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विश्वविद्यालयः परीक्षा, नंबर और क्लॉस का माहौल

अस्तित्व..हर छात्र को कक्षा में सवाल पूछने और अपनी जिज्ञासा शांत करने का हक़ है। अगर उसे कोई बात समझ में नहीं आ रही है तो उसे बेझिझक अपनी बात कहनी चाहिए। अपनी अनभिज्ञता जाहिर करने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए। इसके साथ-साथ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सिर्फ़ सवाल पूछने के लिए सवाल न पूछे जाएं। इससे उन लोगों को सहूलियत होगी जिनको लगता है कि आपके सवालों के कारण उनका समय बरबाद हो रहा है। हर किसी के सीखने का अपना-अपना तरीका होता है जैसे मैं कुछ अवधारणाओं को सुलझाने के सूत्र खोजने की कोशिश में सवाल पूछता हूं क्योंकि भाषा के बहुत सारे पहलू अनसुलझे हैं और उसके ऊपर बातचीत हो सकती है।  अगर भाषा की कक्षा में सारी बातों को केवल वक़्ता और श्रोता वाले मोड में ही निपटा दिया जाएगा तो शायद यह भाषा की कक्षा के माहौल की प्रकृति के विपरीत होगी। भाषा की किसी भी कक्षा में भाषा का अपनी संपूर्णता के साथ मौजूद होना आवश्यक है।

ख़ासतौर पर किसी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में बाकी विषय के छात्रों को कुछ चीज़ें समझनी ज़्यादा मुश्किल हो जाती हैं…क्योंकि वे हिंदी भाषा और व्याकरण के बहुत से शब्दों से परिचित नहीं होते। ऊपर से प्रोफ़ेसर की अपनी अपेक्षाएं और मान्यताएं होती हैं कि छात्रों को इस स्तर पर इतना तो आना ही चाहिए। उसे बीए और एमए में सारे कांसेप्ट समझाए थे, उसे तो थोड़ा बहुत याद ही होना चाहिए। अगर उसे चीज़ें भूल गईं है तो ग़लती उसकी है….आदि-आदि। भाषा विज्ञान की बात हो और व्याकरण की बात हो तो चीज़ें और ज़्यादा उलझी हुई नज़र आती हैं…क्योंकि या तो चीज़ों को बहुत ज़्यादा आसान बना दिया जाता है या फिर इतना मुश्किल बना दिया जाता है कि वे समझ से परे हो जाती हैं। किसी एक कक्षा से हर छात्र की बनने वाली समझ और लर्निंग भी काफ़ी अलग-अलग होती है। इसमें छात्र की रुचि, अध्यापक के पढ़ाने और समझाने का तरीका, छात्रों के सवालों का जवाब देने का तरीका और छात्रों के साथ संवाद करने का तरीका बहुत मायने रखता है।

कुछ प्रोफ़ेसर अपनी बात को ज़्यादा वस्तुनिष्ठ और सारगर्भित तरीके से बताते हुए छात्रों के तमाम व्यावहारिक चीज़ों से रूबरू करवाते हैं और कोशिश करते हैं कि छात्रों को सारी बात सुगमता से समझ में आ जाए और इसके साथ-साथ वे चीज़ों के बारे में ख़ुद अपनी एक समझ बनाने, अच्छी किताबों को पढ़ने और नोट्स बनाने की प्रवृत्ति अपने भीतर विकसित करें। इसका असर छात्रों के व्यवहार पर भी दिखाई देता है। वे उनकी बातों को गंभीरता के साथ लेते हैं और उनके सुझावों पर अमल करने की कोशिश करते हैं। हाल ही के दिनों में कक्षा में नंबर को लेकर चर्चाओं का बाज़ार गर्म है। कुछ प्रोफ़ेसर कहते हैं कि अगर ऐसा लिखा गया है तो हम नंबर नहीं देंगे, वहीं कुछ का कहना है कि अगर छात्र की भाषा अच्छी है, उसकी मात्राओं में लिखावट की ग़लतियां नहीं है, उसने सारे सवालों को अच्छे से हल करने की कोशिश की है और अच्छी लिखावट में विषयवस्तु को प्रस्तुत करने की ईमानदार कोशिश की है तो उसे अच्छे नंबर दिए गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सवाल छोड़ने वाले छात्रों को नंबर काटकर सबक सिखाना भी जरूरी है, हालांकि यह बात उन्होंने मुस्कुराते हुए कही।

आज कक्षा में एक बात उठी कि उन्ही लोगों को अच्छा नंबर दिया जाएगा जो अवधारणाओं के साथ-साथ कोई न कोई उदाहरण देंगे। इसके अभाव में कैसा भी लिखा गया हो नंबर काट लिया जाए…यह सारी बातें और सारी अपेक्षाएं छात्रों के संदर्भ में हो रही हैं। जो एक बड़ा समूह है। इसके अलावा समूह के हर सदस्य की अपनी-अपनी वैयक्तिक पहचान और विशेषता भी है। एक छात्र इतने सारे लोगों की अपेक्षाओं पर खरा कैसे उतर सकता है। एक छात्र के सवालों का जवाब लिखने का तरीका भी फर्क़-फर्क़ हो सकता है। कोई छात्र हो सकता है कि टू द प्वाइंट लिखता हो और इसके विपरीत यह भी संभव है कि छात्र सवालों में आने वाले शब्दों का अर्थ स्पष्ट करते हुए एक भूमिका बनाएं और सवाल का जवाब देने की कोशिश करे ताकि अपनी समझ को सही तरीके से परीक्षा में व्यक्त कर सके। ऐसे में परीक्षाओं और अंकों के नाम पर छात्रों को आतंकित करने की किसी भी रणनीति का नुकसान ज़्यादा और लाभ कम होता है।

इससे छात्रों की रचनात्मकता पर विपरीत असर पड़ता है। उनके बीच सहयोग की बजाय प्रतिस्पर्धा का एक ऐसा माहौल बनता है जिसमें आख़िर में सिर्फ़ नंबर मायने रखते हैं। जबकि हमारा विषय ऐसा है कि अनुवाद में बिना भाषा और उसकी प्रकृति को समझे हुए सिर्फ़ सिद्धांत लिखकर अच्छे नंबर तो लाए जा सकते हैं। लेकिन अनुवाद का वास्तविक काम करने में हमको कई तरह की दिक्कतें पेश आएंगी। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि विभिन्न मुद्दों पर जारी बहस-विमर्श-सवाल-जवाब के सिलसिले में लेखन और अनुवाद का काम होना चाहिए औऱ इस प्रक्रिया में ही चीज़ों को बेहतर बनाने की कोशिश होनी चाहिए ताकि सीखी जाने वाली बातें सिर्फ़ सुनी हुई बातें न रह जाएं। छात्रों को सीखने के लिए प्रेरित करने वाला और उनके सवालों को उत्साहित करने वाला माहौल छात्रों को अपनी प्रतिभा को निखारने और तमाम अव्यक्त पहलुओं को बाहर आने का मौका देता है। ऐसा करने वाले शिक्षक सिर्फ़ आलोचना करने और छात्रों को हतोत्साहित करने वाले शिक्षकों से इस मायने में बेहतर होते हैं कि वे हर किसी को आगे आने, सीखने और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर पाते हैं। इस पहलू की हमारी शिक्षा व्यवस्था में आज सबसे ज़्यादा आवश्यकता है।

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