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टीचर एजुकेटरः कैसे करें स्कूल जाने की तैयारी?

स्कूल जाते बच्चे, स्कूली शिक्षाहर पोस्ट में शिक्षकों, बच्चों, नीतियों और क्लास के माहौल की चर्चा होती है। ऐसे में लगा कि शिक्षक प्रशिक्षकों के लिए भी एक पोस्ट लिखनी चाहिए। अक्सर लोग सवाल पूछते हैं कि हमें स्कूल जाने की तैयारी कैसे करनी चाहिए? प्रधानाध्यापक से कैसे और क्या बात करनी चाहिए? शिक्षकों के सवालों का क्या जवाब देना चाहिए? अगर कोई बहुत आक्रामक तरीके से बात करता है तो क्या करना चाहिए?

हर सवाल है जरूरी

स्कूल जाने से पहले संभावित सवालों और उनके जवाब के बारे में पहले से विचार कर लें। स्कूल में प्रधानाध्यापकों के साथ-साथ बाकी शिक्षकों से भी मिलें। इससे उनको ये नहीं लगेगा कि उनको अनदेखा किया जा रहा है। अपनी बात को अच्छे से रखें। किसी भी तरह के नकारात्मक सवाल या कमेंट को तवज्जो दें। अगर शिक्षक कोई नीतिगत समस्या का जिक्र करते हैं तो आपको केवल सुनना चाहिए। अगर आप अपनी राय नहीं देंगे तो बेहतर होगा। इससे आपका ध्यान स्कूल विज़िट के मुख्य उद्देश्य से नहीं हटेगा।

अपने काम को रुचि से करें

आपने जो योजना बनाई है उसका क्रियान्वयन करें। आप स्कूल में कोई भी नई गतिविधि न करें। बच्चों से बातचीत के लिए पहले से तैयारी कर लें। ताकि बच्चों के साथ सीधे संवाद के दौरान सहज रहें। सभी बच्चों को गतिविधि में शामिल होने का मौका दें। इससे शिक्षकों को इस बात का भरोसा होता है कि आपको इस काम में रुचि है और आप अपना काम महज औपचारिकता या दिखावे के लिए नहीं कर रहे हैं।

आप जो कहते हैं, उसे करके दिखाएं

बच्चों के साथ कोई भी गतिविधि करते समय अगर बच्चे आपकी बात नहीं सुनते हैं। मनमानी करते हैं तो उनको समझाने की कोशिश करें। उनका ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए कोई गतिविधि करें। उनके ऊपर बिल्कुल भी नाराज न हों। बच्चों के बारे में आपका व्यवहार आपके मूल्यों के अनुसार होना चाहिए कि एक स्कूल में भयमुक्त माहौल होना चाहिए। बच्चों को किसी तरह की सज़ा नहीं मिलनी चाहिए। इससे आपको बच्चों के बारे में अपना पक्ष रखने में सहूलियत होगी।

इस तरह से बतौर शिक्षक प्रशिक्षक आपको स्कूल विज़िट के दौरान कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। स्कूल से आने के बाद या स्कूल के दौरान अपना नोट्स लेना चाहिए। क्योंकि हर चीज़ को याद रखना संभव नहीं होता। बच्चों और शिक्षकों के कोट्स को नोट कर सकते हैं ताकि उनके शब्दों पर फिर से ग़ौर करने का मौका मिले। किसी के बारे में कोई पूर्वाग्रह न बनायें। चीज़ें बदलती हैं। परिस्थितियां बदलती हैं। मगर तथ्यों को नज़रअंदाज न करें, क्योंकि हमारे काम का आधार वही होते हैं।

आख़िर में दो बातेंः

इसलिए अपने विचारों को तथ्यों की कसौटी पर कसकर ही स्वीकार करें। ज़मीनी स्तर पर आने वाली समस्याओं का समाधान खोजते रहें। लगातार पढ़ते रहें। व्यावहारिक ज्ञान के साथ-साथ इस क्षेत्र में होने वाली नई रिसर्च से खुद को अपडेट करना व शिक्षकों के साथ उसे आसान भाषा में साझा करना एक अच्छा अनुभव हो सकता है। शिक्षक अपने अनुभव से बता सकते हैं कि उस विचार को किस हद तक अपने स्कूलों में लागू किया जा सकता है। या उसमें क्या अपेक्षित बदलाव करके, उस विचार को अपने स्कूल के अनुकूल बनाया जा सकता है।

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