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एक कक्षा-एक पुस्तकालय: बनती ईंटों के बीच उगते सपने

  बच्चों की किताबों के साथ दोस्ती में कहानियों के मुखर वाचन और रोल प्ले की तैयारी ने बहुत मदद की।

 
बच्‍चों को पढ़ना-लिखना सिखाने की जगह पर ढेर सारी व अलग-अलग तरह की किताबें होना उतना ही ज़रूरी है, जि‍तना मिट्टी के बरतन बनाना सिखाने के लिए ढेर सारी मिट्टी, पानी और खिलौने या चीजों को बनाने के औज़ार और ढेर सारा बड़ों का भरोसा, कि बच्चे कर-करके व ग़लतियां कर-करके सीख सकते हैं। 
 
बच्‍चों को कई तरह की किताबों को इस्‍तेमाल करने के उससे भी कई गुना ज्‍़यादा मौके मिलने चाहिए, ज‍ितने उन्‍हें मिट्टी की चीजों को बनाने के लिए मिट्टी, पानी और औज़ारों के साथ खेलने के लिए मिलते हैं। यही सोच कर हर शिक्षा केन्‍द्र की एकमात्र कक्षा में एक छोटा सा पुस्‍तकालय बनाया गया। जिसमें कई तरह की करीब डेढ़ सौ किताबें थीं, छोटी, बड़ी और बहुत बड़ी (बिग बुक्स), उसी सेट में कविता पोस्‍टर व कार्ड आदि‍ भी थे। एक जगह पर दो शिक्षा केन्‍द्र चलते थे, वहां पर दोनों कक्षाओं में अलग-अलग पुस्‍तकालय बनाया गया। किताबों के इसी सेट पर प्रशिक्षण में भी काम क‍िया गया था। पुस्‍तकालय की किताबों के साथ काम के कई मकसद थे। उनमें से कुछ इस तरह से हैं :
• पहला, बच्‍चों की पढ़ने में रूचि पैदा करना। यानी पढ़ने का चस्‍का लगाना। 
• दूसरा, कक्षा में लिखित सामग्री से भरपूर (यानी प्रिंट रिच) वातावरण बनाना ताकि बच्‍चे सार्थक संदर्भों में लिपि से परिचित हो सकें। 
• तीसरा, बच्‍चों को बहुसांस्‍कृतिक साहित्‍य उपलब्‍ध करवाना। 
• चौथा, भाषा को पढ़ने लिखने में मदद करना, आदि। 
 

ईंट के बीच सपने को साकार करने वाली परिस्थिति का एक जीवंत दृश्य

 
प्रशि‍क्षणों में किए गए काम और बनाई गई योजनाएं, कक्षाओं में अपने आप जमीन पर नहीं उतर जाते और ना ही प्रशिक्षकों की मंशाएं अपने आप मूर्त हो जाती हैं। इसके लिए ज़रूरी है कि प्रशिक्षण के बाद भी उन कक्षाओं और उनके शिक्षकों से लगातार जुड़े रहा जाए। एक जगह पर चार-पांच महीनों के दौरान पुस्‍तकालय की इन किताबों के साथ किए गए काम को हम शिक्षकों की नज़र से कुछ इस तरह से देख सकते हैं।  शुरुआत में सभी शिक्षकों ने केन्‍द्र पर आई किताबों को कीमती सामान की तरह बक्‍से में बंद करके रख दिया गया। कइयों को यह डर था कि बच्‍चे किताबें फाड़ देंगे या बच्‍चों के इस्‍तेमाल से किताबें फट जाएंगी या ख़राब हो जाएंगी तो कुछ को यह डर था कि बच्‍चे किताबें ले जाएंगे और शायद वापिस ही न लाएं। इस डर से शुरूआत में कुछ शिक्षकों ने तो कक्षा में भी किताबें बच्‍चों को नहीं दीं। ज्‍़यादातर शिक्षक उसमें से एक किताब निकालते, उसे पढ़ कर सुनाते, उस पर बात करते, उसके चित्रों पर बात करते, उस पर काम बताते और फिर से उसे बक्‍से में बंद कर देते।
 

जब किताबें हमारे केन्‍द्र पर आईं . . . . .

