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शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026

पठन कौशल विकास के लिए कैसे काम करें शिक्षक?

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बच्चा पढ़ना अपने आप नहीं सीखता। बोलना वह परिवार और परिवेश से सहज रूप से सीख लेता है, लेकिन लिखे हुए को पढ़ना एक ऐसा कौशल है जिसे सोच-समझकर और व्यवस्थित ढंग से सिखाना पड़ता है। इसीलिए पठन कौशल के विकास में शिक्षक की भूमिका सबसे निर्णायक होती है।

पढ़ना सीखने के दो पहलू हैं। पहला है पढ़ने की क्षमता, यानी लिखे हुए को पहचानना और उसका अर्थ समझना। दूसरा है पढ़ने की इच्छा, यानी किताबों से लगाव और पढ़ने की आदत। शिक्षक जब बच्चों को कहानियाँ पढ़कर सुनाते हैं, कविताओं के ज़रिए भाषा के सौंदर्य का स्वाद चखाते हैं और किताबों तक बच्चों की पहुँच बनाते हैं, तो वे दोनों पहलुओं पर एक साथ काम कर रहे होते हैं।

यह लेख बताता है कि पठन कौशल किन घटकों से बनता है, और कक्षा में शिक्षक हर घटक को मज़बूत करने के लिए क्या कर सकते हैं।

उदाहरण के तौर पर बच्चों को कहानियां पढ़कर सुनाना, कहानी की किताबों के प्रति एक मोह पैदा करना, कविताओं की किताबों के जरिए भाषा के सौंदर्य के स्वाद चखने के लिए बच्चों को आमंत्रित करने वाली भूमिकाएं निभाकर शिक्षक बच्चों के लिए किताबों की दुनिया का दरवाज़ा खोल सकते हैं।

इस लेख में
  1. पठन कौशल
  2. समझ के साथ पढ़ना
  3. शिक्षक की भूमिका

पठन कौशल

सबसे पहला सवाल पठन कौशल क्या है?  पठन कौशल का अर्थ है लिखित सामग्री को पहचानकर उससे अर्थ ग्रहण कर पाना। इसे समझने के लिए शोध में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला ढाँचा “सरल पठन दृष्टिकोण” (Simple View of Reading) है, जिसे गफ़ और टनमर ने 1986 में प्रस्तुत किया था। इसके अनुसार:

समझ के साथ पढ़ना = डिकोडिंग × भाषा की समझ

डिकोडिंग

डिकोडिंग का अर्थ है लिखित प्रतीकों को बोली जाने वाली भाषा की ध्वनियों में बदलना। हिंदी के संदर्भ में इसका मतलब है वर्णों और मात्राओं को पहचानना, उन्हें जोड़कर अक्षर बनाना और फिर अक्षरों को जोड़कर शब्द का सही उच्चारण करना। डिकोडिंग बोलकर भी हो सकती है और मन में भी।

हिंदी की लिपि देवनागरी में एक खास बात है। यह अक्षर पर आधारित लिपि है, जिसमें वर्ण और मात्रा मिलकर एक इकाई बनाते हैं, जैसे क + ा = का। शोध बताता है कि ऐसी लिपियों में बच्चों को सैकड़ों अक्षर-रूप सीखने पड़ते हैं, जिनमें मात्राएँ और संयुक्ताक्षर भी शामिल हैं। इसलिए हिंदी में डिकोडिंग का व्यवस्थित और क्रमबद्ध शिक्षण और भी ज़रूरी हो जाता है।

डिकोडिंग सीखने के बाद बच्चे को किसी शब्द का अर्थ तभी मिलता है जब वह शब्द उसके सुने हुए शब्द-भंडार में पहले से मौजूद हो। जब बच्चा “बकरी” पढ़ता है और उसने यह शब्द पहले सुना है, तो उसके मन में तुरंत उसका अर्थ जुड़ जाता है।

बार-बार अभ्यास से बच्चा शब्दों को अक्षर-अक्षर जोड़े बिना, एक नज़र में पहचानने लगता है। इसे स्वचालितता कहते हैं। जब पहचान स्वचालित हो जाती है, तो पढ़ने में गति, सही उच्चारण और उचित उतार-चढ़ाव आ जाता है, जिसे धाराप्रवाह पठन कहते हैं। धाराप्रवाह पठन डिकोडिंग और समझ के बीच का पुल है: जब बच्चे का ध्यान शब्द पहचानने में नहीं खपता, तब वह अर्थ पर ध्यान दे पाता है।

समझ के साथ पढ़ना

पठन कौशल का दूसरा घटक है समझ, यानी धाराप्रवाह पढ़ते हुए पाठ से अर्थ निकाल पाना। समझ के साथ पढ़ने वाला पाठक पाठ में निहित भावों और विचारों को ग्रहण करता है, उससे जुड़े सवालों के जवाब देता है, पढ़ी हुई बात पर अपनी राय बनाता है, उसकी समीक्षा करता है और दूसरों को उसके बारे में बता पाता है।

