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कविताः गंगा

सुनो कहानी! सुनो कहानी!

मैं हूं पानी! मैं हूं पानी!

बहुत पहले था जमा हुआ,

ग्लेशियर्स में फंसा हुआ,

किन्तु एक दिन आया, सूरज, ने मुझे पिघलाया ।

बाकी बूंदों के साथ, पकड़ हम एक दूजे का हाथ ।

पहुंचे गंगोत्री धाम, हमें मिला ‘गंगा’ का नाम।

फिर पंहुची मैं हरिद्वार

कानपुर में मैं हुई मैली

मुझे अंदर मिली प्लास्टिक की थैली।

और क्या बताऊं, अपनी व्यथा किसे सुनाऊं,

काला पानी, फेंका खाना, मरी मछलियां

अब ‘पवित्र’ शब्द हुआ पुराना ।

चिल्ला कर मैंने बोला फैक्ट्री का पानी?

वह चीख मेरी बेकार गई, अब मैं थक – हार गई ।

फिर आया बंग प्रदेश, वहां पहुंची धरे काला वेश।

वहां हुई मेरी दो धारा, अब जाना है समंदर खारा।

हमने फिर डेल्टा बनाया , जो सुंदरबन कहलाया।

अब हैं हम चीख रहे, लगी रहे सहायता की गुहार ।

प्लास्टिक हटाओ, गंगा बचाओ निरंतर लगी रहे पुकार।

सिद्धि, कक्षा-5, पी एम श्री केंद्रीय विद्यालय, पश्चिम बंगाल।

 

 

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Nandini Rathore

Very good Siddhi…keep it up

Rashmi

Very nice poem

Rakesh

Very nice poem

Meena thakur

Very nice 👍

राजीव रंजन

बहुत सुंदर बेटी ऐसे ही लिखते रहो।

दीपक कुमार

बहुत ही सुंदर कविता!

राजेश कुमार ठाकुर

ऐसे ही लिखते रहो और आगे बढ़ो

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