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विश्लेषणः 2019-20 के बजट में शिक्षा क्षेत्र की कैसी तस्वीर बन रही है, पढ़िए इस पोस्ट में

img_20190706_010026995395143211079814.jpg2019-20 के बजट में शिक्षा क्षेत्र को कुल 94,854 करोड़ की राशि आवंटित की गई है। 2018-19 के बजट से इसमें 10,000 करोड़ की बढ़ोत्तरी की गई है। इस बजट की सबसे महत्वाकांक्षी योजना है नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन को ज़मीनी स्वरूप देना। 

शिक्षा क्षेत्र के लिए आवंटित कुल राशि में से 56,536.63 करोड़ स्कूली शिक्षा के लिए निर्धारित किया गया है। वहीं उच्च शिक्षा के लिए 38,317 करोड़ रुपये उच्च शिक्षा के लिए आवंटित किए गए हैं।

समग्र शिक्षा अभियान और ‘शिक्षक प्रशिक्षण’

समग्र शिक्षा अभियान के लिए 36,322 करोड़ का आवंटन किया गया है। वहीं मिड डे मील योजना के लिए 11,000 करोड़ रूपये का आवंटन किया गया है। 2018-19 के बजट में निर्धारित कुल राशि से 500 करोड़ रुपये ज्यादा है।

ग़ौर करने वाली बात है कि शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए मात्र 125 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। आवंटित की गई राशि 2018-19 के बजट में निर्धारित 871 करोड़ रुपये की राशि से काफी कम है।

शिक्षा और नवाचार के लिए आवंटित राशि को पिछले वित्तीय वर्ष 2018-19 से बढ़ाकर 609 करोड़ किया गया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ‘नेशनल रिसर्च फाउण्डेशन’ की स्थापना का प्रस्ताव भी पेश किया।

बजट में ‘गांधी’ का भी जिक्र

बाहर से आने वाली किताबों पर 5 प्रतिशत आयात कर लगेगा, यानि विदेश से आने वाली किताबें और पत्रिकाओं की कीमत बढ़ जाएगी। यह जानकारी वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने ‘सपनों का बजट’ कार्यक्रम में शिक्षा के मुद्दे का जिक्र करते हुए कहा है।

gandhi-education-mirrorमहात्मा गांधी पर शिक्षा देने के लिए ‘गांधीपीडिया’ का जिक्र किया गया है। लेकिन ग़ौर करने वाली बात है कि हाल ही में एक राज्य सरकार की आठवीं की पाठ्यपुस्तकों की महान विभूतियों वाले चैप्टर में विनोबा भावे और अन्य लोगों का जिक्र मिलता है। लेकिन इस सूची से गांधी और नेहरू ग़ायब हैं। यह चीज़ें अनजाने में हों रही हैं, इस बात का शायद ही कोई भरोसा करेगा।

2019 के बजट में उच्च शिक्षा के मद में यूजीसी और ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन के बजट में कटौती की गई है। हालांकि केंद्रीय विश्वविद्यालयों को आवंटित होने वाली कुल राशि को 400 करोड़ बढ़ाकर 6,843 करोड़ कर दिया गया है। भारत के आईआईटी को 6,410 करोड़ का आवंटन किया गया है जो पिछले वित्त वर्ष 2018-19 में कुल 6,326 करोड़ का आवंटन किया गया था।

पहले मिली IIMs को स्वायत्ता, फिर बजट में कटौती

देश के प्रतिष्ठित प्रबंध संस्थानों यानि आईआईएम को पिछले वित्तीय वर्ष में स्वायत्तता दी गई थी। इसका प्रत्यक्ष असर इस बजट में दिख रहा है। 2018-19 में आईआईएम के लिए 1,036 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था, वहीं 2019-20 के बजट में आईआईएम के लिए केवल 445.5 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है।

आखिरी में बतौर निष्कर्ष कह सकते हैं कि नई शिक्षा नीति के मसौदे में जिस तरह के बदलाव का जिक्र किया गया है, उन अपेक्षाओं पर यह बजट पूरी तरह खरा नहीं उतरता है। नई शिक्षा नीति के मसौदे में सार्वजनिक व स्कूली पुस्तकालयों को बेहतर करने की बात कही गई है, लेकिन इस क्षेत्र के लिए कितना आवंटन किया गया है, इसका कोई आँकड़ा उपलब्ध नहीं है।

निजीकरण व पीपीपी को बढ़ावा देने के स्पष्ट संकेत

इसके साथ ही विश्वविद्यालयी शिक्षा व शोध के लिए जरूरी किताबों व पत्रिकाओं पर जो विदेश से आती हैं आयात कर लगाने की बात भी ‘नॉलेज इकॉनमी’ को बढ़ावा देने वाली नहीं प्रतीत होती है। शिक्षकों के प्रशिक्षण पर जब ज्यादा ध्यान देने की बात पूरे शैक्षिक जगत में हो रही है, इस मद में बजट की कटौती का विपरीत असर होगा, यह बात तय मानी जा रही है।

स्वायत्तता और निजी क्षेत्र से सहयोग दोनों साथ-साथ चलने वाली प्रक्रिया हैं, जो शिक्षा के क्षेत्र में जरूरी बदलाव के लिए लाई जा रही हैं। लेकिन निजी क्षेत्र के भरोसे सार्वजनिक शिक्षा की स्थिति को बेहतर बनाना एक दिवास्वपन मात्र है, शिक्षा की जिम्मेदारी सरकारी की है और सरकार को ही पहल करनी होगी। निजी क्षेत्र से ऐसी उम्मीद तो की जा सकती है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर क्या बदलाव होगा कहना मुश्किल है। निजीकरण और पीपीपी मॉडल को बढ़ावा देने के साफ संकेत भी इस बजट से मिल रहे हैं।

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