किसी बच्चे का पहली बार स्कूल में आना एक बड़ी परिघटना होती है। वह अपने जीवन में पहली बार औपचारिक तरीके से चीज़ों को सीखने की कोशिश करता है। इस तरह के सीखने में निर्देशों की बहुत बड़ी भूमिका होती है।
मगर इससे भी ज्यादा अहम भूमिका बातचीत की होती है। बच्चों के साथ आप कैसे बात करते हैं। उनको अपनी बात कहने का कितना अवसर देते हैं। उनको मुस्कुराने और ठहाका मारकर हँसने का कितना स्पेश देते हैं, इस पर भी काफी कुछ निर्भर करता है।
बच्चों का एक दिन
अगर एक दिन में बच्चे एक वर्ण सीख लेते हैं। किताबों को पकड़ना सीख लेते हैं। उस वर्ण को लिखना सीख लेते हैं। बच्चों की भीड़ में अपना नाम बताना और अपना नाम आने पर यह बताना सीख लेते हैं कि यह मैं हू हूँ जिसका नाम आप पुकार रहे हैं, एक दिन में बच्चे जितना सीख लेते हैं, आमतौर बड़े उतना कई दिनों में सीखते हैं। फिर भी बच्चों पर तोहमत लगाते हैं कि बच्चे सीख नहीं रहे हैं, शायद हम एक बुनियादी सी बात नहीं सीख पाए हैं कि बच्चे आज़ाद माहौल में ज्यादा बेहतर ढंग से सीखते हैं।
स्कूल आने वाले बच्चों के बारे में सबसे ग़ौर करने वाली बात है कि उनका मस्तिष्क सीखने के लिए बना होता है। नई-नई चीज़ें सीखना और करना उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा होता है। वे अपने पास बैठे बच्चे को देखकर अपनी उल्टी किताब को सीधी करना सीख लेते हैं। वे किसी बच्चे को कॉपी पर कुछ लिखता हुआ देखकर अपनी कॉपी में लिखना सीख लेते हैं। किसी पहचानी सी चीज़ के बारे में आसानी से बताना सीख लेते हैं। जैसे आज ही बच्चों ने किताब और कॉपी को अलग-अलग रखना सीखा। इस तरह का व्यवस्थित माहौल बच्चों को सीखने में मदद करता है क्योंकि यहां पर उनकी स्वतंत्रता और निजता का ध्यान रखा जाता है। उनके आत्मविश्वास को खिलने का मौका दिया जाता है।
क्लासरूम का माहौल
- बच्चे बैठना सीखते हैं।
- अपनी चीज़ों को संभालना सीखते हैं।
- चीज़े उनके आसपास होती हैं, मगर उनकी नज़रों से हट जाती हैं। ऐसे में वे उसे खोजने की कोशिश करते हैं।
- निर्देशों के औपचारिक रूप से परिचित हो रहे होते हैं, जो पूरी क्लास के लिए होते हैं।
- घर की भाषा (होम लैंग्वेज) के अलावा किसी भाषा के साथ रिश्ता बना रहे होते हैं। जो उनके लिए कभी-कभी पूरी तरह अज़नबी होती है। ऐसे में उनके घर की भाषा का क्लास में होने वाला इस्तेमाल उनको सहज करता है।
- पेन-पेंसिल पकड़ना सीख रहे होते हैं।
- किताब कैसे पकड़नी है, यह जानते हैं।
- कॉपी में कहां लिखना, किस तरीके से लिखना है? यह बात भी बच्चे के संज्ञान में आती है।
- बाकी बच्चों के साथ बातचीत करना और शिक्षक के साथ बात करना भी सीख रहे होते हैं।
- अपनी बात को प्राथमिकता देने और शिक्षक का ध्यान आकर्षित करना भी सीख रहे होते हैं। इसका उदाहरण है, क्लास में गूंजने वाला सर, सर का शोर या फिर मैम, मैम वाली आवाज़।
- समूह में खेलना भी सीखते हैं बच्चे, इसकी झलक तस्वीरों में देखी जा सकती है।
अगली पोस्ट में इस मुद्दे पर विस्तार से बात करते हैं, जिसमें अन्य पहलुओं का भी समावेश करेंगे।

