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पुस्तक चर्चा: दोस्ती की जीवंत मिसाल है ‘किकि’

अपने माता-पिता और दो छोटे भाइयों फाबि और फ्लो के साथ आन्त्ये गाँव में रहने के लिए आ जाती है। पतझड़ के मौसम में शहर से बाहर गाँव में रहने के लिए आना आन्त्ये के लिए नये माहौल से सामंजस्य बैठाने की कोशिश करने वाला समय होता है। शुरुआत में उसे लगता है कि वे कुछ दिनों के लिए यहाँ आये हैं, लेकिन माँ बताती है कि अब वे यहीं रहेंगे। यहाँ आने के बाद से आन्त्ये को अपना स्कूल, पुरानी टीचर जो शनिवार को बच्चों को होमवर्क नहीं देती थीं ताकि सप्ताहांत अच्छा बीते बहुत याद आते हैं।

स्कूल में आन्त्ये की बेर्बल से दोस्ती होती है, जिसके पास ढेर सारी बार्बी गुड़िया होती हैं। बेर्बल के घर आना और उन गुड़ियों से खेलना और केक खाना आन्त्ये को काफी अच्छा लगता है। लेकिन उसकी ज़िदगी में असली ख़ुशी तब शामिल होती है जब उसकी माँ अपने पड़ोस में रहने वाले एक परिवार के घर ले जाती हैं, जहाँ उसकी दोस्ती किकि से होती है।

किकि से दोस्ती

किकि से दोस्ती की शुरूआत बड़े रोचक अंदाज़ में होती है। यह दोस्ती आन्त्ये को भीतर ही भीतर बदलने लगती है, उसकी पसंद। उसके सोचने का तरीका और दुनिया को समझने का तरीका भी बदलता है। किकी की पुरानी गुड़ियों के संग्रह में दिलचस्पी होती है और वह पुरात्तवविद बनना चाहती है ताकि पुरानी चीज़ों को खोजने का आनंद उठा सके। वह ऐसी कोशिश भी पड़ोस के खेतों व पहाड़ी टीलों पर जाकर करती है, इस काम में आन्त्ये भी उसके साथ होती है। किकि की सशक्त मौजूदगी इस लघु उपन्यास में हर जगह मौजूद होती है। दुकान से चोरियां करने वाले लम्हे भी इस कहानी में आते हैं। इसके बाद इंसानों के प्यार करने के तौर-तरीकों पर भी बड़ी सहज भाषा में संवाद होता है।

बीमार होने पर एक-दूसरे को याद करने वाले लम्हे में दोस्ती समानुभूति के उन अहसासों से गुजरती है, जो उनकी दोस्ती को प्रगाढ़ बना देती है। परिवार के रिश्तों में भी यह प्रगाढ़ता झलकती है। अपने ग़रीब होने का अहसास आन्त्ये को होता है, जब वह ऐसे संवाद से रूबरू होती है कि उनके पास इतने पैसे नहीं हैं कि वे छुट्टियों में कही घूमने जा सके। परिवार में बिल्ली पालने के सवाल पर छुट्टियों में कहीं न जा पाने वाले काल्पनिक समस्या को भी वह बखूबी समझ पाती है। बिल्लियां केवल चूहे मारने के लिए हैं और उनके नाम व बाकी सारी चीज़ों का कोई अर्थ नहीं है, यह बात बड़ों व बच्चों के नज़रिये को साफ-साफ सामने लाती है।

दोस्त से बिछुड़ने का ग़म

किकि की एक दुर्घटना में होने वाली मौत आन्त्ये को बड़े होने का अहसास देती है। वह जानती है कि उसकी कब्र में रखी जाने वाली गुड़िया किस्टर्न किकि को नहीं मिलेगी। उसे यह भी शक होता है कि किकि ताबूत के भीतर है भी या नहीं। किकि उसे ऊपर से देख रही है तो उसके नये कोट भी वह देख रही होगी। ऐसे विचारों से आन्त्ये रूबरू होती है। यह किताब पाठकों को वास्तविक जीवन के अनुभवों से रूबरू कराती है। ग़रीब व अमीर के फर्क़ को भी स्वाभाविक ढंग से महसूस करने का अवसर देती है। कहानी का अंत दुःखद है। लेकिन आन्त्ये जब कहती है कि यह कहानी का अंत नहीं है, वह अपनी बेटियों के साथ किकि की कब्र पर आती है। उसका ख्याल रखती है और अपनी बेटियों को किकि की कहानी सुनाती है तो लगता है इसे पढ़ते हुए पाठक यथार्थ के धरातल से जुड़े रहते हैं।

अनुवाद और चित्रांकन

इस किताब में टीना गोपाल का का अनुवाद जीवंत है। इसे पढ़ते हुए एक सहजता का अहसास होता है। वाक्य संरचना के हिसाब से शुरूआत में थोड़ी मुश्किल पैदा होती है। लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है अनुवाद की सहजता कहानी को प्रवाहपूर्ण बनाती सी लगती है। लेकिन जैसे ही कुछ पन्ने पढ़ते हैं, यह समस्या समाप्त हो जाती है। यह किताब उच्च प्राथमिक व माध्यमिक स्तर तक के बच्चों के लिए काफी उपयुक्त है। इसे खुद से पढ़ने का अनुभव बच्चों के साथ-साथ किशोर-किशोरियों समेत हर उम्र के पाठकों के लिए सार्थक अनुभव होगा, यह बात इसे पढ़ने के बाद भरोसे के साथ कही जा सकती है।

इस किताब के चित्र सुंदर और कलात्मक हैं। वे कहानी से जुड़ते हैं। चित्रों को लेकर सुंदर बात भी इस किताब में है कि चित्र के मायने उसे देखने वाले को खुद ही खोजने होते हैं। आन्त्ये दाम्म के बनाये चित्र कहानियों को एक जीवंतता प्रदान करते हैं और कहानी को पढ़ने के बाद उसे एक चित्र के रूप में डिकोड कर लेने जैसी आसानी पाठक को हो जाती है। शर्बत का दृश्य देखकर दोस्ती की शुरूआत का लम्हा जीवंत हो जाता है। वहीं कोट में एक हाथ डालकर किकि के बनाये ‘श्रीमान हास’ को कसकर पकड़े हुए थी और उसे मसल रही थी, यह दृश्य एक बच्चे के मन में चलने वाले द्वंद को सटीक अभिव्यक्ति देती है। ऐसे साहित्य का अनुवाद जरूरी है ताकि हम नयी कहानियों और बाल साहित्य से परिचित हो सकें।

किताब का संक्षिप्त परिचयः ‘किकि’ किताब के लेखक और चित्रांकनकर्ता आन्त्ये दाम है। यह किताब मूल रूप से जर्मन भाषा में लिखी गई है। जर्मन से हिन्दी भाषा में इसका अनुवाद टीना गोपाल ने किया है। इसे एकलव्य ने पराग इनीशिएटिव के सहयोग से प्रकाशित किया है। इसकी कीमत 65 रूपये है।

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