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व्यक्ति की गतिशीलता का दमन न करें संस्थाएं- बर्गसाँ

आधुनिक दर्शन के इतिहास में हेनरी बर्गसाँ (1859-1941) का महत्व इस बात में है कि वे विश्व को सतत विकासमान प्रक्रिया के रूप में देखते हैं। मगर उसे किसी प्रकार की यांत्रिकता से संचालित नहीं मानते। शिक्षा में सामाजीकरण के संप्रत्यय की बात बड़े जोर-शोर से होती है। इस संदर्भ में उनकी एक बात शिक्षा दर्शन को एक नये विचार के आईने में देखने की गुजारिश करती है।

बर्गसाँ मानते थे कि व्यक्ति गतिशील है जबकि संस्थाएं स्थिरता की ओर उन्मुख रहती हैं। ऐसी स्थिति में दोनों में संघर्ष स्वाभाविक है। अतः संस्थाओं को इतना लचीला होना चाहिए कि वे व्यक्ति की गतिशीलता का दमन न करें तथा उसकी सर्जनात्मकता के नये विस्फोट से स्वयं को जीवंत बनाये रख सकें।

रूढ़ियों में जकड़ा हुआ समाज आततायी हो जाता है, लेकिन वह सर्जनात्मकता को नष्ट नहीं कर सकता बल्कि इस प्रक्रिया में स्वयं ही विघटित हो जाता है। सृजनशील प्राणशक्ति को विश्व-प्रक्रिया की प्रेरणा मानने के कारण बर्गसाँ का दर्शन मानवीय भविष्य में आस्था पैदा करता है और संकट में साहसपूर्ण संघर्ष की प्रेरणा देता है।

संदर्भः नन्दकिशोर आचार्य की पुस्तक ‘आधुनिक विचार’ में प्रकाशित आलेख ‘सृजनात्मक विकासवाद: बर्गसाँ’।

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