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हम स्कूल क्यों जाते हैं?

भारत में स्कूली शिक्षा, स्कूल जाते बच्चे, हम स्कूल क्यों जाते हैं

एक गाँव में स्कूल की तरफ जाते बच्चे।

हम स्कूल क्यों जाते हैं? अगर शिक्षक हैं तो पढ़ाने जाते हैं। अपनी ड्युटी की हाजिरी लगाने जाते हैं और बच्चों की हाजिरी लेने जाते हैं। बच्चे हैं तो पढ़ने जाते हैं। अभिभावक हैं तो बच्चे की प्रगति के बारे में जानने के लिए जाते हैं। या फिर शिक्षकों के बुलावे पर जाते हैं। किसी मीटिंग के सिलसिले में जाते हैं। एसएमसी का मेंबर होने के नाते जाते हैं।

अगर टीचर एजुकेटर हैं तो यह जानने के लिए जाते हैं कि स्कूल की प्रोग्रेस कैसी चल रही है? चीज़ें सही दिशा में जा रही हैं या नहीं। हम जो इनपुट स्कूल में दे रहे हैं, उसका क्या असर हो रहा है। इस स्कूल को आगे ले जाने के लिए जो प्लान हमारे पास है उसे स्कूल में कैसे लागू किया जा सकता है, इसकी संभावनाएं तलाशने के लिए जाते हैं।

मॉनिटरिंग और मार्केटिंग

अगर शिक्षा विभाग में अधिकारी हैं तो स्कूल की मॉनिटरिंग के लिए जाते हैं। फीडबैक देने के लिए जाते हैं। एमडीएम की जाँच के लिए जाते हैं। आदेश देने के लिए जाते हैं। स्कूल को मॉडल स्कूल बनाने की दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करने के लिए जाते हैं।

हम स्कूल क्यों जाते हैं? इस सवाल के जवाब बड़े सीधे-सीधे दिये जा रहे हैं। मगर सारे जवाब इतने सीधे नहीं है। ग़ौर करते हैं कुछ और जवाबों की तरफ। एक पासबुक की मार्केटिंग करने वाला बंदा स्कूल में शिक्षकों के हस्ताक्षर लेने और उनको पासबुक देकर, पासबुक का बाज़ार बढ़ाने के लिए जाता है। वास्तव में वह शिक्षकों को नुकसान पहुंचाने के लिए जाता है। मगर शिक्षक स्कूल में आने वाले बाकी लोगों की तरह उनका भी स्वागत करते हैं।

‘हम सब जिम्मेदार हैं’

ग़ैर-सरकारी संस्थाओं के बारे में शिक्षक बड़े गुस्से से कहते हैं ये लोग शिक्षा का भट्ठा बैठाकर मानेंगे। शिक्षा का बेड़ा किसने गर्क किया है? जिसके ऊपर शिक्षा की जिम्मेदारी थी। यानि वे सारे लोग जिनका सरोकार शिक्षा से है। हम सभी जो बच्चों के अभिभावक हैं, शिक्षक हैं, शिक्षा के क्षेत्र में शोध कर रहे हैं, शिक्षा से जुड़े नीतिगत फ़ैसले ले रहे हैं, शिक्षा से जुड़े मुद्दों की एडवोकेशी कर रहे हैं।

वे लोग भी जो शिक्षा के क्षेत्र में प्रवाहित होने वाले पैसों को खर्च करने के तौर-तरीके बनाते हैं। उसे ज़मीनी स्तर पर लागू करने की रूपरेखा तैयार करते हैं। यानि हम सब जिम्मेदार हैं शिक्षा की स्थिति के लिए। वह जिस भी स्थिति में हैं। अकेला शिक्षक नहीं। एक शिक्षक कहते हैं, “शिक्षा के क्षेत्र में शोध करने वाले लोगों ने सबसे ज्यादा नुकसान किया है। ऐसे-ऐसे तरीके खोजकर लाते हैं जिसे ज़मीनी स्तर पर लागू ही नहीं किया जा सकता है। बच्चों को कैसे पढ़ाना है, इसका फ़ैसला शिक्षकों के ऊपर छोड़ना चाहिए। क्या पढ़ाना है, इसको लेकर भी शिक्षकों की राय ली जानी चाहिए।”

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