गणित के सवाल: तस्वीर बता, तुझमें क्या-क्या छिपा?
जब से मैंने इस तस्वीर को एजुकेशन मिरर पर प्रकाशित वृजेश के लेख – ‘’जोड़ के सवाल: ‘गलतियों के पैटर्न’ का प्रभावी शिक्षण में कैसे इस्तेमाल करें?’’ में देखा, तब से यह बार-बार मुझे खींचती रही। असल में इस तस्वीर का अधूरापन इसकी एक ख़ूबी है। यह आपको सब कुछ नहीं दिखाती। कुछ अधूरी चीज़ों के ज़रिए यह आपको सोचने के लिए मज़बूर करती है। यह हमें हमारे स्कूलों, शिक्षकों व शैक्षिक तंत्र के बारे में ढेरों चीजें बताती है। पहली नज़र से व सतही तौर पर देखने से यही लगता है कि दो में एक बच्चा दिए गए सवाल को हल कर पा रहा है और दूसरा हल नहीं कर पा रहा है। यह भी लगता है कि इस लड़की को तीन अंकीय संख्याओं के हासिल के जोड़ के सवाल हल करने नहीं आते हैं। यह बात सही भी है लेकिन क्या यह तस्वीर सिर्फ इतना ही बताती है। इस बात को समझने के लिए पहले हम थोड़ा ठहर कर तस्वीर को देखते हैं कि इसमें क्या-क्या दिखाई दे रहा है?
तस्वीर में क्या-क्या है?
तस्वीर में दो बच्चे दिखाई दे रहे हैं जिनमें एक लड़की व दूसरा लड़का है। दोनों बच्चे पूरी तल्लीनता के साथ बोर्ड पर तीन अंकीय हासिल के जोड़ का सवालों को हल कर रहे हैं। इस तरह के सवाल अमूमन कक्षा 3 या उसके बाद सिखाए जाते हैं तो ये दोनों बच्चे कक्षा 3 या 4 के हो सकते हैं। यह कक्षा 3 भी हो सकती है या कक्षा 4 भी या फिर दोनों ही कक्षाओं के बच्चे एक साथ भी हो सकते हैं।
लड़की ने इस सवाल को बाईं ओर से हल करना शुरू किया है, वह सैकड़े व दहाई के अंकों को जोड़ चुकी है, अब वह जोड़ के आखिरी चरण में है, यानी इकाई अंकों को जोड़ रही है। अब तक उसने जिस तरह से जोड़ा है उससे हम यह अंदाज़ आसानी से लगा सकते हैं कि वह 2 व 9 को जोड़ कर 11 हासिल कर लेगी। और 982 व 139 का जोड़फल 101111 निकाल लेगी। लड़की के हाथों की मुद्रा से लगता है कि वह अंकों का जोड़ अपनी उंगलियों पर कर रही है। उसकी मुद्रा से यह भी लगता है कि उसे पूरा यकीन है कि वह सवाल को सही हल कर रही है, उसके चेहरे पर सवाल को लेकर किसी तरह की उलझन का भाव नहीं है।
लड़का भी बोर्ड पर तीन अंकीय हासिल के जोड़ के सवाल को हल कर रहा है। उसके सवाल में पहली संख्या का इकाई का अंक करीब-करीब पूरा छिप गया है। उसने दहाई के अंक पर हासिल का एक लिखा हुआ है, इससे हम यह अंदाज़ लगा सकते हैं कि दोनों संख्याओं के इकाई के अंक का योग दस से उन्नीस के बीच होना चाहिए। लेकिन दूसरी संख्या के इकाई का अंक 5 है तो पहली संख्या की इकाई का अंक 5 से लेकर 9 तक हो सकता है। पहली संख्या के इकाई के अंक का जो हिस्सा दिख रहा है, उससे यह साफ़ है कि वह 5, 7 या 9 नहीं हो सकता। उसके 6 या 8 होने की ही संभावना है। यानी पहली संख्या 286 या 