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क्या है त्रिभाषा फॉर्मूला?

वर्तमान में केंद्र सरकार के केंद्रीय विद्यालयों में तीसरी भाषा के रूप में जर्मन की जगह पर संस्कृत पढ़ाने को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. तीसरी भाषा के रूप में जर्मन का अध्ययन करने वालों की तादात करीब 70,000 के आसपास है. इस कारण से यह सवाल और ज़्यादा प्रमुखता के साथ उठाया जा रहा है कि बीच सत्र में भाषा परिवर्तन करना कितना उचित है?

हालांकि केंद्र सरकार की केंद्रीय संसाधन मानव विकास मंत्री स्मृति ईरानी का कहना है कि यह नई व्यवस्था अगले सत्र से लागू होगी. जिसमें तीसरी भाषा के रूप में संस्कृत पढ़ाई जाएगी, जबकि अन्य विदेशी भाषा के बतौर छात्र जर्मन और अन्य विदेशी भाषाओं का अध्ययन कर सकेंगे. 

नीतिगत फ़ैसलों पर हड़बड़ी

भारतीय जनता पार्टी जब जब सत्ता में आती है तब-तब हिंदी और संस्कृत का सवाल अहम हो जाता है. ऐसा पहली बार हो रहा है ऐसा नहीं है. इस संदर्भ में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद ने एक निजी चैनल पर होने वाली बहस में कहा, “भारत में जितने नीतिगत फ़ैसले लिए जाते हैं…उसमें एक हड़बड़ी दिखाई देती है. शैक्षिक सत्र के बीच में इस तरह का फ़ैसला नहीं किया जाना चाहिए था. क्या बच्चे विदेशी भाषा पढ़ना चाहते हैं? क्या संस्कृत पढ़ाने वाले योग्य शिक्षक वहां मौजूद हैं? आपके अंक सुरक्षित रहेंगे. लेकिन भाषा के बारे में क्या आश्वासन है? क्या हमारे देश में हिंदी और अंग्रेजी क़ायदे से सिखाई जा रही है?” उन्होंने अपनी बातचीत में त्रिभाषा फ़ॉर्मूले का जिक्र करते हुए कहा कि इसका कोई संवैदानिक आधार नहीं है.

क्या है त्रिभाषा फॉर्मूला

भारत में सबसे पहले त्रिभाषा फ़ॉर्मूले का जिक्र 1961 में विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक में सामने आया. इसका जिक्र भारतीय भाषाओं के शिक्षण के राष्ट्रीय फोकस समूह के आधार पत्र में मिलता है. इसके बारे में सबसे ख़ास बात है कि यह महज़ पढ़ाने की रणनीति है न कि राष्ट्रीय भाषा नीति. इसका इस्तेमाल 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में किया गया. इसके मुताबिक़ स्कूल में पढ़ाई जाने वाली पहली भाषा मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा होनी चाहिए, जबकि दूसरी भाषा के रूप में ग़ैर हिंदी भाषी राज्यों में अंग्रेज़ी या हिंदी का इस्तेमाल किया जा सकता है, जबकि तीसरी भाषा के रूप में अंग्रेज़ी या किसी अन्य भाषा का चयन किया जा सकता है. इस तरह से त्रिभाषा फ़ॉर्मूला लागू करने के छह संभावित तरीके हो सकते हैं.

क्या है वास्तविक स्थिति?

प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद ने वर्तमान विवाद के संदर्भ में कहा, “त्रिभाषा क्षेत्र का सबसे ज़्यादा फ़ायदा दक्षिण भारत के लोगों ने उठाया है. यूपी और बिहार में संस्कृत लेने का मकसद अधिक अंक लेना था. संस्कृत आपने ली और अधिक नंबर पाने के बाद आप उसे भूल गए. यूपी और बिहार के लोगों ने इसके साथ धोखाधड़ी की है.” उनकी यह बात काफ़ी हद तक सच है कि संस्कृत भाषा में गणित की तरह अंक मिलते हैं. इसलिए एक नंबर देने वाले विषय के रूप में छात्रों की पसंद संस्कृत भाषा होती है. लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए बहुत कम छात्र इस विषय का अध्ययन जारी रखते हैं, इसके अतिरिक्त इस भाषा में करियर की संभावनाएं भी बेहद सीमित हैं और आम बोलचाल में प्रयोग न होने के कारण यह भाषा उतनी दिलचस्प और रोचक नहीं रह गई है. इस परिचर्चा के दौरान यह बात भी सामने आई कि आधुनिक भारतीय भाषा के रूप में संस्कृत को चलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के अलावा और क्या आधार है?

अंततः निष्कर्ष यही है कि भारतीय भाषाओं के बीच आपसी तालमेल होना चाहिए. लेकिन इसके साथ-साथ छात्रों के भविष्य और रुचि को ध्यान में रखते हुए किसी भी भाषा के अध्ययन का विकल्प और अवसर मुहैया कराना चाहिए. पुरानी मान्यताओं के आधार पर किसी भाषा को थोपना उचित नहीं होगा. बतौर ज्ञान की भाषा के रूप में संस्कृत का संरक्षण होना चाहिए, यह अपनी जगह उचित है. लेकिन भाषा को प्रतीकों की राजनीति का मोहरा नहीं बनाना चाहिए.

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