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7 – 2 = 5, लेकिन सवाल कहाँ बदल गया?

हम सभी ने कभी न कभी 7 में से 2 ज़रूर घटाया होगा और आसानी से 5 हासिल भी कर ल‍िया होगा। क़रीब-क़रीब सभी बड़ों को घटाव का यह कथन मुंहज़ुबानी याद होगा। इसे हल करने के ल‍िए हमें सोचने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती होगी। हां, बच्‍चों के साथ ख़ुद काम करते वक्‍़त या शिक्षकों के साथ काम करते वक्‍त ज़रूर इस तरह के सवालों को सिखाने के तरीकों पर काम करने की ज़रूरत पड़ती है।

जब तक मैं इसे तीलियों या गुटकों की मदद से सिखाता रहा, तब तक तो कोई मुश्किल पेश न आई। लेकिन जैसे ही मैंने यह तय क‍िया कि मुझे इस तरह के सवालों को अलग-अलग मॉडलों से, अलग-अलग रणनीतियां से सिखाना चाहिए, हलों का दृश्‍यीकरण करना चाह‍िए और उनके बीच आपसी संबंधों का पता लगाना चाह‍िए, तो एक बार उसमें एक ऐसा पेंच फंसा, ज‍िसने मुझे नाकों चने चबवा द‍िए।

किस्‍सा कुछ यूं हुआ

हुआ कुछ यूं कि एक बार, एक प्रशिक्षण में हम एक अंकीय घटाने के सवालों की रणनीतियों पर काम कर रहे थे। घटाने के दो अर्थों/मॉडलों – निकालना या कम करना और तुलना करके अंतर पता करने पर हम काम कर चुके थे। इसमें से पहले को व्‍यावहारिक व दूसरे को औपचारिक मॉडल माना जाता है। सभी प्रतिभागी चीज़ों व चित्रों की मदद से इन दोनों ही तरीकों से घटा कर देख चुके थे।

इसके बाद हमने घटाने की रणनीतियों पर काम करना शुरू क‍िया। हमने उसमें एक रणनीति – उल्‍टी गिनती (count back) को लिया। उंगल‍ि‍यों की मदद से उल्‍टी गिनती की और 7 उंगलियों में से 2 उंगलियों को कम करके नतीजे में 5 तक पहुंच गए। इससे पहले हम संख्‍या-पथ व संख्‍या रेखा की मदद से भी जोड़ने व घटाने पर काम कर चुके थे।

हैरतअंगेज व्‍याख्‍या

फिर एक प्रतिभागी ने तय क‍िया कि उलटी गिनती की इस रणनीति को संख्‍या-पथ पर भी आज़मा कर देखना चाह‍िए। वह संख्‍या-पथ में 7 वाले खाने में खड़े हुए। वहां से उल्‍टी गिनती शुरू की और उल्‍टे चलते हुए 2 तक पहुंचे और बोले कि 7वें खाने से शुरू क‍िया और वहां से 2रे खाने तक पहुंचने में 5 कदम चलना पड़ा। तो जवाब में 5 मिल गया।

अपनी-अपनी व्‍याख्‍याएं

ऐसी व्‍याख्‍या मेरे सामने पहली बार आई थी, मैं भौंचक्‍का सा रह गया। ये कैसे हुआ? मैंने समझाने की कोशिश की कि आप 7 पर खड़े थे, आप 5 कदम उल्‍टे चले तो आप 2 पर पहुंचे, तो आपने असल में 7 में से 5 घटा कर, जवाब में 2 हासिल किया है। यानी आप 7-5=2 वाला सवाल हल कर रहे हैं।

लेकिन प्रतिभागी अपनी व्‍याख्‍या पर अड़े रहे। मैंने एक और कोशिश की कि आप 7 पर खड़े हैं, आपको 2 तक पहुंचना है, आपको नहीं पता कि वहां पहुंचने में आपको कितने कदम चलने पड़ेंगे। यानी आप कितने उल्‍टे कदम चल कर 2 तक पहुंचेंगे, यह अज्ञात है। तो इसका समीकरण या कथन कुछ ऐसा बनेगा,