समझ कोई एक कौशल नहीं, कई धागों से बनी रस्सी है। हॉलिस स्कारबरो (2001) ने इसे “पठन रस्सी” के रूप में समझाया। इस रस्सी का एक हिस्सा शब्द पहचान है, जिसमें ध्वनि-जागरूकता, डिकोडिंग और शब्दों की तुरंत पहचान आती है। दूसरा हिस्सा भाषा की समझ है, जिसके धागे हैं:

  • शब्द-भंडार: जितने अधिक शब्द बच्चा जानता है, उतना अधिक वह समझ पाता है।
  • पूर्व ज्ञान: दुनिया के बारे में बच्चे की जानकारी उसे नए पाठ से जुड़ने में मदद करती है।
  • भाषा की संरचना: वाक्य कैसे बनते हैं और शब्द आपस में कैसे जुड़ते हैं।
  • तर्क और अनुमान: पाठ में सीधे न लिखी बात को समझ पाना।
  • पाठ की बनावट की समझ: कहानी, कविता और जानकारी वाले पाठ अलग-अलग ढंग से लिखे जाते हैं।

जैसे-जैसे बच्चा पढ़ने में कुशल होता है, ये धागे आपस में कसकर गुँथते जाते हैं। शब्द पहचान अधिक स्वचालित होती जाती है और भाषा की समझ अधिक सोची-समझी और रणनीतिक। इसका सीधा अर्थ यह है कि समझ पर काम तब तक नहीं रोका जा सकता जब तक बच्चा पढ़ना न सीख ले। शब्द-भंडार और मौखिक भाषा पर काम पहले दिन से शुरू होना चाहिए।

शिक्षक की भूमिका

किसी भाषा के कालांश में काम करते समय एक शिक्षक डिकोडिंग और समझने दोनों पक्षों पर ध्यान देता है। सबसे पहले सुनकर समझने की क्षमता का विकास जरूरी होता है। ताकि एक बच्चा शिक्षक के निर्देशों को समझ पाए और उस भाषा की कहानियों और कविताओं को सुनकर समझ पाए। उसका आनंद ले पाए।

इससे बच्चा एक स्तर पर उस भाषा के डिकोडिंग वाले पक्ष पर जाने के लिए तैयार हो जाता है। वह लिखित प्रतीकों व ध्वनि प्रतीकों के बीच एक संबंध बैठा पाता है, यानि डिकोडिंग करना सीखता है। इसके बाद जब वह रफ्तार के साथ कई अक्षरों को मिलाकर एक शब्द पढ़ता है और वह शब्द उसने पहले सुना है तो वह उस शब्द का अर्थ भी जान पाता है।

समझ वाले हिस्से पर काम करने के लिए शिक्षक पुस्तकालय की बड़ी किताबों का इस्तेमाल कर सकते हैं। ताकि चित्रों और लिखित सामग्री के बीच वाले रिश्ते को समझने में छात्रों को मदद कर सकें। पठन कौशल विकास के शुरुआती स्तर पर इस तरह से पढ़ने का मौका अगर बच्चे को पुस्तकालय में मिले तो वह बच्चों को स्वतंत्र पाठक बनने में काफी मदद करता है। जो किसी भी लिट्रेसी कार्यक्रम का या भाषा कालांश का अंतिम लक्ष्य है कि बच्चा स्वतंत्रता के साथ किसी लिखित सामग्री को समझते हुए पढ़ पाए।

20150828_124632दोनों कौशलों के विकास में शिक्षक की अहम भूमिका है। इसके लिए शिक्षक स्केपफोल्डिंग की प्रासेस (i do, we do, you do) का इस्तेमाल कर सकते हैं। यानि वे बच्चों को पहले कोई चीज़ खुद करके दिखाएं। फिर उनके साथ-साथ उसको करें। आखिर में बच्चों को खुद से उसी चीज़ को करने का मौका दें। (स्केपफोल्डिंग के बारे में अगली पोस्ट में विस्तार से लिखेंगे।)

उदाहरण के तौर पर अगर शिक्षक बच्चों को कहानी पढ़कर सुनाते हैं तो बच्चा सुनकर समझने का कौशल तो विकसित करता ही है। इसके साथ-साथ वह यह भी सीखता है कि किसी किताब को कैसे पढ़ते हैं? ऐसी बहुत सी चीज़ें बच्चे शिक्षक को देखकर स्वतः ही सीख लेते हैं। जिसके लिए शिक्षक को अलग से प्रयास करने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती।

(लेखक परिचय: वृजेश सिंह पिछले एक दशक से अधिक समय से शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत हैं। उन्हें बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मकता (FLN) और पुस्तकालय कार्यक्रम को बड़े स्तर पर क्रियान्वयन और नेतृत्व करने का गहन अनुभव है। शिक्षा क्षेत्र के अनुभवों को कक्षा-कक्ष में लागू किए जा सकने वाले व्यावहारिक विचारों में ढालना उनके काम की एक विशेष पहचान है। उन्होंने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ (TISS), मुंबई से प्रारंभिक शिक्षा में स्नातकोत्तर किया है।)

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