बेहतर सीखने के लिए क्यों जरूरी हैं ‘स्पष्ट शिक्षण उद्देश्य’?
टीना मैडम के पास प्राथमिक कक्षाओं में शिक्षण का एक लंबा अनुभव है। पिछले 10 वर्षों से वे एक प्राथमिक विद्यालय में पहली से तीसरी कक्षा तक के बच्चों को पढ़ा रही हैं। अपनी कक्षा में वे बच्चों का मुस्कराते हुए स्वागत करती हैं और शिक्षण–प्रक्रिया में बच्चों का उनके साथ एक सहज जुड़ाव दिखाई देता है। उनकी कक्षा एक प्रिंट समृद्ध वातावरण वाली कक्षा है, बच्चों के भाषायी विकास के लिए वे कविताओं और कहानियों का सक्रियता से इस्तेमाल करती हैं। कहानियों पर चर्चा के लिए बंद और खुले छोर वाले सवाल भी पूछते हैं।
गिनती सिखाने के लिए ठोस–वस्तुओं और टीएलएम के साथ–साथ कविताओं के माध्यम से भी बच्चों को गिनती सिखाती हैं। इन प्रयासों के कारण उनकी कक्षा में बच्चों की सक्रिय भागीदारी होती है। कक्षा का माहौल जीवंत रहता है। बच्चे भी उत्साहित रहते हैं। वे हाथ उठाकर सवालों का जवाब देते हैं, ब्लैकबोर्ड पर सवालों को हल करते हैं, छोटे–छोटे समूह में चर्चा करते हैं। टीना मैडम समय से अपना पाठ्यक्रम पूरा करने पर विशेष जोर देती हैं।
इतनी कोशिशों के बावजूद एक समस्या स्थायी रूप से बनी रहती है। जब भी आकलन होता है तो कक्षा के अधिकांश बच्चे अपेक्षित अधिगम स्तर तक नहीं पहुंच पाते हैं। जैसे हिन्दी भाषा में अधिकांश बच्चे शब्दों को अटक–अटक कर पढ़ रहे होते हैं, शब्दों व वाक्यों को प्रवाहपूर्ण तरीके से पढ़ने और उस पर आधारित सवालों का जवाब देने में चुनौती महसूस करते हैं। जबकि कुछ बच्चे धाराप्रवाह पठन और समझ आधारित सवालों का जवाब देने में निपुणता हासिल कर लेते हैं।
ठीक यही स्थिति गणित विषय में भी होती है अधिकांश बच्चे 100 तक की गिनती तो बोल लेते हैं। लेकिन संख्या पहचान में जूझते हैं। संख्या पहचान और जोड़‑घटाव जानने वाले बच्चे भी इबारती सवाल हल करते समय पूछते हैं कि मैडम, इस सवाल में हमें जोड़ना है या घटाना?
टीना मैडम कहती हैं, “मैं तो पूरी मेहनत से पढ़ाती हूँ, बच्चे कक्षा में सक्रियता से हर गतिविधि में भाग लेते हैं, फिर भी सभी बच्चे क्यों नहीं सीख रहे हैं?”
एक दिन उनकी कक्षा अवलोकन के बाद मैंने बातचीत की।
“टीना जी, आज आपने बच्चों को क्या सिखाया?”
“मैंने बच्चों को जोड़ करना सिखाया।”
“दिन के अंत तक आप क्या चाहती थीं, कि बच्चे क्या कर पाएं?”
“जोड़ कर सकें?”
क्या आप चाहती थीं कि बच्चा जोड़ करना रट लें या फिर जोड़ की समझ और विभिन्न संदर्भ में उपयोग कर सकें?