 7 – कदमों की अज्ञात संख्‍या = 2,

यानी मैंने फिर समझाने की कोशिश की, कि उन्‍होंने हल करने के दौरान सवाल ही बदल दिया है। उनका कहना था कि उनके तरीके से भी हम सही जवाब तक पहुंच रहे हैं, तो उनका तरीका ग़लत कैसे हो गया? और प्रशिक्षक का बताया तरीका सही कैसे? प्रशिक्षक की ही बात को सही क्‍यों माना जाए। क्‍या उनकी बात में कोई दम नहीं? उन्‍होंने भी अपनी व्‍याख्‍या के आधार पर समीकरण बना द‍िया।

7 – 2 =  कदमों की अज्ञात संख्‍या

मैंने एक तरह की व्‍याख्‍या से एक तरह का समीकरण बनाया तो उन्‍होंने दूसरी तरह की व्‍याख्‍या से दूसरे तरह का समीकरण बना द‍िया। उनकी व्‍याख्‍या के ह‍िसाब से उनका समीकरण सही भी लग रहा था। नतीजन, वे भी अपनी व्‍याख्‍या से टस से मस न हुए। हम दोनों अपनी-अपनी बात पर पूरी शिद्दत के साथ अड़े रहे और पूरी कोशिशों के बावजूद, एक दूसरे को अपनी बात समझाने में नाकाम रहे।

न समझ व समझा पाने के कारण

यह सवाल मेरे मन में लगातार बना रहा कि मैं उस प्रतिभागी को अपनी बात क्‍यों नहीं समझा पाया। बाद में सोचने पर लगा कि इसके दो बड़े कारण थे।

समाजशास्‍त्रीय कारण

एक कारण तो समाजशास्‍त्रीय था। प्रतिभागी उस कार्यकर्ता-शिक्षक समूह के समन्‍वयक थे। प्रशिक्षण में अपने कार्यकर्ताओं के साथ बराबरी से भागीदारी कर रहे थे, जो क‍ि ज्‍़यादातर समन्‍वयक इन दिनों नहीं करते हैं। वे या तो अपने-अपने कंप्‍यूटरों को खोल कर काम में डूबे रहने का दिखावा करते हैं या व्‍यवस्‍था व प्रशासनिक कामों में खुद को उलझाए रखते रहते हैं। उनके समूह के पिछले एक-दो प्रस्‍तुतीकरणों को समय की कमी की वजह से, उन पर बिना विस्‍तार से बात किए, जल्‍दबाज़ी मैं उन्‍हें नकार चुका था। संभवत: उसी से पहुंची ठेस ने अनजाने में ही, उन्‍हें अपनी बात पर अड़े रहने के लिए उकसाया हो। इस बात को उस वक्‍़त न पहचान पाना भी एक तरह से, मेरी ही नाकामी का ही सबूत था।

अकादमिक कारण

लेकिन एक दूसरी बड़ी वज़ह भी थी जो कि अकादमिक थी। मेरे उदाहरण एक तरह की व्‍याख्‍या के ह‍िसाब से सही थे लेकिन प्रतिभागी की व्‍याख्‍या की सीमाएं उससे उजागर नहीं हो पा रही थी। नतीजे में हम दोनों की व्‍याख्‍याएं रेल की पटरी की तरह समानांतर चल रही थी। वे एक दूसरे के साथ मुठभेड़ नहीं कर पा रही थीं।

गणित का एक न‍ियम है कि आपकी व्‍याख्‍या अगर एक सवाल के लिए सही है तो उसी तरह के सभी सवालों के लिए भी सही होनी चाहिए तभी उसे माना जाएगा।

पहली संख्‍या में से बड़ी संख्‍या को घटा कर देखें!!

