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अक्षरों को अंगूठा दिखाने वाला बच्चा पढ़ता है किताब

मिट्टी के खिलौने, बच्चा का खेल, गांव का जीवन, बच्चे कैसे सीखते हैं

गाँव में मिट्टी के खिलौने बनाते हुए बच्चे।

अक्षरों पर अंगुली फेरें या अंगूठा? ऐसे सवाल से आपका सामना शायद ही कभी हुआ होगा। क्योंकि आपके जमाने में ‘क’ से कबूतर हुआ करता था। ‘ख’ से खरगोश हुआ करता था। बड़ी आसानी से आपको हिंदी के लगभग सारे अक्षर याद हो जाते थे।

फिर गणित के जोड़ वाले प्रतीक का इस्तेमाल करके बिना मात्रा वाले शब्दों को पढ़ने के अथक प्रयास के बाद आप शब्दों को पढ़ पाते थे। इस तरह धीरे-धीरे शब्दों से बेजान वाक्यों से आपका परिचय होता था। जैसे कमल घर चल। खटपट मत कर। इस तरह से आप पढ़ना सीख जाते थे।

पढ़ना सीखने का परंपरागत तरीका

फिर मात्राओं की बात होती थी। बारहखड़ी रटने की सिलसिलेवार कोशिश के बाद बच्चे मात्राओं वाले शब्दों को पढ़ना सीखते थे। हमने कैसा पढ़ना सीखा, पूरी तरह याद नहीं है। मगर बारहखड़ी को रटने की याद मुझे नहीं है। मात्राओं की समझ कैसे बनी, यह भी याद नहीं है। पढ़ाई और पिटाई वाले रिश्ते की याद जरूर आती है कि पढ़ाई का मतलब एक खौफ हुआ करता था। इसके बीतने वाला लम्हा एक जेल से आज़ादी होती थी। हर बार डांट पड़ती थी कि एक बार में पूरा वाक्य देखकर क्यों नहीं लिखते। ऐसा करने की कोशिश करो। ऐसी डांट खाने वाले बच्चे को ढेर सारे वाक्य लिखने के लिए अब किसी किताब का सहारा नहीं लेना पड़ता, यह और बात है।

कॉमिक्स की किताबें नहीं होतीं तो अपने पढ़ने की रुचि का क्या होता? कहना मुश्किल है। कॉमिक्स की किताबों के साथ-साथ चंपक, नंदन, लोटपोस, बालहंस जैसी किताबों की भी बड़ी भूमिका है। स्कूल वाली लायब्रेरी से पुरानी-पुरानी किताबें मिलती थीं, जिसको चांदनी रातों में बिना किसी रौशनी के पढ़ा करते थे। इस पर सुनाई पड़ता, “अंधे हो जाओगे।” बिजली की रौशनी में पढ़ो, मगर चांदनी रातों में जब किताब में छपे पैराग्राफ साफ-साफ दिखाई दे रहें हों तो किसे परवाह होती है कि रौशनी है या नहीं। या फिर कम रौशनी में पढ़ने से आँखों को क्या नुकसान होगा। इस तरीके से पढ़ने वाली रुचि ने धीरे-धीरे अपना विस्तार पाया। साइंस की किताबों में घूमने का भरपूर स्कोप मिला। मगर किताबों के पढ़ने वाले चस्के का ऐसा असर रहा कि हिंदी में कभी भी अपने नंबर 70 से कम नहीं आए।

पढ़ने का मतलब सिर्फ हिंदी नहीं

मगर पढ़ाई का मतलब सिर्फ हिंदी ही तो नहीं होता। इसलिए अंग्रेजी भी पढ़नी पड़ी। गणित भी पढ़नी पड़ी। कला और विज्ञान में भी हाथ बढ़ाना पड़ा। बारहवीं में साइंस का चुनाव करना पड़ा। इसके बाद फिर से आर्ट्स या सोशल साइंस में वापसी के दौरान लगा कि इस पढ़ाई का तो असल ज़िंदगी से सीधा रिश्ता है। इसी सिलसिले में भूगोल, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र जैसे विषयों से पाला पड़ा। समाजशास्त्र को पढ़ते हुए लगा कि समाज के असली शास्त्र से इसका बहुत कम वास्ता पड़ता है। असली समाजशास्त्र तो लोगों के असल जीवन में धड़कता-फड़कता मौजूद है।

अर्थशास्त्र का तो चारो तरफ वर्चस्व नजर आता था क्योंकि इसको पढ़ाने वाले सर के उदाहरण गली मोहल्ले से होते हुए समसामयिक घटनाओं से जुड़ते थे। इसके कारण इस विषय से विशेष रिश्ता बना। पर मनोविज्ञान के सिद्धांत ने अपनी तरफ जब खींचना शुरू किया तो लगा कि इस क़ैद से तो कोई रिहाई नहीं है। मगर अंततः तर्क की प्रधानता वाले लोगों से सलाह मिली की अर्थशास्त्र ही पढ़ो, इसका रास्ता बाज़ार से होकर जाता है। मगर आगे जाकर पता लगा कि अपने मन का रास्ता तो समाज से होकर जाता है। बाज़ार से बस उतना ही वास्ता है, जितने से काम चल जाये और अपना कोई काम रुके नहीं। इसका असर जीवन के आने वाले वर्षों पर भी पड़ा। आज भी उसी रास्ते पर चलने की कोशिश जारी है।

अपना बचपन याद आता है

अक्षरों पर अंगुली की जगह अंगूठा फेरने वाले बच्चे में अपना बचपन दिखाई देता है। ऐसा लगता है जैसे हर सिद्धांत को जीवन के व्यवहार और नये उदाहरणों से चुनौती दी जा सकती है।  इस बच्चे की मुट्ठी में सारे अक्षर हैं। मात्राएं उसके इशारों पर नाचती हैं। वह किताबों को बड़े आनंद के साथ पढ़ता है। वह कितना कुछ जानता है, हमें इसका अंदाजा नहीं है। क्योंकि उसके घर की भाषा गरासिया है। जिसमें हम उससे संवाद नहीं कर सकते। मगर वह हिंदी में सवालों के जवाब देता है। उसके बनाये वाक्यों की संरचना में गरासिया के शब्द झांकते हैं। मुस्कुराते हैं।

जब वह गांव में होता है तो अपने चारो तरफ फैली दुनिया में तल्लीनता से खो जाता है। वह बच्चों के साथ मिट्टी के खिलौने बनाता है। जब वह क्लास में होता है तो दूसरे बच्चों को पढ़ने में मदद करता है। किताबों के चित्रों के साथ संवाद करने की उसकी योग्यता अद्भुत है। वह तेज़ी से चीज़ों को सीखता है और हर सवाल का बड़ी तेज़ी से जवाब देता है। उसकी ज़िंदगी की प्रवाह यों ही कायम रहे। कहानी की किताबों से उसका रिश्ता दिनों-दिन और मजबूत हो। मेरे मन की बस यही अभिलाषा है। अगले कुछ महीनों में बच्चों की भाषा में बच्चों से संवाद कर पाऊं। ऐसी हसरत है। देखते हैं क्या होता है? अपनी तरफ से कोशिश जारी है।

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