इस बातचीत के बाद टीना जी कुछ देर शांत रहीं और कुछ समय सोचने का बाद उन्होंने कहा, “जब आप अगली बार मेरी कक्षा में आएंगे तबतक मैं जरूर इस समस्या का कोई समाधान खोज लूंगी।”
सीखने का लक्ष्य बनी ‘पहली प्राथमिकता‘
अगली बार के कक्षा–अवलोकन में मैंने बोर्ड पर लिखा देखा, “आज का सीखने का लक्ष्य: बच्चे दो संख्याओं को जोड़ना सीखेंगे और वास्तविक जीवन की समस्या हल कर पाएँगे।”
इस बार टीना जी ने बच्चों से केवल जोड़ के सवाल हल नहीं करवाए। बल्कि बच्चों से यह भी पूछा कि अगर तुम्हारे पास 12 आम हैं और तुम्हारे दोस्त के पास 8 तो कुल कितने आम होंगे? बच्चे सोचने लगे और उन्होंने जवाब दिया 20। इस बार बच्चों ने जोड़ भी किया और यह भी समझा कि जोड़ का एक पहलु दो समूहों की मात्राओं को आपस में मिलाना होता है।
कुछ ही हफ्तों के बाद कक्षा–कक्ष का माहौल बदलने लगा। बच्चे अब सिर्फ सवालों के जवाब नहीं दे रहे थे, बल्कि सोच भी रहे थे। वे सवालों का अर्थ समझ रहे थे और उन्हें अपने रोजमर्रा के जीवन अनुभवों से जोड़ भी पा रहे थे। इससे बच्चे के सीखने की प्रगति में बदलाव साफ–साफ दिखने लगा।
‘सीखने का लक्ष्य‘ क्यों जरूरी?
टीना मैडम की यह कहानी, किसी एक शिक्षक की नहीं है। यह हमारे देश के हज़ारों शिक्षकों का अनुभव है। वे मेहनती हैं, शिक्षण के प्रति समर्पित हैं, पढ़ाने के अलग–अलग तरीके अपनाते हैं। लेकिन अक्सर परिणाम उम्मीद के अनुसार नहीं आता। इसकी एक बड़ी वजह है – सीखने के लक्ष्य की अस्पष्टता। अगर शिक्षक को यह नहीं पता कि दिन के अंत में बच्चों में कौन–सा कौशल (या समझ) विकसित करना है, तो बच्चे सीखने के अपेक्षित अधिगम स्तर तक नहीं पहुंच पाते हैं।
सीखने के लक्ष्य (लर्निंग आउटकम) की स्पष्टता के बिना पढ़ाना, ठीक वैसा ही है जैसे बिना नक्शे के किसी नए शहर में निकल जाना। यानि सीखने का लक्ष्य वह नक्शा है जो शिक्षक के काम और उनकी मेहनत को हर दिन एक सटीक दिशा देता है।
उदाहरण के लिए:
– आज बच्चों को कविता सुनानी है, यह एक गतिविधि है।
– आज बच्चे कविता सुनने के बाद तुकांत शब्दों की पहचान सकेंगे। यह एक सीखने का लक्ष्य है।
– आज जोड़ करवाना है, यह एक गतिविधि है।
– आज बच्चे दो अंकों की संख्याओं का जोड़, बिना गिनती को क्रम से बोले हुए कर सकेंगे। यह एक सीखने का लक्ष्य है।
– आज घटाव करवाना है। यह एक गतिविधि है।
–आज बच्चे किसी दी हुई वस्तुओं से समूह से कुछ चीजों को हटाकर घटाव का अर्थ समझ सकेंगे, यह सीखने का एक लक्ष्य है।
एक गतिविधि बताती है कि क्या करना है (शिक्षक के संदर्भ में)। जबकि सीखने का लक्ष्य बताता है कि बच्चे को क्या सीखना है/बच्चे में कौन से कौशल विकसित करने हैं (बच्चे के संदर्भ में)। यही स्पष्टता शिक्षण को एक दिशा देती है।
इस बारे में शोध क्या कहते हैं?