’मैं उस वक्‍त बच्‍चों को पढ़ा रहा था। संस्‍था की पिकअप आकर रूकी। बच्‍चे बोले सर फल आ गए। मैंने व बच्‍चों ने मिलकर  गाड़ी से सामान उतारा ज‍िसमें खिलौने व किताबें थीं। गाड़ी जाने के बाद बच्‍चों ने बहुत सारे सवाल शुरू कर दि‍ए। ‘’सर, इसमें क्‍या  है?, यह हमारे लिए है क्‍या? इसमें क्‍या-क्‍या है?’’ मैंने कहा इन्‍हें अंदर कमरे में रख दो। बाद में देखेंगे। बच्‍चों ने कहा कि सर इसको खोलो व दिखाओ कि इसमें क्‍या है? फिर मैंने जैसे ही किताबों का डिब्‍बा खोला तो उसमें से कुछ बड़ी, कुछ छोटी, कुछ बिल्‍कुल छोटी और अधिकतर सुंदर व आकर्षक चित्रों वाली किताबें निकलीं। मैंने बच्‍चों से अलग-अलग साइज की किताबों को जमाने के लिए कहा। बच्‍चे मेरी बात की परवाह न करते हुए किताबों पर झपटने लगे। उनमें से किसी को भी किताब पढ़ना नहीं आता था, लेकिन वे चित्रों को ही देख कर ख़ुश हो रहे थे। सभी बच्‍चों को अलग ही ख़ुशी हो रही थी। कुछ आपस में लड़ रहे थे, कह रहे थे कि मैं देखूंगा, मैं देखूंगा। तो कुछ पूछ रहे थे कि हमें कितनी-कितनी किताबें दोगे? फिर हमने सभी किताबों को समेट कर बक्‍से में रख दिया।‘’  – शिक्षक/शिक्षिका
 

 जो बच्चे अभी पढ़ना सीख रहे थे उन्होंने चित्रों को देखने और उसके ऊपर बात करने में ज्यादा रुचि दिखाई।

 
केन्‍द्र दिसंबर की शुरूआत में आरंभ हो चुके थे और किताबें उसी माह के अंत तक केन्‍द्रों पर पहुंच चुकी थी। जनवरी माह के दूसरे पखवाड़े में जब केन्‍द्रों का अवलोकन किया तो किसी भी केन्‍द्र पर किताबें कक्षा में रखी हुई नज़र नहीं आईं। इस पर मासिक प्रशिक्षण बैठक में सभी के साथ किताबों को कक्षा में टांगने व रखने व उसके इस्‍तेमाल करने के तरीकों पर बातचीत की गई। यह तय किया गया कि जिन केन्‍द्रों पर दीवारें हैं, वहां पर जैसे हम डोरी पर कपड़े सुखाते हैं वैसे ही सभी या करीब आधी किताबें दीवारों पर टांगी जाएं। उनको कुछ वक्‍़त बाद बदला जाए। जहां दीवारे नहीं हैं वहां बांस या लकड़ी गाड़ कर व उसके बीच डोरी बांध कर किताबों को टांगा जाए।
 

जब हमने किताबें दीवारों पर टांगी…..

किताबों को दीवारों पर टांगने या दीवारों से सटा कर रखने या खानों में रखने से कक्षा के भीतर का माहौल ही बदल गया। अब बच्‍चों के सामने हमेशा कम से कम 50 – 60 किताबें रहती थीं। कुछ केन्‍द्रों में बच्‍चे, जब भी उनका मन होता कोई किताब लेने व खुद देखने लगते या अपने किसी साथी के साथ किताब पर बात करने लगते। तो पढ़ नहीं पाते वे चित्रों को देखकर कुछ बतियाते। जो पढ़ पाते वे किताबों को खोल कर पढ़ने लगते। कई केन्‍द्रों में बच्‍चे भोजनावकाश में भी किताबों को उलटते पुलटते व उन्‍हें देखने व पढ़ने की कोशिश करते थे। कहीं-कहीं बच्‍चे केन्‍द्र की शुरुआत में तो कहीं केन्‍द्र बंद होने के बाद भी किताबों को पढ़ने की कोशिश करते थे।  
 
