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जानिएः अपनी स्कूल लाइब्रेरी को सक्रिय कैसे बनाएं?

cropped-IMG_-38w3hu.jpgभारत में लाइब्रेरी को प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्तर पर विद्यालय का अभिन्न हिस्सा बनाने के प्रयास आज़ादी के बाद से ही हो रहे हैं। लेकिन इस विचार को ज़मीनी स्तर पर लाने की चुनौतियों और मेहनत की जरूरत दोनों से हम सभी परिचित हैं। लाइब्रेरी की किताबों के इस्तेमाल को लेकर जो सबसे बड़ा डर है कि बच्चे अगर किताबें फाड़ देंगे या फिर कुछ किताबें खो गईं तो क्या होगा? यह किसी राज्य विशेष की समस्या न होकर राष्ट्रीय स्तर का सवाल बन गया है।

एक ऐसा भी दौर था कि किताबें सालों साल आलमारी में बंद रहा करती थीं, ताकि अगले लाइब्रेरी प्रभारी को चार्ज दिया जा सके। लेकिन अब स्थितियां और माहौल बदल रहा है उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट, हरियाणा, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, बिहार, उड़ीसा, कर्नाटक समेत देश के अन्य हिस्सों में लाइब्रेरी को सक्रिय बनाने के प्रयास हो रहे हैं। इस क्रम में राजस्थान की सरकार ने एक सर्कुलर पूरे प्रदेश के शिक्षकों के लिए जारी किया कि शिक्षक किताबों का इस्तेमाल करें। अगर किताबें इस्तेमाल के दौरान फट या खो जाती हैं तो उन किताबों की कीमत शिक्षकों से नहीं ली जायेगी। इसके बाद स्थिति में थोड़ा बदलाव आया। लेकिन इस आदेश से ही पूरी स्थिति बदल गई ऐसा भी नहीं है।

असली बात यह है कि हम कैसे किताबों तक बच्चों की पहुंच को सुनिश्चित करते हैं। उनको पढ़ने के लिए बच्चों को प्रोत्साहित करते हैं और किताबों के फटने और खो जाने के डर से खुद को व बच्चों को मुक्त करते हैं। इस प्रतिबद्धता से ही जीवंत लाइब्रेरी के निर्माण का रास्ता गुजरता है।

टाइम टेबल का हिस्सा बने लाइब्रेरी

विद्यालय के टाइम टेबल में लाइब्रेरी कालांश का जिक्र हो। सभी कक्षाओं के लिए सप्ताह में कम से एक कालांश मिलना सुनिश्चित हो। इसके लिए लगातार प्रयास करने की जरूरत है। इससे एक दिन ऐसा आयेगा कि लाइब्रेरी का जिक्र टाइम टेबल में होगा और इसके अनुसार बच्चों को विभिन्न पठन गतिविधियों में शामिल होने और किताबों के लेन-देन का मौका मिलेगा। कालांश का समय कम से कम 30-40 मिनट का होना चाहिए और बच्चों के साथ-साथ शिक्षकों की मौजूदगी भी उस समय कक्षा में होना जरूरी है ताकि बच्चों को उनका सहयोग मिल सके।

लाइब्रेरी का संग्रह

किसी विद्यालय में बच्चों के साथ किताबों का लेन-देन करने के लिए पर्याप्त संख्या में किताबों की उपलब्धता जरूरी है। अगर किसी विद्यालय में 200 बच्चों का नामांकन है तो कम से कम 300 किताबें होनी चाहिए। ताकि लेन-देन के बाद भी विद्यालय में पठन गतिविधियों व बच्चों के स्वतंत्र पठन के लिए पर्याप्त संख्या में किताबें बची रहें। कुछ राज्यों जैसे महाराष्ट्र में प्रत्येक बच्चे पर पाँच किताबों की संख्या के अनुसार संग्रह की उपलब्धता का ध्यान रखा गया। यानि 200 बच्चों के लिए 1000 किताबें कम से कम होनी चाहिए। लेकिन यह आदर्श स्थिति बाकी राज्यों में मिले ऐसा जरूरी नहीं है। इसलिए न्यूनतम 300 या फिर 400 किताबों वाली स्थिति में भी चीज़ों को आगे बढ़ाने का प्रयास हमारी तरफ से होना चाहिए।