शिक्षाशास्त्री जॉन हैटी ने अपने प्रसिद्ध शोध ‘विजिबल लर्निंग’ में पाया कि “स्पष्ट सीखने के उद्देश्य” (Clear Learning Objective) बच्चों के सीखने पर अत्यधिक सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। इसके प्रभाव का आकार (effect size) लगभग 0.75 है – यानी जब शिक्षक और बच्चे दोनों जानते हैं कि सीखने का लक्ष्य क्या है, तो परिणाम कहीं अधिक बेहतर होते हैं।
बिना किसी खास रणनीति के बच्चों के सीखने में “सामान्य प्रगति” होती है। लेकिन अगर उस बच्चे को ऐसी कक्षा मिले जहाँ हर दिन के सीखने के लक्ष्य स्पष्ट रूप से बताए जाते हैं। इसी के अनुरूप गतिविधियाँ होती हैं और बच्चों के सीखने का आकलन होता है तो वही बच्चा लगभग डेढ़ से दो साल की प्रगति एक ही साल में कर सकता है।
शिक्षक की भूमिका
जब शिक्षक अपने हर दिन के शिक्षण का लक्ष्य तय करते हैं तो वे केवल ‘पाठ पूरा करने वाले’ व्यक्ति से एक ‘मार्गदर्शक’ में बदल जाते हैं। अब वे खुद से सवाल पूछने लगते हैं:
- आज के दिन बच्चों में कौन सा कौशल विकसित करना है?
- इस कौशल को सीखने में किन–किन बच्चों को अतिरिक्त सहयोग चाहिए?
- कौन–सी गतिविधि बच्चों को आज के ‘अधिगम लक्ष्य‘ तक पहुँचने में मदद करेगी?
- दिन के अंत तक मैं कैसे जान सकूंगा कि मेरा लक्ष्य पूरा हुआ या नहीं?
अगर शिक्षक के पास शिक्षक संदर्शिका जैसी मार्गदर्शिका हो, तो वे उस संदर्शिका में भी ऊपर दिए सवालों पर केंद्रित कर सकतें है। यह प्रक्रिया किसी शिक्षक को आज “क्या पढ़ाना है” से हटकर “बच्चे आज क्या सीखेंगे” की तरफ ध्यान देने के लिए प्रेरित करती है। यही बदलाव शिक्षण और बच्चों के सीखने की गुणवत्ता तय करता है।
‘जब लक्ष्य बदला, तो बच्चों का सीखना भी बदला‘
पहले टीना मैडम अपनी कक्षा में बच्चों को जोड़–घटाव के सवाल हल करने के लिए प्रेरित करती थीं। बच्चे “12 + 8 = 20” या “15 – 7 = 8” जैसे सवालों का उत्तर देते थे। लेकिन अब उन्होंने इबारती सवालों पर काम को अपनी तैयारी में शामिल किया। ताकि बच्चे जोड़ की संक्रिया को समझ पाएं और रोजमर्रा की जिंदगी वाले सवालों को हल कर सकें। जैसे अगर तुम्हारे पास 12 आम हैं और तुम्हारा दोस्त 8 आम और लाता है, तो अब तुम्हारे पास कुल कितने आम होंगे?”
