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कभी देखा है, गाँव का स्कूल?

आज का दिन बहुत अच्छा बीता। सुबह की हड़बड़ी से लेकर शाम की धीमी रफ्तार तक बहुत कुछ याद रने लायक है। सुबह जीप को पकड़ने के लिए लगातार दौड़ना, शेरावाड़ा पहुंचकर साढ़ नौ बजे से दस बजे तक इंतजार करना कई पुराने अनुभवों को जीवंत कर रहा था। 

मुझे लग रहा था कि मैं आज भी समय से स्कूल नहीं पहुंच पाऊंगा। उसी रास्ते पर जाने वाले एक गुरू जी से इंतजार के ऊपर बाते हो रही थी कि इस रास्ते की स्थिति जस की तस बनी हुई है। ढाक के तीन पातों की तरह यहां के जीवन में यथास्थिति बहुत गहराई तक घुसी हुई है।

जीप से शेरावाड़ा पहुंचने के सफर के दौरान स्कूल जाते बच्चों की नीली ड्रेस से पता पड़ रहा था कि कैसे खेतों, मैदानों, पहाड़ों और सड़कों से होते हुए बच्चे स्कूल तक जाते हैं। समय की पाबंदी के सबक को उनसे सीखना चाहिए। दूर-दूर से स्कूल आने वाले बच्चों को उनकी स्थिति के लिए जिम्मेदार ठहराने की बात मेरे समझ में नहीं आ रही थी। अपने स्कूल में एक अध्यापक से इसी सिलसिले में बात हो रही थी कि हम बच्चों को स्थानीय परिवेश के ज्ञान से अगर जोड़ पाते हैं तो वे यहां के अनुभवों से बाहर की दुनिया के साथ एक रिश्ता अपनी कल्पना शक्ति और चीजों से जुड़ने की क्षमता के कारण तलाश लेंगे।

इसी के साथ-साथ बातचीत की प्रक्रिया को गंभीरता से देखने और स्कूल में इसके इस्तेमाल के ऊपर बातचीत हुई कि कक्षा-कक्ष में पठन-पाठने के दौरान इसका उपयोग कैसे किया जा सकता है। किताबों से परे ले जाकर उनके अनुभवों के आधार पर बात करने से किसी पाठ को बहुत बेहतरीन ढंग से समझा जा सकता है। जल संरक्षण के ऊपर एक पाठ को पढ़ाने के बच्चों के आग्रह पर मैनें दैनिक जीवन में पानी की आवश्यकता, पानी के श्रोतों और जीवन में इसके महत्व के ऊपर बातचीत करने के साथ-साथ क्लॉस की पेंटिग से लेकर तमाम क्षेत्रों में इसकी उपयोगिता सिद्ध करते हुए संरक्षण के प्रस्ताव का कार्यक्रम सामने रखा।

बाढ़ क्यों आती है, बाढ़ के समय क्या स्थिति होती है, सूखे के समय कैसी परिस्थिति निर्मित होती है, भारतीय कृषि मानसून का जुआ क्यों कहलाती है, सिंचाई में पानी की उपयोगिता को जोड़ते हुए बच्चों नें दसों काम गिनाए, इसके दस श्रोतों का जिक्र भी किया। बातचीत होते-होते इस दायरे में जा पहुंची कि समंदर का पानी अगर खारा है तो हमें क्या, हम तो पालपादर में रहते हैं, कुछ बच्चों ने गुजरात का अनुभव साझा किया कि वहां का पानी खारा है। ( इस दौरान मैनें नदी का समंदर से कैसे रिश्ता जुड़ता है, कैसे जल चक्र का संचलन होता है आदि तमाम बातों को दूर ही रखा। किसी सूचना को संदर्भ से जोड़ने की क्षमता का इस्तेमाल करते हुए उनकी बात को आगे बढ़ाया जा सकता था।

लेकिन बातें जिस प्रवाह में जा रही थीं मैनें जाने दिया और रोकने की कोशिश नहीं की। कई बच्चों को पढ़ने में दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। उनकी मदद कैसे की जाय, इसके बारे में प्रधानाध्यापक जी से मेरी बातचीत हुई। उन्होनें मुझसे पूछा कि आपने दोपहर अवकाश के पहले का समय कैसे बिताया औऱ क्या-क्या किया। अब तक का समय कैसा रहा, यह सवाल सुनकर भी अच्छा लगा। उन्होनें तमाम योजनाओं का जिक्र करते हुए उनके मकसद की समानता का उल्लेख किया। इसी संदर्भ में प्रथम राजस्थान, कर्म विच्छीवाड़ी, लीडरशिप और तमाम योजनाओं पर बात हुई।

संदर्भ व्यक्तियों के वास्तविक काम के बारे में व्याप्त भ्रांतियों के ऊपर भी बात हुई कि कैसे विषय विशेषज्ञ से वे सिर्फ डाक बटोरने के काम तक सीमित रह गए। इसी संदर्भ में शिक्षकों के विभाग में बनने वाले तमाम पदों की तरफ खास तबके के आकर्षण की तरफ भी ध्यान दिलाया कि कैसे वे शिक्षक के काम को छोड़ अधिकारी बनने की राह पर चल पड़े। इसी दौरान शिक्षा संबलन के मानदण्डों के ऊपर भी बात हुई। प्रार्थना सभा को प्रभावशाली बनाने, पुस्तकालय का नियमित उपयोग सुनिश्चित करने, आधार मजबूत करने, बाल संसद को सक्रिय बनाने औऱ पठन-पाठन की प्रक्रिया को और रोचक बनाने के बारे में बात हुई। इसके अलावा कर्म विच्छीवाड़ा के जीरो पीरियड के लिए छात्रों के समूह बनाने की आवश्यकता के बारे में बात हुई। स्टॉफ को प्रेरित करने की जरूरत के ऊपर भी बात हुई। इसी दौरान पाँचवीं तक के स्कूल में पांचवीं क्लॉस के बच्चों के सीखने के स्तर पर भी बात हुई कि कैसे उन्होनें यह क्षमता विकसित की होगी?

इसके अलावा छठी से आठवीं तक के बच्चों को एक बालगीत तैयार करवाया। चेतना गीत के जटिल शब्दों के कारण बच्चों को उसे गाने में वे कठिनाई महसूस कर रहे थे। पहली से चौथी कक्षा तक के बच्चों को श्यामा की गुड़िया…. वाला बालगीत पसंद आया। तीसरी और चौथी क्लॉस के बच्चे एक के बाद दूसरे बालगीत की फरमाइश करते हुए पुराने बालगीतों की लिस्ट खंगाल रहे थे ताकि उनको गाया जा सके। पांचवीं क्लॉस के बच्चों को कहानी सुनाई। पढ़ने में उनको काफी झिझक महसूस हो रही थी। आठवीं क्लॉस के बच्चों का संकोच देखकर लगता है कि उनको काफी सपोर्ट की जरूरत है। ताकि वे खुलकर अपनी बात रख पाएं और पढ़ने के लिए प्रेरित हो सकें। अगली बार जब मैं स्कूल वापस लौटुंगा तो किताबें पढ़ने औऱ लिखने के ऊपर अपना ध्यान देने की कोशिश करुंगा। इसके साथ-साथ प्रार्थना सभा में शामिल होने के साथ-साथ कुछ रोचक गतिविधियाँ करने के ऊपर ध्यान रहेगा ताकि बेहतर स्कूल वातावरण का निर्माण किया जा सके।

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1 Comment on कभी देखा है, गाँव का स्कूल?

  1. अच्छा लगा आपको पढना ।

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