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शिक्षकों और लाइब्रेरी में नई किताबों की माँग के लिए धरना दे रहे हैं पिथौरागढ़ के छात्र

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पूरे भारत में यह समय नर्सरी से लेकर विश्वविद्यालय स्तर पर प्रवेश के जश्न मनाने का है। लेकिन उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में छात्र धरने पर बैठे हैं, उनकी माँग है कि उनके कॉलेज में खाली पड़े सभी पदों पर शिक्षकों की नियुक्ति की जाए और उनके कॉलेज की लाइब्रेरी में नई किताबों की पहुंच सुनिश्चित की जाए ताकि उनकी पढ़ाई का कार्य सुचारु रूप से हो सके।

लाइब्रेरी में नई किताबों की माँग के लिए होने वाले इस आंदोलन से मन ख़ुश होता है कि कहीं तो किताबों की चर्चा हो रही है, कहीं तो उनके लिए कोई सड़कों पर है। सुर्खियों में है और खबरों में है। हमारे ही देश में पुस्तक संस्कृति के नाम से एक पत्रिका निकलती है, लेकिन पुस्तक संस्कृति की डगर कितनी मुश्किल और पथरीली है उसे छात्रों के इस धरने से समझा जा सकता है।

धरने को देश के विभिन्न हिस्सों से मिल रहा है जनसमर्थन

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ स्थित लक्ष्मण सिंह महर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में 6,900 विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। यहाँ पिथौरागढ़ के अलावा अल्मोड़ा और चम्पावत जिले के विद्यार्थी पढ़ते हैं। इस महाविद्यालय में शिक्षकों के 120 पद स्वीकृत हैं, लेकिन 40 पद खाली पड़े हैं। महाविद्यालय की लाइब्रेरी में मौजूद किताबें बहुत पुरानी हैं। इसीलिए यहाँ पढ़ने वाला छात्र 20 दिनों से ज्यादा दिन से लगातार अपनी दो प्रमुख माँग शिक्षक और पुस्तक के लिए धरना दे रहे हैं।

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छात्रों के इस धरने को पूरे देश के विभिन्न हिस्सों से जनसमर्थन मिल रहा है। इसी कड़ी में बच्चों की माताओं ने भी इस माँग के समर्थन में अपनी आवाज़ लोगों तक पहुंचाने का प्रयास कर रही हैं।

‘परीक्षा काल में आंदोलन’

छात्र-छात्राओं के पक्ष में अपनी आवाज़ मुखर करते हुए उत्तराखंड के एक शिक्षक साथी और कवि महेश पुनेठा लिखते हैं।

परीक्षा काल में आन्दोलन
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जिस समय उन्हें
परीक्षा कक्ष में
धैर्य से
पूछे गये प्रश्नों के
उत्तर लिखने थे
वे शिक्षकों की कमी को लेकर
धरने में
बैठने की जल्दी में
परीक्षा कक्ष से निकल रहे हैं

जिस समय उन्हें
किताबों में
अगले दिन के पेपर में
पूछे जाने वाले प्रश्नों के
उत्तर तलाश करने थे
वे किताबों की कमी को लेकर
सडक पर उतर
मौन जलूस निकालने को मजबूर हैंउनके हाथ में तख्तियां हैं
कि ये सारे मौन स्थिर चुप
आग और हरकतों से भरे हैं।
यह मौन जब टूटेगा
सैलाब बन कर फूटेगा ।
यह चुप्पी नहीं मौन है
चीख कर पूछता जिम्मेदार कौन है।

आखिर वे न तख्त मांग रहे हैं
और न ताज
फिर भी यह उपेक्षा क्यों ?
यह चुप्पी क्यो?

आखिर कब तक
उनकी धैर्य की परीक्षा ली जायेगी?

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आखिर में यही कहना है कि इस धरने को उसकी सफलता की मंजिल मिले। विद्यार्थियों की माँग को संवेदनशील तरीके से हल किया जाये। छात्रों को किसी तरीके से परेशान न किया जाये और उनके ऊपर कोई दबाव न बनाया जाये। बतौर सजग नागरिक हम उनकी माँग का समर्थन करते हैं।

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