उन्होंने अपने पढ़ाने के तरीके में बदलाव किया और हर दिन का एक स्पष्ट सीखने का उद्देश्य तय किया।
पहले दिन: बच्चे दो संख्याओं का जोड़ बिना गिनती के कर सकेंगे।
दूसरे दिन:बच्चे जोड़ को ‘दो समूह की मात्राओं के आपस में मिलाने’ के रूप में समझ सकेंगे।
तीसरे दिन: “बच्चे वास्तविक जीवन से संबंधित जोड़ की समस्याएँ हल कर सकेंगे।“
टीना मैडम कहती हैं, “मैं वही पढ़ा रही थी जो पहले पढ़ाती थी। लेकिन मुझे अब यह पता था कि हर दिन कहाँ पहुँचना है। अब मेरा उद्देश्य सिर्फ सवाल हल करवाना नहीं, बल्कि बच्चों को जोड़ का असल मतलब और इसके उपयोग को समझाना था।”
बच्चों के लिए भी लक्ष्य जानना है ज़रूरी
स्पष्ट लक्ष्य केवल शिक्षक के लिए नहीं, बच्चों के लिए भी महत्वपूर्ण होते हैं। जब बच्चे जानते हैं कि आज उन्हें क्या सीखना है, तो उनका ध्यान केंद्रित रहता है और वे सक्रिय भागीदारी करते हैं।
मान लीजिए आप कहते हैं – “आज हम कहानी सुनेंगे।” तो बच्चा केवल सुनने तक सीमित रहेगा।
लेकिन अगर आप कहते हैं – “आज हम कहानी में मुख्य पात्र की पहचान करना सीखेंगे,” तो बच्चा पढ़ते समय कहानी के पात्रों पर भी ध्यान देगा।
“राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF FS -2022) दोनों ही “सीखने के परिणाम आधारित शिक्षण” पर ज़ोर देती हैं। इसका मतलब यही है कि पाठ्यक्रम, शिक्षण विधि और आकलन – सब कुछ बच्चे के सीखने को केंद्र में रखकर निर्धारित किया जाना चाहिए।
तीन जरूरी सवाल
कक्षा में जाने से पहले हर शिक्षक को खुद से ये तीन सवाल ज़रूर पूछने चाहिए:
- आज मैं बच्चों को कौन–सा नया कौशल/अवधारणा सिखाना चाहता हूँ?
- मैं कैसे जानूँगा कि बच्चों ने इस नई अवधारणा को सीख लिया है?
- अगर बच्चे पढ़ाने के बाद भी नहीं सीख पाए, तो अगली बार मैं क्या अलग करूँगा?
जब टीना मैडम ने ‘वास्तविक जीवन की समस्या हल करने’ का स्पष्ट उद्देश्य तय करके पढ़ाया तो बच्चों ने जोड़ने का वास्तविक अर्थ समझा। अब वे सवालों को अपने जीवन से जोड़ पा रहे थे। इसलिए, कक्षा में हर दिन का सीखने का एक स्पष्ट उद्देश्य तय करें और देखें कि कैसे आपकी कक्षा में हर बच्चा एक नई दिशा में बढ़ता है।
(लेखक परिचय: नवलेश, सेंट्रल स्क्वायर फाउंडेशन में प्रोजेक्ट मैनेजर के रूप में काम कर रहे हैं। मैकेनिकल इंजीनियरिंग से शिक्षा क्षेत्र में आए नवलेश ने इससे पहले रूम टू रीड इंडिया ट्रस्ट और अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन में कार्य किया है। उनको कुकिंग, लंबी सैर करने और समाज, शिक्षा व अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर पढ़ने–लिखने में गहरी रुचि है। वे अपने विचार को वे लिंक्डइन पर सक्रियता के साथ साझा भी करते हैं।)
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I agree, having a clear understanding of learning outcomes plays a vital role in ensuring clarity and effectiveness in education.
