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‘हर साल पास होने वाला बच्चा, जब फेल होता है’

बच्चे, पढ़ना सीखना, बच्चे का शब्द भण्डार कैसे बनता हैकिसी भी बच्चे को स्कूल में एडमीशन देने से मना नहीं करना है। ऊपर से ऐसे निर्देश मिले हैं। अगर शिक्षकों द्वारा अधिकारियों से मौखिक रूप से मिले ऐसे निर्देशों का पालन होता रहा तो बहुत से बच्चे 10-11 साल में ही अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी कर लेंगे।

ऐसे बच्चे क्या पढ़ना-लिखना सीख पाएंगे या नहीं? इस सवाल के जवाब का जवाब किसी के पास नहीं है। तीसरी क्लास में बहुत से ऐसे बच्चे पढ़ रहे हैं जिनको वास्तव में पहली क्लास में होना चाहिए।

शिक्षकों को अधिकारियों से मिलने वाले ऐसे मौखिक निर्देशों के कारण कि किसी भी बच्चे को दाखिले से वंचित नहीं करना है। बहुत से छोटे बच्चों का एडमीशन सरकारी स्कूलों में हो रहा है।

पहली बार बच्चे का ‘फेल’ होना

ऐसे बच्चों की बहुत बड़ी संख्या आठवीं तक की शिक्षा पाने के बाद नौवां क्लास में फेल कर दिये जाते हैं। क्योंकि उनके सीखने का स्तर नौवीं कक्षा के बराबर का नहीं होता है। इस तरह हर साल पास होने वाला बच्चा जब पहली बार फेल होता है तो उसके मनोबल पर क्या असर पड़ता है? इस तरफ शायद किसी का ध्यान नहीं है। बच्चों को वास्तविक स्थिति के भय और डर से दूर रखने की कोशिशों का आदर्शवाद ऐसे लम्हे में भरभराकर टूट जाता है। जिसे स्वीकार करना बच्चे के लिए बहुत मुश्किल होता है।

ऐसे में अभिभवाक भी अपने बच्चे को ही दोष देते हैं कि वही पढ़ता नहीं था, इसीलिए फेल हो गया है। जबकि वास्तविक स्थिति तो कुछ और होती है। नौवीं क्लास की बाधा पार करने वाले बहुत से बच्चे तो दसवीं क्लास में दो-तीन बार फेल होने के बाद हमेशा के लिए पढ़ाई नामक समस्या से पीछा छुड़ाकर काम धंधे में लग जाते हैं।

इस स्थिति के बारे में एक शिक्षक कहते हैं, “सरकार कहती है कि हम शिक्षा को बढ़ावा देना चाहते हैं। पर ऐसे-ऐसे नियम निकालती है कि बच्चे फेल होकर पढ़ाई से दूर हो जाएंगे। जैसे यह कहना कि अगर कोई बच्चा खुद चलकर स्कूल आ जाता है। पानी-पेशाब की छुट्टी खुद से मांग लेता है। तो उसे एडमीशन देने से मना नहीं करना है। इस चक्कर में तीन-चार साल के बच्चा का दाखिला पहली क्लास में हो रहा है। ऐसे बच्चे भला क्या पढ़ना लिखना सीखेंगे। नामांकन का टॉरगेट पूरा करने के लिए हमें भी हर बच्चे को एडमीशन देना होता है।

ये कैसी जादूगरी है?

ऊपर से मिलने वाले मौखिक निर्देश लिखित आदेशों की तुलना में ज्यादा खतरनाक तरीके से अपना असर दिखा रहे हैं। पांचवीं-छठीं क्लास में पढ़ने वाले बहुत से बच्चे अभी पढ़ना सीख रहे हैं। पांचवी के कुछ बच्चे पहली क्लास के बच्चों के साथ बैठना चाहते हैं क्योंकि पहली में पढ़ने वाले बच्चों और उनकी उम्र में बहुत ज्यादा का अंतर नहीं है। पर ऊपर के निर्देशों का पालना तो होनी ही है, इसलिए जो उम्र रजिस्टर में दर्ज़ हो गई।

बच्चों की उम्र के बारे में वही अंतिम सत्य है। एडमीशन के दौरान बच्चों को देखे बग़ैर उनकी उम्र के बारे में जो अनुमान या कयास लगा लिये जाते हैं, वे किसी जादूगरी से कम नहीं है। इसका अहसास पहली क्लास में पढ़ने वाले बच्चों से मिलने के बाद ही होता है।

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