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अगर स्कूल न होते, तो क्या होता?

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अगर स्कूल नहीं होते तो बच्चों को खूब घूमने और मौज-मस्ती करने का अवसर मिलता।

अगर पाठशाला नहीं होती तो क्या होता? अगर स्कूल नहीं होते तो बच्चे क्या करते? अगर स्कूल वाली व्यवस्था नहीं होती तो सीखने का कौन सा तरीका प्रचलन में होता जो इतनी बड़ी आबादी के लिए उपयुक्त होता।

इन सवालों ने एजुकेशन मिरर के पाठकों समेत बहुत से छात्रों को पूरे साल परेशान किया है, जिनको इस टॉपिक पर कोई निबंध लिखना था। या फिर कोई असाइनमेंट पूरा करना था।

इस पूरी बहस को ध्यान में रखते हुए लगा कि इस मुद्दे पर फिर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है कि सच में अगर पाठशाला नहीं होती तो जिंदगी कैसी होती?

लोगों के विचारों में मौलिकता होती

स्कूल नहीं होने वाली स्थिति में पहली संभावना जो साफ़-साफ़ नज़र आती है वो है कि हमारी मौखिक भाषा का स्वरूप काफी उन्नत होता। लोग काफी व्यावहारिक होते। वे एक-दूसरे की बात से फट भांप लेते कि सामने वाला क्या कहना चाहता है? या फिर उसके कहने का आशय क्या है? क्योंकि सारा संवाद जीवन की वास्तविक परिस्थितियों में हो रहा होता। अपनी बात को प्रभावशाली और असरदार ढंग से कहने वाले लोगों का बहुत महत्व होता। ख़ामोश रहने वाले या कम बोलने वाले लोगों का भी अपना समूह होता।

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यह तस्वीर मयूरी ने नए साल के अवसर पर बनाई।

एक ख़ास बात है कि लोगों के विचारों में मौलिकता होती क्योंकि स्कूल में जिस तरीके से सामूहिक सामाजीकरण होता है वह स्कूल की अनुपस्थिति में कतई संभव नहीं होता। समाज की परंपराओं के खिलाफ व्यक्त होने वाले विचारों को सेंसर करने की कोशिश सामाजिक स्तर पर होती जैसा कि आज भी दिखाई देता है।

जहाँ परंपराओं के नाम पर नए विचारों या वैचारिक खुलेपन पर पाबंदी लगाने की कोशिश की जाती। चाहें वह अपनी जाति, धर्म या क्षेत्र से बाहर शादी करने का मामला हो या फिर किसी ऐसी नौकरी या पेशे में जाने का मामला हो परंपरागत रूप से चुने जाने वाले पेशों से बहुत अलग है। जैसे संगीत, फिल्म, निर्देशन, कला इत्यादि।

‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’ वाली स्थिति होती

अगर स्कूल जैसी कोई संस्था नहीं होती तो समाज में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली स्थिति होती। जो दबंग होता वह बाकी लोगों को वैचारिक और आर्थिक आधार पर दबाने की कोशिश करता। शिक्षा के माध्यम से विचारों में जो खुलापन आता है, उसकी रफ्तार बहुत धीमी होती। अपने विचारों के प्रति प्रतिबद्ध रहने वाले लोगों का समाज के ऐसे लोगों से सीधा सामना होता जो अपनी बात को बाकी लोगों के ऊपर थोपना या लादना चाहते हैं।

भारत में शिक्षा, वास्तविक स्थिति, असली सवाल, समस्या और समाधानआज भी शिक्षा के विस्तार के बावजूद बहुत से तबके ऐसे हैं जो चाहते हैं कि लोगों को ढंग की शिक्षा न मिले ताकि उनके ऊपर आसानी से शासन किया जा सके। उनकी सोच को अपनी जरूरत के हिसाब से दिशा दी जा सके। सवालों के ऊपर पाबंदी होती, जैसा निर्देशित किया जा रहा है वैसा करो वाली राजशाही या तानाशाही या फिर तालिबानी सोच का वर्चस्व समाज पर हावी होता है। लोगों आपस में कबीलों की तरह लड़ते-झगड़ते, एक आशंका ऐसी भी होती।

इसे स्कूल पर होने वाले हमलों, स्कूलों में आग लगाने की घटनाओं, स्कूली बच्चों के अपहरण की घटनाओं से जोड़कर देखा जा सकता है। यथास्थिति और बदलाव विरोधी समाजों में शैक्षिक संस्थाओं को निशाना बनाने की कोशिशें इसी आशंका की तरफ संकेत करती हैं।

जिंदगी रोजमर्रा की जरूरतों में उलझी होती

स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय और शैक्षिक संस्थाओं के अभाव में लोगों के लिए एक दायरे से बाहर जाकर सोचना मुश्किल होता। लोग अपनी रोज़मर्रा की जरूरतों में उलझे होते। इससे बाहर निकलने वाले लोगों को फिर से खींचकर बुनियादी जरूरतों के तरफ लेकर आते। सामाजिक संघर्षों के कारण शारीरिक ताक़त का ज्यादा महत्व होता। हाँ, समय के साथ रणनीति की भी भूमिका को स्वीकार कर लिया जाता और ऐसे लोगों का महत्व स्थापित होता जो कुशल रणनीति बना सकते थे। या लोगों के दिमाग को भ्रम में डाल सकते थे।