इस लेख पर आप सभी की टिप्पणी के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया। इस लेख में आपके विचार वाकई महत्वपूर्ण हैं और इस चर्चा को आगे बढ़ाते हैं। शिक्षा के जुड़े विभिन्न मुद्दों पर आपके लेखों का स्वागत है।
बहुत ही उम्दा लेख है नवलेश…. ऐसे ही लिखते रहो।
शिक्षक होना एक जटिल कार्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके साथ जुड़ के कार्य करना बिल्कुल एक बड़ी बात है l धैर्य के साथ किसी भी बच्चे को सिखाना निरंतर उनका आकलन करना निश्चित समय अंतराल में परिणाम लेना राष्ट्र निर्माण है l आपके लेख को मै सिर्फ पढ़ नहीं रही देख भी रही हु, कोई भी बच्चा 3 से 8 वर्ष का text से ज्यादा पिक्चर, ऑडियो, वीडियो, एक्शन, जेस्चर पोस्चर से अट्रैक्ट होता है उसपे फोकस ही उत्तम है l और 30% स्टडी by बुक हो l
नवलेश भाई, आपने एक शिक्षक की सीखने सीखने की यात्रा को ठीक से साझा किया है, आपके आर्टिकल पढ़ने के बाद स्पष्टता दिखाई देती है कि एक शिक्षक अपने कक्षा में क्या करें कि उनके छात्रों का स्तर बेहतर हो। यहां बच्चे शिक्षिका की भूमिका से तो सीख ही रहे हैं साथ ही प्रिंट रिच वातावरण का इस्तेमाल बखूबी हो रहा है। छात्रों को सीखने के उचित अवसर मिल रहे है, वे सोच रहे है, सवाल पर चिंतन कर रहे है। इन प्रयास बच्चे सीखेंगे।
Indeed, This is very important aspect for betterment of our education system. Well articulation, Great perspective 👏
It is very well written and thoughtfully curated, and I completely agree with the concept of a “clear learning objective.” It is important not just to teach concepts, but to ensure that there is a clear objective and a goal to be achieved.
निश्चय ही यह लेख शिक्षकों के लिए एक मार्गदर्शक का कार्य करेगा..विशेष कर एसे शिक्षक जो वास्तव में बच्चों में बदलाव लाना चाहते हैं..उनके सीखने की प्रक्रिया को सरल बनाना चाहते हैं….
आर्टिकल..शिक्षण में स्पष्टता…वास्तव में बहुत ही अच्छा लेख है यह लेख हमे बताता है कि..हम कैसे बच्चों के शिक्षण को उनके रोजमर्रा की जरूरतों के साथ जोड़कर उन्हें आसानी से समझा सकते हैं
निश्चय ही यह लेख शिक्षकों के लिए एक मार्गदर्शक का कार्य करेगा..विशेष कर एसे शिक्षक जो वास्तव में बच्चों में बदलाव लाना चाहते हैं..उनके सीखने की प्रक्रिया को सरल बनाना चाहते हैं….
Good one Nawlesh sir👍,Clear learning outcomes helps teachers in selecting the most effective teaching methods, to help students reach their goals.
Keep it up.
बहुत अच्छा लिखें है नवलेश बाबू।
विजय
गया, बिहार
Nice article 💯
इस आर्टिकल से मुझे जॉन हैटी के बारे में पता चला। मुझे आने वाले दिनों में इनके बारे में पढ़ना है।
आर्टिकल अच्छी लगी पढ़कर।
रिजवान अली
शिक्षक, अमरोहा
Really appreciate how precisely the article is penned, Nawlesh always has a peculiar way of observating things keenly and articulate it so finely✨
बहुत से शिक्षक अपनी कक्षा में इससे संबंधित समस्या का सामना करते हैं और वे इसे समझने में नाकाम रहते हैं। अपने बहुत ही सटीकता से न केवल समस्या को समझा बल्कि उसके लिए संभावित उपाय भी सुझाए। लर्निंग ऑब्जेक्टिव की कक्षा में उपयोगिता से संबंधित लेख के लिए बहुत धन्यवाद।
Focus on daily learning outcomes and objectives is now becoming priority after NEP 2020 AND NCF 2022.
However, educators needs deliberate attention on this and teachers have to be reminded of this again’ and again in the trainings, workshops, Refreshers, ISTT etc.
Thanks Nawlesh for putting it beautifully. The story is catchy and it triggers the readers to read the whole article.
