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‘बच्चे मात्राएं कैसे सीखेंगे?’

हिंदी भाषा, पढ़ना कैसे सिखाएं, समझकर पढ़ना, मात्रा ज्ञान

हिंदी भाषा में समझकर पढ़ने की अवधारणा पर जोर दिया जा रहा है।

किसी भी स्कूल में हिंदी भाषा के शिक्षक के लिए यह सवाल महत्वपूर्ण है कि बच्चे मात्रा कैसे सीखेंगे। क्योंकि मात्राओं को जाने बग़ैर कोई बच्चा किताब पढ़ पाएगा, किसी शिक्षक के लिए इस बात को स्वीकार करना बहुत मुश्किल सी बात है। इसका सबसे प्रमुख कारण है कि बहुत से शिक्षकों ने एक ख़ास तरीके से पढ़ना सीखा है।

वे अभी भी बच्चों को पढ़ाने का वही परंपरागत तरीका काम में ले रहे हैं। जो इस मान्यता पर टिका है कि बच्चे पहले अक्षर/ध्वनि, फिर शब्द, फिर वाक्य, फिर संदर्भ और अंत में अर्थ समझते हैं। रीडिंग रिसर्च की शब्दावली में इस अप्रोच को फोनिक्स अप्रोच के नाम से जाना जाता है।

होल लैंग्वेज अप्रोच क्या है?

जबकि होल लैंग्वेज अप्रोच यानी भाषा शिक्षण का समग्रतावादी दृष्टिकोण कहता है,” किसी भी भाषा का विकास केवल एक तरीके से होता है, “जब हम किसी संदेश को समझते हैं।” इस संकल्पना का दावा है कि सीखना और समझना दोनों लगभग समान हैं। उदाहरण के लिए- अपनी कॉपी पर लिखे शब्दों को देखकर बच्चे पहचान लेते हैं कि मेरा नाम लिखा है। यह पहचान बच्चे अपने अनुभव और अनुमान के आधार पर लगाते हैं। बच्चे भले ही उसका अलग-अलग हिज्जे करके न बता पाएं, लेकिन वे जानते हैं कि उनकी कॉपी पर उनका ही नाम लिखा है। किसी और का नहीं।

होल लैंग्वेज अप्रोच में भाषा के समझने वाले आयाम पर काफी ज़ोर दिया जाता है। इसके अनुसार, “दुनिया को समझने के लिए भाषा एक बढ़िया औज़ार का काम देती है। इसलिए जरूरी है कि हम दुनिया को बच्चों की निगाह से देखें और बच्चों की ज़िंदगी में भाषा के महत्व को समझें।” इसकी मान्यता है कि पहली कक्षा में आने वाले बच्चे समृद्ध और विकसित मातृभाषा ज्ञान के साथ आते हैं। वह अपनी भावनाओं और जरूरतों को भाषा के माध्यम से बखूबी अभिव्यक्त कर लेते हैं।

भाषा के नियम जानते हैं बच्चे

इसी के साथ-साथ भाषा के दूसरे पहलू पर भी ध्यान दिया जाता है कि भाषा नियमबद्ध होती है। बच्चे की भाषा इस बात का प्रमाण है कि वे इन नियमों का प्रयोग करते हैं, भले ही वे इन नियमों को न बता पाएं। यदि परिवेश में बोली जाने वाली भाषा सुनकर बच्चे बोलना सीख जाते हैं तो समृद्ध परिवेश मिलने पर बच्चे पढ़ना-लिखना भी सीख सकते हैं। लिखित भाषा का भरपूर परिवेश यदि स्कूल में बनाया जाए तो स्वतः ही पढ़ने-लिखने की क्षमता का विकास करने में बच्चों को सहायता मिलेगी।

तीसरी बात, “पढ़ना-लिखना साथ-साथ चलने वाली प्रक्रियाएं हैं। ये न केवल साथ-साथ विकसति होती हैं बल्कि एक-दूसरे के विकास में सहायक भी होती हैं। पढ़ने-लिखने के बारे में बात करते हुए इस बात पर बल देना जरूरी है कि बच्चे भाषा का इस्तेमाल सिर्फ पढ़ने-लिखने और बोलने के लिए ही न करें, बल्कि तर्क करने, विश्लेषण करने और अनुमान लगाने, अपनी भावनाओं और सोच को व्यक्त अभिव्यक्त करने और कल्पना करने आदि के लिए भी करें।

मात्राओं का सवाल

‘बड़ों से दो बातें’ में मात्राएं सीखने वाले सवाल का जवाब है, “इस किताब को पढ़ते वक्त आप सभी के ज़हन में सवाल उठेगा कि बच्चे मात्राएं कैसे सीखेंगे। यह जरूरी नहीं है कि बच्चे सारे अक्षर जानने के बाद ही मात्रा पहचान पाएंगे या इस्तेमाल कर पाएंगे। सार्थक संदर्भ में किसी भी सामग्री को बार-बार देखने के बाद बच्चे मात्राओं की ओर बढ़ सकते हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि तबतक बच्चे पढ़ेंगे कैसे, लिखेंगे कैसे? इसका जवाब यह है कि बच्चे आपकी मदद से, चित्रों से मिल रहे संकेतों का इस्तेमाल करते हुए और अनुमान लगाते हुए पढ़ंगे और यह प्रक्रिया लंबी भी हो सकती है।”

इस तरह के जवाब, एक तरह से जवाब होते हुए भी जवाब नहीं हैं। क्योंकि वे मात्रा सिखाने की प्रक्रिया के बारे में कुछ नहीं कहते। बस एक संकेत भर करते हैं। मात्रा सिखाने के तरीके के बारे में विस्तार से जानने के लिए एजुकेशन मिरर पर पूर्व में प्रकाशित यह पोस्ट पढ़ सकते हैंः

1. हिंदी भाषा में मात्राओं को पढ़ना-लिखना कैसे सिखाएं? 

2.हिंदी शिक्षणः क्यों होती है मात्राओं की ग़लती?

(एजुकेशन मिरर की इस पोस्ट से गुजरने के लिए आपका शुक्रिया। अब आपकी बारी है, आप इस लेख के बारे में दूसरों के साथ क्या साझा करना चाहेंगे, लिखिए अपनी राय कमेंट बॉक्स में अपने नाम के साथ। शिक्षा से जुड़े कोई अन्य सवाल, सुझाव या लेख आपके पास हों तो जरूर साझा करें। हम उनको एजुकेशन मिरर पर प्रकाशित करेंगे ताकि अन्य शिक्षक साथी भी इससे लाभान्वित हो सकें।)

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Ram kishor das
Ram kishor das
7 years ago

हमे बहुत अच्छा लगा पठन पाठन मे हमे यह भी सीख मिला है।की बच्चो को पढाने का तरीका मालुम हुआ है।

Jamal pathak
Jamal pathak
9 years ago

Sandar

Virjesh Singh
Reply to  Jamal pathak
9 years ago

बहुत-बहुत शुक्रिया जमाल जी। एजुकेशन मिरर पर आपके आने और अपने विचारों को साझा करने का सिलसिला यों ही बना रहे।

Rajeev Singh
10 years ago

good article

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