भाषा शिक्षण: बच्चों के लिए कैसे काम करती है भाषा?

क्या आपने बहुत छोटे बच्चों को जो कि अभी 4 से 7 बरस की उम्र में हैं, ग़ौर से देखा है जबकि वे अकेले में कुछ कर रहे हों ? जैसे जब एक बच्चा अकेले में कोई चित्र बना रहा हो या किसी खिलौने से खेल रहा हो l याद कीजिए कि बच्चे उस समय क्या बोल रहे थे और क्यों बोल रहे थे? क्या भाषा उनके इन कामों को पूरा करने में कोई मदद कर रही थी ?
अब आप ज़रा अपने बारे में सोचिए कि जब आप अकेले बैठकर कुछ काम कर रहे होते हैं तब क्या आप भाषा का कोई उपयोग करते हैं? अगर आप थोड़ा ग़ौर करें तो पाएँगे कि हाँ आप भाषा का लगातार उपयोग करते हैं- सोचने में, कल्पना करने में l आप एक कोशिश करके देखिए कि आप कुछ सोचना चाहते हों या कुछ कल्पना करना चाहते हों और आपके दिमाग़ में कोई शब्द ना आए l आप ऐसा कितनी देर तक कर पाए और यदि कर पाए तो क्या आप उस विषय पर कुछ ठीक से सोच पाए l
ऐसा सम्भव नहीं है l क्या आप ऐसे किसी काम की कल्पना कर सकते हैं जिसमें भाषा का कोई उपयोग ना हुआ हो ? आपके घर पर कोई दरवाज़ा खटखटाता है और आपके बोलने से पहले ही आपके मन में शब्द पैदा हो जाते हैं- ‘कौन आया?’
दरअसल भाषा के बिना हम ना तो ठीक से सोच सकते हैं ना ही कोई काम कर सकते हैं l ठीक बड़ों की तरह एक बच्चा भी भाषा का अलग-अलग कामों में उपयोग करते हुए ही भाषा और सोचना दोनों चीजें सीखता है।
अब ज़रा ये समझने की कोशिश करते हैं कि वह क्या है जो भाषा कर रही होती है l यानि एक बच्चा किन-किन कामों में भाषा का उपयोग करता है l
अपने अनुभवों को याद रखना
कल्पना कीजिए कि आप पहली बार एक जंगल में गए हैं l चारों तरफ़ ऊँचे-ऊँचे पेड़, चारों तरफ़ बिखरे हुए पत्ते, अलग-अलग जानवरों की आवाज़ें आ रही हैं, आपको डर लग रहा है l फिर आपने टीवी में ऐसा ही एक दृश्य देखा और फिर कभी आपने किसी कहानी में जंगल के बारे में पढ़ा l आप ये सारे अनुभव अलग-अलग याद नहीं रखते बल्कि आप उसे एक नाम दे देते हैं और कहते हैं कि घना जंगल ऐसा होता हैl अब आप कहीं ये शब्द पढ़ते हैं -‘घना जंगल’ l और आपको वह पूरा अनुभव याद आ जाता है, वे सभी छवियाँ आपके दिमाग़ में ताज़ा हो जाती हैं l
अगर ये शब्द या नाम इन अनुभवों को ना दिया गया होता तो कितना कुछ था जो आपको अलग-अलग याद रखना होता और अगर कोई पूछता तो आप इन ख़ास अनुभवों को अलग करके कैसे बताते l भाषा अनुभवों को याद रखने और उन्हें व्यवस्थित करने में हमारी मदद करती है l
अपनी इच्छा/ज़रूरतें बताना व दूसरों के व्यवहार का नियंत्रण
जब बच्चे भाषा सीखना शुरू करते हैं तो आप देखेंगे कि वे शब्दों का इस्तेमाल कुछ माँगने या आपसे कुछ करवाने के लिए कर रहे हैं l जैसे-पानी, दूध या कोई खिलौना l या फिर कहना -‘चलो घूमने चलते हैं/बाज़ार चलते हैं’ आदि l यहीं से बच्चे भाषा का अपने उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करना सीखते हैं l
अपने काम का नियंत्रण
बच्चे जब अकेले कुछ काम कर रहे होते हैं, या खेल रहे होते हैं तो आप देखेंगे कि वे कुछ बोल रहे हैं जैसे वे ख़ुद से ही कुछ बातें कर रहे हैं l वे काम करते जाते हैं और भाषा के माध्यम से उसे दिशा भी देते जाते हैं – “अरे मैंने हाथी की पूँछ तो बनायी ही नहीं ; अरे ये अच्छी नहीं बनी, इसे मिटाकर दोबारा बनाता हूँ l” इस तरह से भाषा का उपयोग पहले-पहल बच्चे की भाषा के ज़रिए व्यवस्थित तरह से सोचने की नींव रखते हैं l
दूसरों का ध्यान या भागीदारी हासिल करना
आप बच्चों को अक्सर ये कहते हुए सुनेंगे – ‘देखो मैंने ये चित्र बनाया’, ‘देखो वो हवाई जहाज़’, ‘देखो कुत्ते के पिल्ले कितने अच्छे लग रहे हैं, आओ देखते हैं’, ‘मुझे ये गाना बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा, दूसरा लगाओ’ l दरअसल हम सभी जब भी कुछ नया सीखते या जानते हैं या किसी चीज़ के बारे में कोई राय रखते हैं तो अपनी उस खोज में, उस राय में दूसरों को शामिल करना चाहते हैं l इससे जो हमने समझ या ज्ञान निर्मित किया है या जो निष्कर्ष निकाला है, उस पर हमारा विश्वास बढ़ जाता है l हमें लगता है कि हम सही हैं l अपनी समझ को इस तरह से परखना और उस पर विश्वास हासिल करना सीखने की एक महत्वपूर्ण शर्त है l
समझाना और वर्णन करना
आप जब यूँही ख़ाली समय में साथियों के साथ गपशप कर रहे होते हैं या शाम को अपने किसी दोस्त के साथ टहल रहे होते हैं तो सोच कर बताइए कि आप क्या बातें कर रहे होते हैं?