उनकी व्‍याख्‍या थी,

7 – 2 = ___  मतलब 7 से शुरू करके 2 तक पहुंचना है। इसमें हमें 5 कदम उल्‍टे चलना पड़ेगा और जवाब 5 मिलेगा। यह सही जवाब है। इससे घटाने का सही कथन बन जाता है।

7 – 2 = 5

अगर कोई दूसरा सवाल हल करना होता तो वह इस व्‍याख्‍या से कैसे होता, जैसे,

7 – 9 = ___ अब उसी व्‍याख्‍या से हम समझें तो हमें 7 से शुरू करना है और उल्‍टे कदम चलना है। लेकिन हम उल्‍टे कदम चल कर तो 9 तक पहुंच ही नहीं सकते। उस तरफ तो में 9 मिलता ही नहीं है, हां -9 ज़रूर मिल सकता है, और आप जानते हैं कि प्रतिभागी का लक्ष्‍य 9 तक पहुंचना था।

इससे साफ है कि प्रतिभागी की व्‍याख्‍या किसी संख्‍या में से उससे छोटी संख्‍या घटाने के ल‍िए तो ठीक है लेकिन किसी एक संख्‍या में से, उससे बड़ी संख्‍या को घटाने के लिए काम ही नहीं कर पा रही है।

संख्‍या रेखा पर घटाने की एक दूसरी व्‍याख्‍या

लेकिन अगर हम 2 तक पहुंचने की जगह 2 कम करने या 2 कदम उल्‍टे चलने की व्‍याख्‍या लेते हैं तो 7 में से 9 घटाने वक्‍त हम 7 से 9 कम करते या 9 कदम उल्‍टे चलते तो – 2 पहुंच जाते, जो कि सही जवाब होता। और सही कथन इस तरह बनता,

7 – 9 = (-2)

क्‍या प्रतिभागी की व्‍याख्‍या से संख्‍या रेखा पर जोड़ का सवाल समझा सकते हैं?

उनकी व्‍याख्‍या की सीमाओं को उजागर करने का एक तरीका यह भी हो सकता था कि हम इस बात की जांच करते कि क्‍या इस व्‍याख्‍या से जोड़ के सवालों के हलों को समझा जा सकता है। जैसे, अगर 7 – 2 वाले सवाल में हमें 7 से शुरू करके 2 तक जाना है तो 7 + 2  वाले सवाल में हम क्‍या करेंगे, हम 7 से शुरू करके कहां तक जाएंगे।

हम जानते हैं कि जोड़, घटाव की उलट प्रक्रिया है तो जोड़ने के लिए हम उल्‍टे चलने के बजाय आगे बढ़ते हैं, लेकिन हमें आगे चलने पर अनंत तक चलते जाएं, रास्‍ते में 2 मिलने वाला नहीं है। यानी इस तरीके से तो सवाल हल ही नहीं हो पाएगा। और अगर उल्टे चल कर 2 तक गए, तो हम बिना कहे ही जोड़ के सवाल को घटाने के सवाल में बदल देंगे। तो हम देख सकते हैं कि प्रतिभागी की व्‍याख्‍या से हम जोड़ के किसी भी सवाल को संख्‍या रेखा या संख्‍या पथ पर हल नहीं कर पाएंगे।

अगर मैं अपने पास पहले से मौजूद व्‍याख्‍याओं पर ही ज़ोर देने के बजाय उनकी व्‍याख्‍या से जुडे़ इस सवालों को उस वक्‍़त समूह व प्रतिभागी के सामने रख पाता तो संभवत: वे अपनी व्‍याख्‍या में छुपी सीमाओं पर सोचने के लिए मजबूर होते। हो सकता है कि वे कोई दूसरी नई व्‍याख्‍या लाकर मुझे फिर से सोचने पर मजबूर कर देते। तब तक आप भी अपनी कोई अलग व्‍याख्‍या खोज कर बता सकते हैं।

(लेखक परिचयः रविकांत शैक्षिक सलाहकार के तौर पर विभिन्न संस्थाओं व शिक्षकों के साथ काम कर रहे हैं। शिक्षण सामग्री, पाठ्यपुस्तकें, प्रशिक्षण संदर्शिकाएँ आदि का निर्माण, शैक्षिक शोध तथा अनुवाद कार्य में सक्रिय हैं। गणित शिक्षण-अधिगम की प्रक्रिया को समझने-समझाने में खास रुचि और शिक्षकों के क्षमतावर्धन में विशेषज्ञता। आपने गणित विषय पर कई मॉड्यूल और पुस्तकों का लेखन किया है।)

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