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बाल दिवसः ‘एक भारत में बच्चों की कितनी दुनियाएं हैं’

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 माँ के साथ स्कूल जाती बेटियां। 

आज बाल दिवस यानि 14 नवंबर को दिनभर की चर्चा में बच्चों का जिक्र हो रहा था। ये वे बच्चे थे जो विद्यालय में न आकर मदरसे में पढ़ने जाते हैं। उनका नामांकन सरकारी स्कूल में होता है, लेकिन वे पढ़ने के लिए निजी स्कूल में जाते हैं।

ऐसे बच्चों का भी जिक्र हुआ जो स्कूल न जाकर गाँव में इधर-उधर खेलते रहते हैं। जो कभी ड्रॉफ ऑउट कहे जाते हैं तो कभी ऑउट ऑफ़ स्कूल। जो बच्चे ऑउट ऑफ़ स्कूल हैं, वे भी बच्चे ही हैं। ऐसे बच्चों का ज्यादातर समय समुदाय में बीतता है। वे बहुत सी सामाजिक सच्चाइयों और परिस्थितियों से अवगत होते हैं, जिनसे स्कूल जाने वाले बच्चे महरूम होते हैं।

बच्चे थोड़े से बड़े होते ही प्री-स्कूल में जाते हैं। जो प्री-स्कूल में नहीं जाते, वे गाँव की आँगनबाड़ी में जाते हैं। जो आँगनबाड़ी में नहीं जाते व गाँव-शहर-मेट्रो में आँगनबाड़ी से बाहर खेलते हैं। बच्चों के साथ मस्ती करते हैं। इसके बाद बाद बारी आती है स्कूल की। लेकिन सारे बच्चे स्कूल नहीं जाते। कुछ सरकारी स्कूल में जाते हैं। कुछ मदरसे में जाते हैं। कुछ कॉन्वेंट में जाते हैं। कुछ वैकल्पिक स्कूल में। शेष बच्चे भी कहीं न कहीं जाते ही हैं।

इन्ही बच्चों के जिक्र के बीच वे युवा भी याद आये जो दिल्ली में जेएनयू में फीस और अन्य तरह की बढ़ोत्तरी के विरोध में धरना दे रहे हैं। ये भी कभी बच्चे ही रहे होंगे, इनको भी कभी किसी न किसी शिक्षक, नेता, प्रधानमंत्री, मानव संसाधन विकास मंत्री इत्यादि ने भारत का भविष्य कहा होगा। लेकिन यही बच्चे जब बड़े हो जाते हैं तो उनकी फ़ीस और बाकी सारे खर्चों के लिए उनको बैंकों से लोन लेना पड़ता है। उनकी पढ़ाई से टैक्स भरने वाले वालों पर बोझ पड़ रहा है ऐसे ताने सुनने पड़ते हैं। हम वास्तव में एक ऐसा समाज हैं जो बच्चों से तबतक नेह रखता है, जबतक कि वे बड़े नहीं हो जाते।

‘छोटे बच्चों की बड़ी अपेक्षाएं’

कहीं कहीं तो बच्चों से भी बड़ों वाली अपेक्षाएं होती हैं कि बिल्कुल रोबोट की तरह व्यवहार करो। जब हमारी मर्ज़ी हो तो रोओ और जब हमारी मर्ज़ी हो तो मुस्कुराओं, गीत गाओ, घर आने वाले मेहमानों व दोस्तों का मनोरंजन करो। जाने कितनी अपेक्षाओं का पहाड़ हम बच्चों के कंधों पर धर देना चाहते हैं। हम उनको भविष्य भी कहते हैं, मगर युवा होते ही उनकी राह में प्रतिस्पर्धा का पहाड़ खड़ा कर देते हैंष। महंगी फ़ीस की दीवारें खड़ी कर देते हैं। एक ही उम्र के बच्चों के लिए मुफ्त वाले सरकारी स्कूल और लाखों रूपये के सरकारी स्कूल वाली व्यवस्था का दरवाज़ा खोल देते हैं, जो असमानता की ऐसी खाई पैदा कर रही है, जिसे पाटना कभी भी संभव नहीं होगा। कितने विरोधाभाष हैं बच्चों के संदर्भ में।

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एक आदिवासी गाँव में मिट्टी के खिलौने बनाते बच्चे।

गाँव के बच्चों से अपेक्षा होती है कि वे शुद्ध देशी भाषा में संवाद करें। उसे अपने कलेजे और दिल से लगाये घूमते रहें। लेकिन शहरी बच्चे गिटिर पिटिर वाली ही सही अंग्रेजी बूके और गाँव के बच्चों की कमज़ोर या कच्ची अंग्रेजी के कारण मज़ाक उड़ाएं।

मातृभाषा की शिक्षा भी उन्हीं के लिए होती है जो मातृभाषा में ही साँस लेते हैं। उसी माहौल में रहते हैं। जबकि इसकी जरूरत उन बच्चों को ज्यादा है जो घर-बाहर अंग्रेजी के कारण हिन्दी व अन्य स्थानीय भाषाओं व बोलियों के सुख से वंचित होते हैं। गाय तो गाय भी न कहकर काऊ कहने को बाध्य किये जाते हैं। बचपन से ही बहती नाक को नोज़ कहने के नकली प्रशिक्षण में झोंक दिये जाते हैं। ऐसी तोता रटंत पद्धति का हासिल कुछ नहीं, बस एक छलावे वाला सुख है। जो अर्थ, संदर्भ और जीवन से रहित है।

‘एक भारत में बच्चों की कितनी दुनियाएं हैं?’

बाल दिवस के मौके पर ऐसी पोस्ट लिखते हुए लगता है कि बच्चों की कितनी दुनियाएं भारत में ही हैं। एक तरफ आदिवासी अंचल के बच्चे हैं। दूसरी तरफ मेट्रो में रहने वाले बच्चे हैं। मेट्रो में भी अमीरी और ग़रीबी को दो ध्रुवों पर जीते बच्चों के बीच का अंतर उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव जैसा प्रतीत होता है, जिसके पटने की उम्मीद खोजना खुद में ही निराशा के एक प्रोजेक्ट सरीखा है। ऐसी माहौल में जो प्रत्यक्ष है उसका सामना करना ही सबसे जरूरी है।

इस पल में एक गीत याद आ रहा है कि नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है? मुट्ठी में है तक़दीर है हमारी। हमने किश्मत को वश में किया है।” बहुत ही प्यारा गीत है। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की याद में बाल दिवस की शुरूआत अच्छी है। कम से कम इस बहाने ही सही बच्चों के लिए कोई तो दिन तय है। ताकि इस बहाने बच्चों की दुनिया बड़ों की दुनिया के बरक्स पूरे आत्मविश्वास से खड़ी होकर अपनी सशक्त मौजूदगी का अहसास कराती है।

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