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जोड़-घटाव के सवाल: संक्रियाओं के निशान को समझने में चूक या समझ की एक झलक

जोड़ के सवालों के संग्रह की वृजेश द्वारा बनाई गई सवालों की सूची में एक सवाल ऐसा हैं जिनमें बच्‍चे सवाल के साथ दिए निशान के अनुसार संक्रिया न करके दूसरी ही संक्रिया कर देते हैं। नीचे दिए गए सवाल में बच्‍चे ने घटाव के निशान को जोड़ का निशान समझ कर जोड़ कर दिया है।

पारंपरिक तौर पर दिए जाने वाले सुझाव सवाल के नीचे दिए गए हैं। सुझाव इस उम्‍मीद पर कायम हैं क‍ि बार-बार कहने से कभी न कभी बच्‍चों को निशानों के नाम व अर्थ सही से याद हो जाएंगे और वो आगे से ऐसी ग़लतियां करना बंद कर देंगे। दो-चार बार के बाद इन सुझावों को देते वक्‍़त शिक्षक का धैर्य जवाब देने लग जाता है और अक्‍सर वे बच्‍चों को निशानों के अर्थ को याद न रख पाने के लिए फटकारने/धमकाने लगते हैं। आखिर कब तक कोई शिक्षक किसी टेपरिकार्डर की तरह एक ही बात को बार-बार दोहराते रहेंगे। ग्‍याहरवें सवाल का सुझाव तो साफ़ साफ़ रटवाने का काम सुझा रहा है। तो हमारे सामने सवाल है कि ऐसे वक्‍़त में हम क्‍या करें?

पढ़ें – लेख- बच्‍चों के हलों को ‘ग़लती’ मानने की ग़लती 

बच्‍चों से पूछें व उनका तर्क व तरीका सुनें

अगर आप बच्‍चों के सोचने के तरीके को जानना समझना ज़रूरी समझते हैं तो जब भी बच्‍चे इस तरह के हलों को अपनी कॉपी में करके हमारे सामने लाएं, तब तो बजाय अपना अनुमान उन पर थोपने के उनसे चंद सवाल पूछें और धीरज के साथ बिना किसी टोका टाकी के उनकी बातें सुनें। जैसे,

  1. तुमने किस सवाल को हल क‍िया है, उसे पढ़ कर बताओ।
  2. उस सवाल को कैसे हल किया, अपना तरीका बताओ।

आम तौर पर हमारे यहां एक सरीखे ढेर सारे सवाल बच्‍चों के सामने बोर्ड पर या उनकी अभ्‍यास पुस्तिकाओं में लिखे होते हैं। शिक्षक एक आम सा निर्देश देते हैं कि बोर्ड पर लिखे सवाल हल करो,या किताब में दिए गए अभ्‍यास के सवाल हल करो। और बच्‍चे भी बिना पूरे सवालों को पढ़े, उन्‍हें हल करने में जुट जाते हैं।

पढ़ें- जोड़ के सवाल: ‘गलतियों के पैटर्न’ का प्रभावी शिक्षण में कैसे इस्तेमाल करें?

ख़ुश होइए, बच्‍चे आपकी उम्‍मीद से ज्‍़यादा काब‍िल हैं

अगर बच्‍चे सवालों को पढ़ते वक्‍़त, घटाव के सवाल को जोड़ के सवाल की तरह पढ़ते हैं और उन्‍हें ठीक से हल करके बता देते हैं तो आप ख़ुश होइये कि आपके बच्‍चे आपकी उम्‍मीद से ज्‍़यादा जानते हैं। आप उसे बिना हासि‍ल का घटाव करवाना चाहते हैं, लेकिन वह हासिल वाले जोड़ के सवालों को सही हल कर ले जा रहा है।

आपके करने के ल‍िए क्‍या बचा?

अब आपके लिए करने लायक काम इतना ही बचता है कि कोई एक अंकीय सवाल लें। उसे दो बार ल‍िखें, एक बार जोड़ के निशान के साथ व दूसरी बार घटाव के निशान के साथ। जैसे, 5 – 3 और 5 + 3, और बच्‍चे से बोलें कि उन दोनों सवालों को हल करे। फिर बच्‍चों से पूछें क‍ि दोनों सवालों में क्‍या समानता व अंतर है। और उसकी वज़ह क्‍या है। आपके पास यह एक मौका है निशान के नाम को अर्थ के साथ सिखाने का। बच्‍चे से बात करें कि घटाव व जोड़ के निशान में क्‍या अंतर होता है। और किसी निशान के साथ कौनसा काम करना चाहिए। या कौनसी संक्रिया करें तब कौनसा न‍िशान लगाना या होना चाह‍िए।

दूसरा काम यह करें कि बच्‍चों से कहें कि उन्‍होंने दिए गए सवालों के साथ जो संक्रिया इस्‍तेमाल की है उसी का निशान लगा दे। सवालों के निशान बदलवाने से बच्‍चा भी ख़ुश होगा कि उसने सवाल तो सही किया है, बस निशान को समझने में गड़बड़ी कर दी थी। वैसे भी आपका असली मकसद तो बच्‍चों को संक्रिया सिखाना ही है ना, संक्रिया सही करना ज्‍़यादा महत्‍त्‍वपूर्ण है या उस का सही निशान लगाना। आप किस बच्‍चे की समझ को बेहतर कहेंगे, जो निशान सही पढ़ कर संक्रिया ग़लत करता है, उसे या फिर जो संक्रिया सही करता है लेकिन निशान को ग़लत पढ़ता है।

अंत में आप चाहें तो बच्‍चे को निशानों की पहचान पक्‍की करवाने के बाद उन्‍हें वही सवाल हल करने को दे दें, जो उन्‍होंने निशानों को बदलकर कर दिए थे। बहुत मुमकिन है कि वह बड़ी आसानी से वह घटाव को सही करके ले आए। आखिर आप भी तो यही चाहते हैं कि बच्‍चे आपके दिए सवाल भी हल कर दें।

(लेखक परिचयः रविकांत शैक्षिक सलाहकार के तौर पर विभिन्न संस्थाओं व शिक्षकों के साथ काम कर रहे हैं। शिक्षण सामग्री, पाठ्यपुस्तकें, प्रशिक्षण संदर्शिकाएँ आदि का निर्माण, शैक्षिक शोध तथा अनुवाद कार्य में सक्रिय हैं। गणित शिक्षण-अधिगम की प्रक्रिया को समझने-समझाने में खास रुचि और शिक्षकों के क्षमतावर्धन में विशेषज्ञता। आपने गणित विषय पर कई मॉड्यूल और पुस्तकों का लेखन किया है।)

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