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अगर ऐसा होता तो भारत एजुकेशन की ‘सुपर पॉवर’ बन जाता…

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अपनी अज्ञानता की निरंतर खोज ही शिक्षा ही।

शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वालों का नज़रिया कैसा होना चाहिए? यह एक बहुत जरूरी सवाल है। मगर इसे कई बार अनदेखा किया जाता है। अगर कोई ख़ुद अपने अनुभवों पर विचार नहीं करता। किसी को ग़ौर से नहीं सुनता। किसी को समझने की कोशिश नहीं करता। बच्चे के साथ समानुभूति का व्यवहार नहीं करता। अभिभावकों को उनकी परिस्थिति और संस्कृति के जोड़कर नहीं देख पाता तो क्या उसे इस क्षेत्र में काम करना चाहिए?

इस सवाल का जवाब हाँ भी हो सकता है और नहीं भी। प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में अपने छोटे अनुभव से मैं इतना जान पाया हूँ कि बच्चों के साथ काम करना हमें बदलता है। आंतरिक बदलाव से संपन्न करता है। इस क्षेत्र में काम करने वाले बहुत से शिक्षक प्रशिक्षक और शिक्षक इस बात को स्वीकार करते हैं। मानते हैं। इस बात में भरोसा करते हैं।

बदलाव का फ़ॉर्मूला

ऐसा ही भरोसा बाकी लोगों को भी होना चाहिए, अगर नहीं है तो वे बाकी लोगों के भरोसे को बट्टा लगाते हैं। अपने काम को लोहे मंडी जैसा मानते हैं….जहाँ गरम लोहे पर हथौड़े के हर प्रहार का एक निश्चित असर होता है। अगर शिक्षा का क्षेत्र ऐसा ही होता तो बदलाव की कहानियां इतनी लचीली नहीं होतीं। वे किसी फॉर्मुले पर फिट हो जातीं और भारत भी फिनलैंड बन जाता। आबादी के लिहाज से ‘सुपर पॉवर’ बनना आसान है, मगर एजुकेशन की सुपर पॉवर बहुत मुश्किल है। क्योंकि ऐसा बदलाव सालों की कोशिश और लंबे धैर्य के बाद होता है।

किसी भी देश में शिक्षक केवल क्रियान्वयन वाली भूमिका में नहीं हो सकता। उसे ऐसा प्रशिक्षण मिलना चाहिए ताकि वह शिक्षा के क्षेत्र में होने वाले शोध से निकले निष्कर्षों को अपने स्कूलों में लागू कर सके। नए विचारों को सामने रख सके। स्कूल की परिस्थिति में क्या काम करता है, क्या काम नहीं करता है। कौन सी ऐसी नीतियां हैं जिसमें बदलाव होना चाहिए? ऐसे मुद्दों पर उसकी राय बहुत मायने रखती है।

बदलते समय के साथ खुद को अपडेट करें

मान लीजिए अगर किसी स्कूल स्टाफ की कमी है तो उसका स्कूल के संचालन और बच्चों की पढ़ाई पर क्या असर पड़ता है, इसके जवाब में अच्छे तर्क उसके पास होने चाहिए। इसके साथ ही समाधान भी कि अगर इस तरीके से चीज़ों को व्यवस्थित करने की कोशिश की जाए तो इतना काम तो हो जाता है, मगर इससे ज्यादा परिणाम हासिल नहीं होते। क्योंकि अधिकारियों का जवाब होता है कि सरकारी स्कूल में काम करने वाले सभी शिक्षकों ने बीएड या एसटीसी की ट्रेनिंग ली हुई है, सबको पता कि कम स्टाफ होने पर चीज़ों को कैसे मैनेज किया जाता है? स्कूल में बच्चों के साथ निरंतर काम करते हुए, अपने अनुभव से जानते हैं कि बच्चों को पढ़ाने का काम केवल प्रबंधन का मामला नहीं है। उनको स्कूल में बुलाने और केवल एमडीएम खिलाकर उसकी डाक भर देने का काम नहीं है।

हर बच्चे का स्तर उसकी कक्षा के अनुरूप हो। इसके लिए जरूरी है कि हर बच्चे के ऊपर ध्यान दिया जाए। कोई भी बच्चा पीछे न रहे। शिक्षकों को नामांकन का टारगेट न दिया जाए ताकि उनको अपना स्थानांतरण रोकने के झूठे दबाव में अंडरएज़ बच्चों के नामांकन जैसे रास्ते न अपनाने पड़े। स्कूल में अगर भयमुक्त माहौल की बात होती है तो शिक्षकों को आज़ादी होनी चाहिए। स्कूल में पर्याप्त स्टाफ होना चाहिए। प्रशिक्षण का स्तर भी उसी गुणवत्ता का होना चाहिए ताकि प्रशिक्षण कक्ष में बैठने के बाद यह म महसूस हो कि यहां आने से तो बेहतर होता कि स्कूल में बच्चों के बीच होते। अपनी बात को तथ्यों के साथ रखने के लिए जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी। बच्चों के साथ क्लासरूम में होने वाले अनुभवों पर ग़ौर करना होगा। उसे अपनी डायरी में लिखना होगा। क्लासरूम की चुनौतियों के बारे में शिक्षक साथियों व शिक्षक प्रशिक्षकों से परामर्श करके समाधान निकलना होगा, केवल समस्याओं के अंबार की दास्तां सुनाने से बात नहीं बनेगी।

ऐसे में बहद जरूरी है कि शिक्षक साथी बदलते समय के साथ खुद को अपडेट करे और अपनी भूमिका को भविष्य में बदलने वाले परिदृश्य के संदर्भ में देखने की कोशिश करे क्योंकि आने वाले समय में ढेर सारी चुनौतियां और सवाल सामने होंगे जिनका जवाब शिक्षकों को देना होगा। इसके अलावा बतौर शिक्षक प्रशिक्षक हम जो अपेक्षाएं हम एक शिक्षक से करते हैं,  उन अपेक्षाओं पर हमें भी खरा उतरना होगा। तभी शिक्षा के क्षेत्र में एक स्थाई बदलाव की पहल को आगे बढ़ने का रास्ता दिया जा सकता है। बदलाव की एक ऐसी कहानी लिख जा सकती है जिसकी चर्चा आने वाले समय में मिशाल के तौर होगी।

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