288 हो सकती है। लड़के ने जिस तरह इकाई के अंकों को जोड़ कर हासिल लगाया है उससे हम यह अंदाज़ भी लगा सकते हैं कि वह बाकी सवाल को भी उसी तरह से और संभवत: सही-सही हल कर लेगा। लड़का एक हाथ से बोर्ड पर लिख रहा है व दूसरा हाथ नीचे व तस्वीर से बाहर है। जिस तरह से हाथ नीचे है, वह उसकी पेंट की जेब में भी हो सकता है और जेब से बाहर भी। उससे हमें यह पता नहीं चलता कि वह उंगलियों की मदद से गिन रहा है या नहीं।
सवालों को हल करने का तरीका
दोनों बच्चे एक ही तरीके – मानक गणनविधि की मदद से सवाल को हल करने की कोशिश कर रहे हैं। इससे यह भी अंदाज़ लगाया जा सकता है कि शिक्षक ने इन्हें इस तरह के सवालों को हल करने का एक ही तरीका सिखाया है और वह भी आधा अधूरा। इस तरीके को आधा अधूरा कहने की वजह आगे साफ़ हो जाएगी।
सवालों की कठिनाई का स्तर
आप यह भी देख सकते हैं लड़के का सरल सवाल दिया गया है व लड़की को कठिन सवाल दिया है। लड़की के सवाल में तीन अंकीय संख्याओं का जोड़फल चार अंकों में मिलेगा यानी उसके हर कदम पर हासिल लेना व उसे जोड़ना पड़ेगा, जबकि लड़के के तीन अंकीय जोड़ के सवाल का जोड़फल तीन अंकों में ही मिलेगा।
अगर आप पारंपरिक तौर पर संक्रिया की अवधारणा सिखाने का क्रम देखें तो वह अक्सर इस तरह से होता है।
- एक अंकीय जोड़
- एक इबारती सवाल
- दो अंकीय बिना हासिल की जोड़
- दो अंकीय हासिल की जोड़
- दो अंकीय इबारती सवाल
- तीन अंकीय बिना हासिल की जोड़
- तीन अंकीय हासिल की जोड़
- तीन अंकीय इबारती सवाल
अगर आप इस क्रम से देखें तो समझ के मामले में, पहले या दूसरे कदम पर खड़ी लड़की से यह उम्मीद की जा रही है कि वह ऊंची छलांग मार कर सीधा सातवें कदम वाले सवाल को हल करे। कोई भी समझदार तंत्र या व्यक्ति ऐसा हरगिज नहीं करेगा। लेकिन हमारे यहां यह आम बात है। कई शिक्षक एक अंकीय जोड़ करने वाले बच्चों को दो, तीन, चार अंकों के बिना हासिल के जोड़ के सवालों का अभ्यास इस विश्वास के साथ करवाते हैं कि वे बच्चों को गणित सिखा रहे हैं और कुछ उन बच्चों को हासिल वाले जोड़ के सवाल हल करवाने का जोख़िम भी उठा लेते हैं।
लड़की की गणितीय क्षमता का स्तर
लड़़की एक अंकीय जोड़ के सवालों को उंगलियों की मदद से करती है। इसका मतलब है कि वह अभी एक अंकीय जोड़ के सवालों को भी ठोस चीजों की मदद से ही हल कर पाती है। यानी वह अभी संक्रियाओं को करने में ठोस चीजों के साथ काम करने के स्तर पर ही है, वह एक अंकीय जोड़ में स्वचालितता के स्तर तक नहीं पहुंच पाई है। यानी कि, 3 में 5 जोड़ो सुनते ही बिना जोड़े जवाब 8 बता पाना और पूछने पर उसे हल करने का तरीका समझा पाना। बेशक वह एक अंकीय जोड़ के सवालों को ठोस चीजों की मदद से कुशलतापूर्वक कर लेती है।

