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शिक्षाः ‘अगर बच्चे कहें, स्कूल नहीं जाना है, आज का दिन तो घर पर ही बिताना है’

शिक्षा बच्चों का अधिकार है. भारत के संविधान के अनुसार हम अपने अधिकार का हस्तांतरण कर सकते हैं. लेकिन कर्तव्यों का निर्वहन हमें ख़ुद करना पड़ता है. लेकिन कुछ बच्चों के लिए तो अपने अधिकार का इस्तेमाल करना ही बाध्यता बन जाता है. कुछ बच्चों का स्कूल जाने का मन नहीं होता है. इसलिए जब हम प्रवेश उत्सव की योजना बना रहे थे तो कुछ बुनियादी सवालों से भी रूबरु हो रहे थे. जैसे हम, शिक्षक और सरकार तो बच्चों को स्कूल से जो़ड़ना चाहते हैं लेकिन क्या बच्चे स्कूल आना चाहते हैं?

बच्चों का हक़ यानी उनकी मर्ज़ी

बच्चों को उनके अभिभावक स्कूल भेजना चाहते हैं क्या? अगर बच्चा स्कूल जाता है तो बच्चों के साथ वहाँ कैसा बर्ताव होता है? इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए बच्चों के साथ अच्छा व्यवहार करने और उनके साथ जुड़ने को भी प्रवेश उत्सव में काफी महत्व दिया जाता था. लेकिन वास्तव में इसको अमल में लाना शिक्षकों के लिए एक चुनौती थी. शिक्षक इस बारे में कहते भी थे कि लोगों क लगता है कि हमारे पास कोई काम नहीं है. हमको बार-बार गाँव में लोगों के घर जाना पड़ता है. खेती के काम के कारण भी बच्चे स्कूल नहीं आते हैं.

गाँव में खेती के समय सारे लोग खेतों पर काम करने के लिए जाते हैं. ऐसे में वो बच्चों को भी अपने साथ खेत पर ले जाते हैं. इस कारण भी बच्चे का स्कूल आना प्रभावित होता है. स्कूल आना प्रारंभ करने के बाद बच्चों के ठहराव के ऊपर ध्यान देने की जरूरत होती है. शिक्षकों का कहना है कि जुलाई-अगस्त-सितंबर माह में सबसे ज़्यादा शैक्षिक दिवस होने के बावजूद उनका अधिकांश समय बाकी कागजी कामों और डाक बनाने में चला जाता है. इसका बच्चों को सीधा फ़ायदा नहीं होता. इसके ठीक विपरीत उनकी कक्षाएं प्रभावित होती हैं.

छोटे बच्चों से घबराते शिक्षक

लेकिन अधिकारियों और योजना बनाने वाले लोगों का कहना है कि अगर शिक्षक चाहें तो पढ़ाई का काम पूरा करने के बाड डाक का काम पूरा कर सकते हैं. लेकिन इतनी तत्परता सारे स्कूलों में नहीं दिखाई देती है. समय पर डाक देने वालों और स्कूल के रजिस्टर व्यवस्थित रखने वाले स्कूलों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है. लेकिन समय पर डाक देने और व्यवस्थित अनुशासन का यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि वहाँ पढ़ाई का स्तर भी अच्छा होगा. पढ़ाई का एक स्कूल में कई बातों पर निर्भर करता है. जिनमें सबसे ख़ास है कि बच्चों के साथ कैसा व्यवहार होता है और प्राथमिक कक्षाओं को पढ़ाने में शिक्षक कितनी रुचि ले रहे हैं.