SAMIKSHA
(APU)
आपसे बात करके या इस आपके द्वारा लिखे आलेख को पढ़कर , हमेशा मुझे कुछ न कुछ सीखने को मिला है।
जब आप स्कूल आते थे, बच्चों को पढ़ाते थे, क्लस्टर कार्यशाला करवाते थे, तो मुझे हर समय आपसे सीखने को मिला है ।
Thank you, नवलेश सर।
कीर्ति कच्छवाह
शिक्षक, जालोर, राजस्थान
बहुत सुंदर आलेख है। लिखकर हमारे साथ साझा करने के लिए धन्यवाद, नवलेश सर ।
अधिकांश समय मैं भी जब कक्षा में पढ़ाता हूं, तो मुझे लगता है कि स्पष्ट सीखने के उद्देश्य की कमी होती है और बस गतिविधियां ही करवाते रहता हूं। कोशिश करूंगा कि हर दिन का एक स्पष्ट सीखने का उद्देश्य हो ।
मैं इसको अपने शिक्षक समूह में भी शेयर किया हूं , ताकि ज्यादा लोग पढ़कर इससे लाभ ले सकें।
Bahut achhe se vyakt kiya gaya hai
While reading I felt that, this may be the story of Tina’s mam Classroom, but I felt this is the story of my classroom as well. I felt a connection of my classroom in this story.
As a teacher, I understood the importance of clear learning objectives and I will implement this in my classroom.
Thank you Nawlesh sir for sharing your thoughts.
Sanjiv
Assistant teacher, Jharkhand
Great Read, Nawlesh. Thank you for writing. Daily clear learning outcome is really important for a teacher as well as children. The teacher can map the SLO progress and plan the day accordingly. At the end of the day, he/she can reflect , whether that particular learning outcome is achieved or not. If not, what differently can be planned based on the context, background and the influencing factor.
यह लेख बच्चों की शिक्षा की आवश्यकता को न केवल सूचित करता है, बल्कि गहराई से भावनात्मक रूप में भी जोड़ता है। लेखक ने शिक्षा को बच्चों के समग्र विकास से जोड़ते हुए जिस संवेदनशीलता और समझ के साथ विषय को प्रस्तुत किया है, वह सराहनीय है। यह लेख प्रासंगिक है व पढ़ते समय न केवल एक पाठक के रूप में, बल्कि एक नागरिक के रूप में भी शिक्षा के बदलते स्वरूप पर मजबूर करता है
Good article, it’s giving sense of how teaching padegogy works towards LOs.
Keep it up.
बहुत ही सरल और सुन्दर शब्दों मे लेख लिखा है ।आपने ये बात सही कही हैं।जब तक कांसेप्ट क्लीयर नहीं होगा बच्चा नही सीख पायेगा और कांसेप्ट क्लीयर करने के लिए आज टीचर्स को नवीनप्रणली को devlop करने की आवश्यकता है।
Sangita (A.T)
Nice
बहुत ही सरल व सुंदर ढंग से लेखक ने अपनी बात को इस लेख के माध्यम से साझा किया है, जब भी शिक्षण के तौर तरीकों की बात आती है तो अधिकतर शिक्षक पुरानी पद्धतियों को ही सही मानते हुए अपना कार्य करते है परन्तु हर बदलते समय के साथ हमे अपने शिक्षण के माध्यम को नवीनीकृत करते रहना चाहिए तभी शिक्षण रोचक व उचित परिणाम के योग्य बना रह सकेगा।
धन्यवाद।
Interesting read. Thanks Nawlesh to put it down. I have always loved reading your writing whether it be on LinkedIn, quora or anywhere. You always brings a useful perspective.
दूरदृष्टि और मार्गदर्शन से प्रेरित अनुभव👍
Well explained. It’s important that the teacher could address the educational needs of children in the classroom. The objectives/outcomes should be drawn in context of the child for which the assessment plays a key role.
BAHUT SIMPLE SHABDO aur Examples Ka use kiya hai. TEACHER YAH BHI JAAN PAATA HAI KI TEXTBOOK KE KISI PAATH SE BACCHE KO KYA SIKHAANA CHAHTE HAI. CONTENT KO SKILL BUILD KARNE KE MEDIUM KE RUP ME DEKHNE LAGTA HAI. ISSE ULTIMATELY TEACHING PRACTICES PAR REFLECT KARNE KA MAUKA DETA HAI.. NICE NAWLES LIKHTE RAHE AISE HI..