदनशीलता?

बिहार में स्कूल के शिक्षकों को जो सलाह दी जा रही है, वे अन्य राज्यों में पहले से अमल में हैं मसलन शिक्षकों द्वारा भोजन का कुक और अध्यापकों द्वारा खुद खाकर देखना की खाना कैसा बना है? एमडीएम के खाने को शाम तक संभालकर रखना ताकि किसी अधिकारी के स्कूल के दौरे की स्थिति में उसको एमडीएम खाने और देखने का मौका मिले. 

मीनू के हिसाब से खाना बनाना. बच्चों के खाने से एक घंटे पहले भोजन का बन जाना. हाथ धुलने के बाद बच्चों का पंक्ति में खाने के लिए साफ प्लेटें लेकर बैठना. कुछ स्कूलों में तो बच्चों के प्लेट धोने की भी व्यवस्था होती है. तो कुछ स्कूलों में उनके नाम की प्लेट इश्यू कर दी गई ताकि वे संभालकर रखें और साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखें. इस लिहाज से प्राथमिक स्कूल बहुत बदहाल स्थिति में था. वहां पर एक कमरे में, एक शिक्षिका के सहारे सारा काम संचालित हो रहा था. शिक्षिका भी बच्चों को डांटकर भोजन कराने और कुके के सुझाव की उपेक्षा करने की दोषी है.

छवि सुधारती सरकार 


वे कहते हैं कि किसी शिक्षक की संवेदनहीनता का इससे बड़ा सबूत और कुछ नहीं हो सकता कि उसे बच्चों के स्वास्थ्य और जान तक की परवाह न हो. वहां पर किसी की कोई जवाबदारी नज़र नहीं आ रही थी. बहुत हल्ले के बाद शिक्षिका के खिलाफ प्राथमिक दर्ज़ की गई. इससे पता चलता है कि समस्या सोच और संवेदनशीलता के अभाव की है. जिसको नियम बनाकर दूर नहीं किया जा सकता. इसके लिए व्यवस्था में ईमानदारी और बेहतर सोच को जगह देने की जरुरत है. लोगों पर दबाव बनाने वाली व्यवस्था कितनी संवेदनशील होगी कहना कठिन है, लेकिन इस दिशा में कदम उठाने का यह आखिरी मौका है.   

लेकिन बिहार की स्थिती इससे बहुत अलग है. बिहार विज्ञापनों में चमक रहा है. क्योंकि अख़बार में छपे विज्ञापन सरकार का मुखपत्र हैं. कभी-कभी तो ख़बरों के ऊपर भी उनका साफ असर दिखाई पड़ता है. जिनको मोटा विज्ञापन मिलता है, वहां एमडीएम से बच्चों की मौत के ऊपर कहा जा रहा है कि ऐसी ख़बर लिखो जिससे बिहार की नकारात्मक छवि न बने. छवि निर्माण के सारे दावों के पोल खुलते देर नहीं लगती. स्कूल के एमडीएम में बरती गई लापरवाही के कारण कुक समेत 22 लोगों की मौत हो गई. कुछ बच्चों का तो स्कूल का पहला दिन आखिरी दिन बन गया. वे स्कूल से कभी वापस नहीं लौटे. इससे स्थिति की गंभीरता का पता चलता है.

ब्रांडेड सामान की खरीददारी

बच्चों की मौत के बाद सरकार को ब्राण्ड की फिक्र हो रही है. अपनी गिरती साख को आधार देने के लिए सरकार सौ जतन करती दिखाई पड़ रही है. आज डीएम के द्वारा बुलाई गई बैठकों में चर्चा का विषय स्कूल में चलने वाला एमडीएम प्रोग्राम ही था. शिक्षकों को आईएसआई मार्का नमक, सरकारी ट्रेड मार्क वाले मसाले और बेहतर क्वालिटी की चावल इस्तेमाल करने की हिदायत दी गई है. उनसे कहा गया है कि अगर चावल की गुणवत्ता खराब हो तो डीएम के पास उसका सैंपल उपलब्ध कराया जाय.