बच्चों की पहुंच में हों किताबें

किताबों की उलब्धता के बाद बच्चों तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करने के लिए प्रयास करने की जरूरत होती है। सबसे आसान तरीके से डोरी के माध्यम से किताबों का डिसप्ले कर सकते हैं, इसके अलावा जूट बैग, बाँस या फिर लकड़ी वाली रैक या फिर लोहे की खुली वाली रैक का इस्तेमाल किताबों के डिसप्ले के लिए किया जा सकता है। ताकि बच्चे किताबों तक खुद से पहुंच सकें और अपने पसंद की किताबें चुन सकें।

इसके लिए किताबों का संग्रह की विविधता के अनुसार भी डिसप्ले लगा सकते हैं, लेकिन यह काम बच्चों की तैयारी के बाद करना चाहिए जब बच्चे किताबों की विविधता जैसे कहानी, कविता, लोकगीत, लोककथा, कथेतर, जीवनी, आत्मकथा इत्यादि को पहचानने लग जाएं। इसके अलावा विभिन्न अवसरों पर थीम आधारित डिसप्ले भी लाइब्रेरी में बच्चों के साथ मिलकर लगा सकते हैं जैसे बारिश का डिसप्ले, सर्दी के मौसम में इससे जुड़ा कोई डिसप्ले, त्योहारों पर आधारित डिसप्ले इत्यादि।

पठन गतिविधियों का नियमित संचालन

लाइब्रेरी को जीवंत व सक्रिय बनाने में पठन गतिविधियों की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए जरूरी है कि सभी कक्षाओं के साथ नियमित अंतराल (सप्ताह में एक बार) पर अलग-अलग पठन गतविधियां हों। इसके लिए अलग-अलग तरह की किताबों का चुनाव हो जैसे कभी कहानियों का उपयोग हो, तो कभी कविताओं पर काम हो, कभी स्वतंत्र पठन का अवसर मिले तो कभी केवल पसंद की किताबों के ऊपर चर्चा व अपने-अपने अनुभव समूह में साझा करने का मौका बच्चों को मिले।

इसके साथ ही साथ बच्चों की पसंदीदा किताबों की लिस्ट भी लाइब्रेरी में लगाई जा सकती है। इसमें बच्चे का नाम और उसकी पसंदीदा किताब का नाम साथ-साथ लिख सकते हैं। पठन गतिविधियों का रिकॉर्ड रखना हमें हर महीने लाइब्रेरी के काम की समीक्षा करने और आगे की योजना बनाने में काफी मदद करता है। इसके लिए किस दिन आपने किस कक्षा के साथ कौन सी गतिविधि करवाई इसको डायरी में नोट कर सकते हैं।

भाषा कालांश में लाइब्रेरी की किताबों उपयोग

भाषा के कालांश में लाइब्रेरी की किताबों का इस्तेमाल करना, बच्चों को पाठ्यक्रम के अलावा भी अन्य किताबों तक पहुंचने और उसकी स्वीकार्यता बढ़ाने की दृष्टि से बेहद मददगार साबित होता है। इसके लिए सबसे आसान तरीका भाषा कालांश में पहले से चुनी कहानी, कविता पर काम करना और बच्चों के साथ उस पर काम करना है। बच्चों के मौखिक भाषा विकास में लाइब्रेरी एक बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, आगे के दिनों में मौखिक भाषा विकास का लाभ बच्चों को भाषा का लिपि को पढ़ने, सार्थक शब्दों को समझकर पढ़ने और अर्थ ग्रहण की क्षमता विकसित करने की तरफ ले जाता है।

लाइब्रेरी में हो किताबों का नियमित लेन-देन

बच्चों के साथ किताबों का नियमित लेन-देन होना जरूरी है। आदर्श स्थिति तो सप्ताह में एक बार है। अगर इससे ज्यादा मौके भी बच्चों को मिल सकते हैं तो वो भी देना चाहिए। अगर किताबों का लेन-देन शुरूआती स्तर पर प्रारंभ नहीं हो सका है तो बच्चों के साथ पठन गतिविधियां जरूर होनी चाहिए। प्रत्येक बच्चा कम से कम 3-4 किताबों का लेन-देन करे और उसके साथ 2-3 पठन गतिविधियां हर महीने हों, ऐसा करने से लाइब्रेरी के प्रति बच्चों को रुझान विकसित होता है और वे अपनी पसंद-नापसंद का विकास भी करते हैं। इसके साथ ही साथ लाइब्रेरी की किताबों के लेन-देन का रिकॉर्ड भी विद्यालय स्तर पर व्यवस्थित किया जाना चाहिए। ताकि हम जान सकें कि किन प्रयासों से लाइब्रेरी का लाभ बच्चों को मिल रहा है।

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