‘’जब मैंने बच्‍चों से बोला कि किताबों को दीवार पर टांग दो। तब बच्‍चे उत्‍साहित होकर सभी किताबें उठा कर कहने लगे, तू ये वाली लगा, मैं ये वाली लगाता हूं। कभी मुझसे कहते कि मैम ये वाली किताब कल लगाएंगे। कुछ किताबों को द‍िखा कर बोलते, मैम ये वाली किताब आज पढ़ाना। तब मैंने उन्‍हें बताया कि आप पुस्‍तकालय के कालांश में कोई भी अपने मन की किताब लेकर पढ़ सकते हो। बच्‍चे किताबों को टांगने लगे‘’।  – शिक्षक/शिक्षिका
 

केंद्र पर सभी बच्चों को खुद से अपनी पसंद की किताबें चुनने और पढ़ने का मौका दिया गया।

 
‘’शुरु में तो हमने सारी किताबें बच्‍चों के सामने जमीन पर रख दीं। बच्‍चों को गोले में बिठाया। सभी बच्‍चे आपस में बात करने लगे कि मैं तो यह वाली किताब लूंगा या वह वाली किताब लूंगा। फिर सभी अपनी-अपनी पसंद की किताब ली, जिसको पढ़ना आता था वे पढ़ने लगे व जिसको पढ़ना नहीं आता वे चित्र देखने लगे। वे आपस में बात करते व पूछते कि ये क्‍या लिखा है, ये किसकी किताब है, ये किसका चित्र है, ऐसे करके किताबें पढ़ते। जिनको समझ में नहीं आता वे मुझसे पूछते।……यह काम मैंने 4-5 दिन किया।
 
उसके बाद मैंने कील व धागे की मदद से सारी किताबें दीवार पर लगा दीं। किताबों को दीवार पर लगाने पर सभी बच्‍चे बहुत ख़ुश हुए और बोलने लगे इससे तो हमारी स्‍कूल बहुत सुंदर लग रही है। सभी बच्‍चे स्‍कूल आते ही सारी किताबें देखने लगे और कहने लगे, मैम जब तक दूसरे बच्‍चे नहीं आते तब तक हम किताबें पढ़ लें। सभी बच्‍चे किताबों को बहुत ध्‍यान रखते थे अगर कोई किताब में पेंसिल से कुछ करते तो उनको बोलते, ऐसे मत करो। किताब ख़राब हो जाएगी। अगर कोई नहीं मानता तो वे आकर मुझे बताते। किताबों की वजह से कुछ बच्‍चे स्‍कूल जल्‍दी आते और बोलते हमें वो वाली किताब पढ़नी है, उसमें यह हुआ था, आदि‘’। –  शिक्षक/शिक्षिका
 
आरंभिक प्रशिक्षण तथा मासिक प्रशिक्षण बैठकों में लगातार किताबों पर काम करने के तरीकों पर काम भी किया गया व बातचीत भी की गई थी। इन कामों को करवाने की ज़रूरत भी रेखांकित की गई थी। कक्षा/केन्‍द्र अवलोकन करते वक्‍़त, उनमें से कई कामों को प्रदर्शन करके भी दिखाया गया था। पुस्‍तकालय की किताबों पर काम करने के लिए चार-पांच काम तय किए गए थे।
• किताब से कहानी सुनाना व मुखर वाचन 
• किताब के चित्रों पर बातचीत करना 
• किताब पर बातचीत व प्रस्‍तुतीकरण करना 
• किताब की कहानी पर नाटक करना 
• किताब की कहानी पर चित्र बनाना 
 
कहानी सुनाने व चित्र बनाने के काम केन्‍द्रों पर जनवरी से ही शुरु हो गए। किताबों के प्रस्तुतीकरण व नाटक करने की शुरुआत करने में काफी वक्‍़त लगा।  किताब की मदद से कहानी सुनाने व मुखर वाचन पर प्रशिक्षण में काम किया गया था। पराग इनीशिएटिव के एक वीडियो की मदद से कहानी सुनाने के तरीके को देखा गया था। उसमें शिक्षण के कदमों को पहचाना गया था। उस पर बातचीत करके उसे समझा भी गया था। इसके बाद शिक्षकों ने भी, प्रशिक्षण में ही, किताबों की मदद से कहानी सुनाने व मुखर वाचन का अभ्‍यास किया था।
 

जब मैंने बच्चों को किताब से कहानी पढ़कर सुनाई…..