वहां के एक अध्यापक बिहार में की दरकती शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलते हुए बताते हैं कि सिस्टम को खराब करने अधिकारियों की बड़ी भूमिका है. उन्होनें बताया कि बाहर से जांच करने के लिए एक टीम ज़िले में आई हुई थी, जिसका मुख्य फोकस स्कूल की बिल्डिंग और एमडीएम में बनने वाली खिचड़ी थी. यहां शिक्षा के स्तर और पढ़ाई के बारे में कोई चर्चा नहीं हुई. बिहार के प्राथमिक उच्च प्राथमिक स्कूलों में शिक्षा लगभग खत्म है. यहां के पांचवी के अधिकांश बच्चों को पाठ पढ़ना तक नहीं आता.
एमडीएम में लूट

अगर एमडीएम की बात करें तो जहां से चावल स्कूल के लिए गोदाम से निकलता है, वहीं से इसकी लूट की कहानी शुरु हो जाती है. क़ानून और व्यवस्था की बात करें तो उसको अनाज तौलकर देना चाहिए, लेकिन अनाज का वितरण करने वाले अनाज देकर चले जाते हैं. हम कुछ कहते हैं तो चुपचाप सुन लेते हैं कोई प्रतिक्रिया नहीं देते. हमारे पास अनाज तौलने की मशीन भी नहीं है. अनाज तो अनाज है, बच्चों को वजन नापने के लिए दी गई मशीनें भी सही से काम नहीं कर रही हैं. 

पूरी शिक्षा व्यवस्था को डंडी मारने और कम तौलने की लत सी लग गई है. ऐसे माहौल में बेहतरी की सारी उम्मीदें धुंधली हो गई है. हम तो पिछले पांच सालों से शिक्षा व्यवस्था की नब्ज़ पर हाथ रखे उसकी टोह ले रहे हैं. जब महीने में एमडीएम के खर्चे की रिपोर्ट दी जाती है तो उसके हिसाब से तीन सौ, चार सौ रुपए भी देने पड़ते हैं. बीईईओ की भी हिस्सा चाहिए होता है. मध्याह्न भोजन (एमडीएम) योजना के कारण जनप्रतिनिधि, मुखिया, प्रमुख और अधिकारी स्कूल विजिट करने के लिए आते हैं. 

उनके आने का मतलब है कि उनको पैसे देना, अगर पैसा न दो तो कई तरह की कमियां निकालते हैं. उसके बाद कहते हैं कि मिलने के लिए आ जाना, जिसका मतलब है कि संबंधित अधिकारी के कार्यालय पहुंचकर कुछ पैसे देकर मामला सुलझा लेना. शिक्षा विभाग के अधिकारी एमडीएम को ठीक करने के लिए सुझाव नहीं देते. वे इसके सुधार की जगह पैसे की मांग करते हैं. इस तरह की निगरानी और सहयोग से व्यवस्था में सुधार की संभावनाओं पर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं.

बच्चों के पढ़ाई की चिंता नहीं

गांव के लोगों को इस बात की परवाह नहीं है कि उनके बच्चे को गणित में गुणा, भाग, जोड़, घटाना आता है कि नहीं. वे इस बात के बारे में ज्यादा फिक्रमंद हैं कि स्कूल में खाना बन रहा है तो चोखा और आलू में शिक्षक कितना बचा ले रहे हैं. बिल्डिंग बन रही है तो वे कितना कमीशन खा रहे हैं? सरकार की तरफ से एक शिक्षक को छह हजार रुपए तनख़्वाह मिल रही है. कुल मिलाकर माहौल उसको भ्रष्टाचार के अंधेरे में धकेलने का काम कर रहा है. उसको गलत करने के लिए मजबूर कर रहा है. शिक्षक को पढ़ाने के काम से अलग बूथ लेवल ऑफीसर बनाकर लोगों का नाम जोड़ने-घटाने के काम में लगाया जाता है. स्कूल आंकड़ा बटोरने की एजेंसी में बदल गए हैं.

अभी तक बच्चों की किताबें नहीं आई हैं. जुलाई का आधा महीना बीत चुका है. ज़िला मुख्यालय पर किताब आने के दो महीने बाद सितंबर तक हमारे स्कूल तक आएगी. पढ़ाई की किसको चिंता है. सरकारी स्कूलों को बरबाद करने के लिए सरकार हर संभव प्रयास कर रही है. वह दिन दूर नहीं जब हर मोहल्ले में एक बेहतर निजी स्कूल खुल जाएंगे और सरकारी स्कूलों पर ताला लगाने की नौबत आ जाएगी. हर टोले में स्कूल खुल रहे हैं. शिक्षकों की पर्याप्त संख्या है नहीं, अंततः सारा नुकसान बच्चों की पढ़ाई का हो रहा है. वहां के शिक्षक ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि मुझे भी पांच बार कारण बताओ नोटिस मिल चुका है, क्योंकि मैं सवाल पूछता हूं, खराब अनाज को लेने से मना करता हूं. सच बात बोलता हूं.

वे कहते हैं कि अगर एमडीएम बंद हो जाए तो पढ़ाई को बेहतर बना देने की हम गारंटी लेते हैं. लेकिन स्थिति में सुधार कौन चाहता है?
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