अगर शिक्षा तंत्र व शिक्षक ठीक से काम करें तो बच्चे यह स्तर, यानी एक अंकीय संख्याओं को जोड़ना, कक्षा 1 यानी करीब 6 साल की उम्र में हासिल कर लेते हैं, और एक अंकीय जोड़ के कथनों में स्वचालितता करीब 7 साल की उम्र में हासिल कर लेते हैं। यानी या तो शिक्षा तंत्र व शिक्षक इसे तीन या चार साल में कक्षा 1 के स्तर पर ही रोके हुए हैं या उसे सिखा पाने में नाकाम साबित हो रहे हैं। यह शिक्षण की वह खाई/गड्ढा यानी टीचिंग गैप है, जिसे सरकारें सीखने में खाई/गड्ढा यानी लर्निंग गैप के नाम देकर, इसका जिम्मा बच्चों के सर डाल देती है।
लैंगिक अंतर/असमानता यानी जेंडर गैप
यह तस्वीर सीखने में लैंगिक असमानता की भी झलक देती है। एक ही कक्षा में लड़की अभी एक अंकीय जोड़ के सवाल उंगलियों पर ही कर पा रही है, वहीं लड़का तीन अंकीय हासिल के सवालों को मानक गणनविधि से ठीक से हल कर पा रहा है। बहुत मुमकिन है उस कक्षा में लड़कियों को गणित सीखने के मामले में हतोत्साहित किया जाता रहा हो। क्योंकि अगर कक्षा में गणित सीखने के मामले में सभी बराबर बढ़ावा व ज़रूरतमंदों को सही वक़्त पर ज़रूरी मदद मिले तो लड़के व लड़कियों की गणित की समझ के स्तर में असमानता की संभावनाएं नहीं के बराबर रह जाती हैं। वैसे भी मानक गणनविधि का तरीका लैंगिक असमानता को बढ़ाने वाला है। मानक तरीका कोई भी हो, वह पहले से ही कमज़ोर व पिछड़े समुदायों व तबकों को पीछे धकेलने के ही काम आते हैं।
गणित का शिक्षाशास्त्र
तस्वीर से यह साफ है कि इस कक्षा में गणित की संक्रियाएं सिखाने का एकमात्र तरीका मानक गणनविधि की मदद से उन सवालों को हल करना है। और उसमें भी सवाल व हल किए गए जवाब को पढ़वाने की ज़हमत शिक्षक नहीं उठाते। अगर वे सवाल हल करने से पहले बच्चों से सवाल को पढ़ कर सुनाने के लिए कहते, तो बहुत संभावना है कि लड़की इस सवाल की संख्याओं को तीन अंकीय संख्याओं के जोड़ के सवाल की तरह पढ़ने के बजाय उन तीन अंकीय संख्याओं को तीन अंकीय संख्या की तरह न पढ़ कर उसमें आए एक-एक अंक को पढ़ती और शिक्षक को तुरंत पता चल जाता कि इस लड़की को तीन अंकीय संख्याओं की समझ नहीं है और वे उसे तीन अंकीय संख्याओं को सवाल देने से पहले दो बार सोचते।
हालांकि यह भी मुमकिन है कि वह लड़का भी तीन अंकीय संख्याओं को नहीं पढ़ पाता हो, लेकिन चूंकि उसने सवाल को सही हल किया है तो हम यह अंदाज़ लगा सकते हैं कि उसे सवाल को हल करने कदम ठीक ठीक क्रम से याद हैं और वह उन कदमों को उसी क्रम में लागू करता है। यानी कक्षा में गणनविधि को रटने पर आधारित शिक्षाशास्त्र का इस्तेमाल किया जाता है। जिसमें बच्चों को गणित के सवाल को हल करने के तरीके मानक गणनविधि के कदम बता दिए जाते हैं। और उसके बाद उन्हें उन कदमों का अभ्यास करने के लिए ढेर सारे सवाल दे दिए जाते हैं। जिन्हें बिना समझे बच्चों को हल करना होता है।