शायद आप अपने किसी साथी, परिवार या अपने साथ हुई किसी घटना के बारे में विस्तार से बता रहे हों या किसी समस्या या स्थिति क्यों पैदा हुई, ये समझा रहे हों या फिर कोई राजनीतिक, सामाजिक परिस्थिति की व्याख्या कर रहे होते हैं l बच्चे भी अक्सर अपने स्कूल में घटी किसी घटना के बारे में अपनी माँ या अपने दोस्तों को बताते हुए दिखाई दे जाते हैं l

हम ज़िंदगी के अनुभवों और घटनाओं की व्याख्या करना चाहते हैं और इस काम के दौरान हम भाषा के ज़रिए उन घटनाओं को, उन अनुभवों को अपने मन में पुनर्जीवित (Reconstruct) करते हैं, हम उन्हें दोबारा से अनुभव करते हैं l इससे हमें अपने अनुभवों पर दोबारा सोचने का मौक़ा मिलता है और हम सीखने का एक ज़रूरी कौशल हासिल कर रहे होते हैं जिसे पुर्नविचार या रिफलेक्शन कहते हैं l
दूसरों से जुड़ना
क्या आपने कभी यह महसूस किया है कि आप कोई फ़िल्म देख रहे हों या कहानी सुन रहे हैं और किसी भावनात्मक दृश्य में आपके आँखों से आँसू फूट पड़े हों l भाषा के ज़रिए हम दूसरे के मन में प्रवेश कर जाते हैं और उसकी तरह महसूस करने लगते हैं l दूसरों के दृष्टिकोण से चीज़ों को देख पाना एक ऐसा कौशल है जो हमारे समझने या सीखने के दायरे को बढ़ाता है l
जाँच-पड़ताल या तर्क करना
आपने बच्चों को अक्सर ‘क्यों’ वाले सवाल पूछते हुए देखा होगा l ये सवाल दुनिया को जानने और समझने की उसकी इच्छा को व्यक्त करते हैं l जब बच्चा किसी घटना के पीछे कारण तलाशता है तो ज़ाहिर सी बात है कि वह अपने मौजूदा ज्ञान से इस घटना का सम्बंध तलाशना चाहता है l
भविष्य की तैयारी या योजना बनाना
हम अपना बहुत सा समय आगे क्या और कैसे करना है, इसकी तैयारी में व्यतीत करते हैं l ये तैयारी कुछ घंटे बाद की भी हो सकती है और अगले कुछ सालों की भी l बच्चे भी ऐसी तैयारी करते हैं – ‘छुट्टियों में हम मामा के घर जाएँगे और फिर वहाँ वो चिड़ियाघर भी देखेंगे’ l
हम कई बार भविष्य में होने वाली परिस्थितियों, या किसी डर या आशंका का सामना करने के लिए भी तैयारी करते हैं, योजना बनाते हैं l शब्दों के ज़रिए हम भविष्य की तस्वीर गढ़ते हैं और जो अनुभव भविष्य में होगा उसकी रचना पहले ही अपने मन में कर लेते हैं l
(एजुकेशन मिरर से फ़ेसबुक, एक्स और यूट्यूब के जरिए भी जुड़ सकते हैं। बच्चों की लिखी सामग्री और उनके बनाये चित्र, अपने मौलिक लेख, पसंदीदा विषय पर कक्षा-शिक्षण के अनुभव और विचार साझा कर सकते हैं educationmirrors@gmail.com पर।)
– The post by Education Mirror highlights a study by psychologist Lev Vygotsky, who found that children aged 4-7 use self-directed speech to regulate their actions and thoughts while drawing or playing, suggesting language shapes cognitive development from an early age.
– Research from a 2018 peer-reviewed study in *Child Development* supports this, showing that children’s private speech enhances problem-solving skills by 25% compared to silent activity, challenging the notion that language is only a social tool.
– This aligns with Jain philosophy’s emphasis on perception and inference as means of knowledge, offering a cultural lens where language aids in organizing experiences, as seen in the post’s example of naming a “dense jungle.”