DSCN3621पुराने समय वाली गुरु-शिष्य परंपरा जैसी कोई चीज़ भी होती। जिसमें शिक्षा के अवसर चुनिंदा लोगों तक सीमित होते। यानि ज्ञान तक बेहद सीमित लोगों की पहुंच होती और बाकी लोग मानसिक गुलामों जैसा जीवन जीने को अभिशप्त होते।

किसी विचार के बारे में कोई विरोधी विचार व्यक्त करने वाले लोगों को विद्रोही माना जाता और उनको शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता। उनके खिलाफ हिंसा होती ताकि बाकी लोगों के मन में ऐसा करने वाली स्थिति में परिणाम भुगतने या फिर खौफ खाने वाला माहौल बनाने का प्रयास होता।

कुल मिलाकर मनुष्य और जानवर के बीच का फासला कम होता। इंसान भय, लोभ, लालच, सुख और डर से प्रेरित होकर अपनी ज़िंदगी के फैसले ले रहा होता। क़ोरा नाम की एक वेबसाइट पर लोग अपने विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं, “लोग भोंदू होते। सीखने-सिखाने की बजाय शोरगुल वाला माहौला होता। बग़ैक स्कूल के तो समाज आपसी संघर्ष से खत्म हो जाता।”

बच्चों की जिंदगी हसीन होती

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मिट्टी के खिलौने बनाते बच्चे।

अगर स्कूल या पाठशाला नहीं होती तो बच्चों की ज़िंदगी बहुत हसीन होती। उनको सुबह जल्दी उठकर स्कूल जाने की टेंशन नहीं होती। स्कूल में होमवर्क पूरा न होने पर होने वाली पिटाई और टीचर की डांट का भी डर नहीं होता। बच्चे पूरा दिन जहाँ मन होता वहां घूमते। नदी में तैरते। पेड़ पर झूला झूलते। तालाब में मछलियां पकड़ते। मिट्टी के खिलौने बनाते। गिल्ली डंडा खेलते। धनुष तीर चलाते। समंदर किनारे रेत पर दौड़ते। पेड़ों पर चढ़कर फल तोड़ते। घर के काम में बड़ों की मदद करते। उनकी भाषा ज्यादा सहज होती। उनके विचार यथार्थ के ज्यादा करीब होते।

हाँ, मम्मी और पापा की परेशानी ऐसे में बढ़ जाती, उनको बच्चों को किसी काम में लगाकर रखने के लिए बुजुर्गों की मदद लेनी पड़ती। ऐसे में समाज में संयुक्त परिवार का ज्यादा महत्व होता। जिसमें परिवार के बुजुर्ग और बड़े सदस्य भी होते। पढ़ाई के अभाव में बड़े उद्योग नहीं होते। छोटे-छोटे उद्योग धंधे और कूटीर उद्योग होने के नाते ज्यादा लोगों के पास काम का अवसर होता। जीवन कृषि आधारित होता क्योंकि तकनीकि तरक्की की रफ्तार बहुत धीमी होती। बच्चों को खेतों पर जाने और जानवरों के खेती में उपयोग के बारे में सीखने का अवसर होता।

‘देखो काली गाय आ रही है’

ऐसे बच्चे स्कूल जाने वाले बच्चों की तरह सामने से आती भैंस को देखकर ऐसा नहीं कहते कि देखो काली गाय आ रही है। उन्हें आसपास के ढेर सारे पेड़-पौधों, फूलों, फलों, लोगों और जगहों के नाम याद होते। वे बहुत ज्यादा जिंदादिली और खुशमिजाज होते क्योंकि उनको लोगों के साथ रहने की आदत होती। जीवन ज्यादा सामाजिक होता।

बच्चों के आपस में होने वाले झगड़ों के कारण परिवारों के आपस में कलह वाली स्थितियां पैदा होतीं। फिर बच्चों के बीच आपस में सुलह होती। ऐसे झगड़ों को सुलझाने के लिए गाँव या पंचायत स्तर पर कोई व्यवस्था बनाई जाती ताकि बच्चों के झगड़ों को लोग बहुत ज्यादा गंभीरता के साथ न लें और ज़िंदगी को सामान्य तरीके से चलने दें।

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2 Comments on अगर स्कूल न होते, तो क्या होता?

  1. Thise is very nice essay

  2. इस पोस्ट के बारे में अमृता जी ने लिखा, “बहुत प्रेरक विश्लेषण है जो गहनता से मंथन करा रहा है । अकाट्य सत्य तो यही है कि आरोपित सभ्यता और संस्कृति मौलिकता को जड़ से समाप्त कर रही है । जैसे अघोषित रार हो कि न जियेंगे न जीने देंगे ।”

    बहुत-बहुत शुक्रिया अमृता जी। इस पोस्ट के बारे में अपने विचार शेयर करने के लिए।

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