प्राथमिक स्तर की कक्षाओं को पढ़ाने से शिक्षक बचना चाहते हैं. इस बात को प्रत्यक्ष अनुभव के रूप में देखा जा सकता है और बाकी अध्यापकों की राय भी जानी जा सकती है. इसके साथ साथ कुछ शिक्षकों की बच्चों की कक्षा में विशेष रुचि होती है. छोटे बच्चों के पढ़ाई का स्तर सुधारने के लिए “लहर” (लर्निंग एनहांसमेंट स्कीम इन राजस्थान) नाम की योजना चल रही है. इसके संचालने के लिए यूनिसेफ़ की तरफ से फंड मुहैया करवाया जाता है और शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की जाती है. लेकिन लहर के संचालन में ख़ामियों, संसाधन के अभाव और शिक्षकों की उलझन के कारण योजना के प्रभावशाली ढंग से संचालन में दिक्कतें आती हैं. इसके समाधान के लिए प्रयास हो रहे हैं.

कैसे बने बाल मित्र स्कूल? 

 अभी राजस्थान के डूंगरपुर ज़िले में बाल मित्र स्कूल की योजना चल रही है. इसके तहत निजी स्कूलों की भाँति सरकारी स्कूलों को व्यवस्थित करने के तमाम प्रयास हो रहे हैं. इसमें शिक्षकों को प्रशिक्षण देकर भावी जिम्मेदारियों के लिए तैयार किया जाता है. स्टॉफ की बैठक के लिए प्रोत्साहित किया जाता है ताकि वो सभी आपस में अपने अनुभव साझा कर सकें और समस्याओं का समाधान कर सकें. इसके साथ-साथ विद्यालय की योजना बनाने के लिए भी उनको प्रेरित किया जा रहा है. ताकि साल भर की रूपरेखा उनके पास पहले से बनी हो. लेकिन इन सारी बातों को लागू करने के लिए विद्यालयों में पर्याप्त स्टॉफ का होना आवश्यक है.

शिक्षा के अधिकार क़ानून के अनुसार छह से 14 साल की उम्र के हर बच्चे को शिक्षा पाने का हक़ है. प्राथमिक शिक्षा का दायित्व सरकार का है. सरकार उसके लिए एक किलोमीटर के दायरे में स्कूल की व्यवस्था और बच्चों को स्कूल की तरफ आकर्षित करने के लिए विश्व की सबसे बड़ी मध्याहन भोजन योजना चला रही है. इसमें 12 लाख स्कूलों के करीब 11 करोड़ बच्चों को गर्म भोजन दिया जाता है. इसके साथ बच्चों को किताबें भी मुफ़्त दी जाती हैं. इसके अतिरिक्त बच्चों को छात्रवृत्ति भी दी जाती है ताकि वो अपनी पढ़ाई जारी रख सकें. प्राथमिक शिक्षा को प्रभावशाली बनाने के लिए शिक्षकों के प्रशिक्षण पर भी काफी ध्यान केंद्रित किया जा रहा है.

गुणवत्ता का अनसुलझा सवाल..

कुल मिलाकर प्राथमिक शिक्षा के रद्दोबदल के लिए तमाम प्रयास सरकारी और ग़ैर सरकारी संस्थाओं के माध्यम से हो रहे हैं. लेकिन शिक्षा में गुणवत्ता का सवाल बना हुआ है. प्रयासों के बावजूत जड़ता का सवाल भी बना हुआ है. शिक्षक भी खुलकर इस बात को स्वीकार करते हैं कि लोकजुंबिश के दौरान अनिल बोर्डिया के नेतृत्व में शिक्षा की जो अलख राजस्थान में जगी थी. उसका मुकाबला कोई अन्य योजना नहीं कर पाई है. अनिल बोर्डिया एक शिक्षाविद के रूप में चीज़ों को समझते थे और बदलाव के रचनात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से उन्होंने बालिका शिक्षा को राजस्थान में प्रोत्साहित किया और समुदाय को स्कूल बनाने के लिए प्रेरित किया. उनके साथ काम करने वाले शिक्षकों में शिक्षा को लेकर एक अलग नज़रिया है. जो उनके काम के तरीके और व्यवहार में अभिव्यक्ति पाता है.

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