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पूरी शिक्षा व्यवस्था लुल्ल हो गई है!

भारत के कई राज्यों से आजकल नकल की ख़बरों के आने का मौसम है। शुरुआत बिहार से हुई। इसके बाद यूपी, मध्यप्रदेश और बाकी राज्यों से भी इस तरह की ख़बरों के आने का सिलसिला जारी है। इस मुद्दे पर लोगों का लिखना भी जारी है। किसी एक क्षेत्र की घटना के आधार पर पूरे प्रदेश के बारे में निष्कर्ष निकालने वाले धुरंधर भी हिंदी पट्टी में मौजूद हैं।

सच कहें तो ‘नकल’ एक राष्ट्रीय रोग है। हर क्षेत्र में इस बीमारी का असर साफ़-साफ़ दिखाई देता है। शिक्षा क्षेत्र कोई अपवाद नहीं है। शिक्षा क्षेत्र के बारे में एक वरिष्ठ ने टिप्पणी करते हुए कहा, “पूरी शिक्षा व्यवस्था लुल्ल हो गई है।” प्राथमिक शिक्षा का बजट कट रहा है, एमडीएम का बजट घट गया है, गुणवत्ता न शिक्षा में है और न स्कूल में परोसे जाने वाले खाने में।

हमारा कोई भी विश्वविद्यालय दुनिया के शीर्ष विश्वविद्यालयों में शामिल नहीं है। बाकी हमारे देश में होने वाले रिसर्च का हाल तो पूछिए मत।  पीएचडी तो ऐसे-ऐसे विषयों पर हो रही है कि उसकी थीसिस पर झाल-मूड़ी बेच ली जाए तो भी रत्ती भर फर्क़ नहीं पड़ेगा। हाँ, कुछ लोग काबिल-ए-तारीफ़ काम भी कर रहे हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन ऐसे लोगों की संख्या काफ़ी सीमित हैं।

आख़िर में कह सकते हैं, “जब शिक्षा मंत्री ही रांग नंबर हो तो शिक्षा व्यवस्था तो लुल्ल हो ही जाएगी।” अब चाहें डी फ़ॉर डॉग कहो..चाहें डी फ़ॉर डिजिटल कहो…का फर्क़ पड़ता है।

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