तस्वीर से हम यह भी अंदाज़ लगा सकते हैं कि इस कक्षा में जिस तरह से सवाल को पढ़वाया नहीं जाता, उसी तरह से सवालों के हलों का अनुमान भी नहीं लगवाया जाता है। जैसे, 982 व 139 को जोड़ेंगे तो उसका जवाब करीब-करीब कितना होना चाहिए। उसमें बच्चों को किसी संख्या की करीबी दस या करीबी सौ वाली संख्या बनाना सिखाया जाता है। ताकि वे दस या सौ में जोड़ के सवाल के हल का अंदाज़ लगा लें। इस सवाल में, पहली संख्या की करीबी सौ वाली संख्या एक हज़ार होगी व दूसरी संख्या की करीबी सौ वाली संख्या एक सौ होगी। और दोनों का करीबी जोड़ एक हज़ार एक सौ होगा। अगर शिक्षक ने यह काम भी किया होता तो भी उसे यह पता चल जाता कि लड़की को जब तीन अंकीय संख्या ही पढ़ना नहीं आता तो वह तीन अंकीय संख्याओं के जोड़फल का अनुमान कैसे लगाएगी। और लड़के के जवाबों से यह पता लग जाता कि वह भी तीन अंकीय संख्याओं को थोड़ा बहुत समझता है या सिर्फ गणनविधि के रटे हुए कदमों का इस्तेमाल कर रहा है।

इसी तरह से हम देख सकते हैं कि इस कक्षा में गणित सीखने के लिए किसी तरह की सामग्री नज़र नहीं आ रही है। अगर सामग्री होती और बच्चों के हाथों में होती, तो बहुत मुमकिन है कि बच्चे उस सामग्री की मदद से इन सवालों को बोर्ड पर हल करते नज़र आते। उस सामग्री की मदद से संख्याओं के अर्थ को गढ़ते नज़र आते। किसी भी तरह की सामग्री की गैर मौजूदगी से बच्चे संख्या व जोड़फल के अर्थ पर गौर करने के बजाय, सिर्फ अंकों व मानक गणनविधि पर ही ध्यान देते हैं।
तस्वीर में दोनों बच्चे किसी तरह के दृश्यीकरण का इस्तेमाल करते नज़र नहीं आते। बोर्ड पर सवाल से जुड़ा कोई दृश्य नज़र नहीं आता। अगर सवालों में आई संख्या का दृश्यीकरण बोर्ड पर किया गया होता, तो उससे भी बच्चों की समझ के स्तर का अंदाज़ लगाया जा सकता था। हम यह भी कह सकते हैं कि संभवत: शिक्षक न तो किसी तरह की सामग्री का इस्तेमाल करते हैं और ना ही उस सामग्री की मदद से उस अवधारणा का दृश्यीकरण करना बच्चों को सिखाते हैं।
इस तस्वीर के नज़र आने वाले व छुपे हुए कुछ अर्थों व निहितार्थो को, मैंने उजागर करने की कोशिश की है। लेकिन अभी भी इसके कुछ पहलू मेरी निगाह से ओझल रहे हो सकते हैं। आप उनकी तरफ ध्यान दिलाएं।
(लेखक परिचयः रवि कांत शैक्षिक सलाहकार के तौर पर विभिन्न संस्थाओं व शिक्षकों के साथ काम कर रहे हैं। शिक्षण सामग्री, पाठ्यपुस्तकें, प्रशिक्षण संदर्शिकाएँ आदि का निर्माण, शैक्षिक शोध तथा अनुवाद कार्य में सक्रिय हैं। गणित शिक्षण-अधिगम की प्रक्रिया को समझने-समझाने में खास रुचि और शिक्षकों के क्षमतावर्धन में विशेषज्ञता। आपने गणित विषय पर कई मॉड्यूल और पुस्तकों का लेखन किया है।)