‘’पहले मैंने बच्‍चों से पूछा कि आज हमें कौनसी किताब पढ़नी चाहिए। कई बच्‍चे अलग-अलग तरह की किताबें निकाल कर लाने लगे और बोलने लगे कि हमें ये किताब पढ़ाओ। ज्‍़यादा बच्‍चों के हाथ में बड़ी किताब थी। तो मैंने सबसे पहले बड़ी किताब को पढ़ाना शुरू किया। बच्‍चों के साथ किताब के कवर पर बातचीत की, तो बच्‍चों ने बड़े उत्‍साह से कवर के बारे में बताया। और किताब पर बने चित्रों को देखकर उनके बारे में बताया।…… मैंने बच्‍चों से पूछा कि तुम्‍हें इसमें क्‍या द‍िख रहा है, इसमें कौन क्‍या कर रहा है, आगे क्‍या होगा। बच्‍चों ने चित्रों के बारे में बताया और अनुमान भी लगाया कि आगे क्‍या होगा?…. मैं कहानी सुनाने के बाद बच्‍चों से पूछती हूं कि क्‍या तुम्‍हारे साथ भी ऐसे हुआ था, ऐसी कोई घटना हो तो सुनाओ। बच्‍चे उत्‍साह से हमें अपनी कई सारी बातें बताते हैं।‘’ – शिक्षि‍का/शिक्षक
 
 
किताबों की कहानियों पर नाटक करने को लेकर शिक्षक प्रशिक्षण में बातचीत भी की गई थी और शिक्षकों ने नाटक भी किए थे। लेकिन बच्‍चों के साथ नाटक करवाने को लेकर शिक्षकों में काफी झिझक थी। बड़े व्‍यक्ति तो किताब को पढ़ कर आसानी से उस पर नाटक कर लेते हैं लेकिन बच्‍चों के साथ नाटक करने के तरीके को लेकर ज्‍़यादातर शिक्षकों के मन में असमंजस था। संभवत: इसी वजह से काफी वक़्त(शुरूआती दो महीनों) तक कक्षाओं के किताबों की कहानियों पर नाटक शुरू ही नहीं हो पाए। इस समस्‍या को भांप कर कक्षा अवलोकन के समय दो तीन केन्‍द्रों पर ‘’मैं भी’’ और ‘’बिल्‍ली के बच्‍चे’’ की बड़ी किताब से बच्‍चों को कहानी सुनाई गई। उस कहानी की प्रमुख घटनाओं को बच्‍चों के साथ बातचीत में पहचाना गया। इसके बाद बच्‍चों के समूह बनाकर हरेक समूह से सभी घटनाओं को करके दिखाने को कहा गया। फिर कई शिक्षकों ने कुछ किताबों की कहानियों पर बच्‍चों से नाटक करवाए, जिनमें ये दोनों किताबें भी शामिल थीं।
 

जब मैंने कहानी पर नाटक करवाया…..

‘’जब बच्‍चों को कहानी याद हो जाती तब मैं उस पर नाटक करवाती। सबसे पहले मैंने बच्‍चों का ग्रुप बनाया, उनको बताया कि किसके ऊपर नाटक करना है। जैसे, ‘’ब‍िल्‍ली के बच्‍चे’’, जिसमें तीन बिल्‍ली के बच्‍चे बने, एक मेंढक बना, एक तालाब, एक मछली, एक आटे का ड्रम, आदि। सभी बच्‍चों ने पात्रों के हि‍साब से नाटक प्रस्‍तुत किया। बच्‍चों ने बहुत ख़ुशी से नाटक क‍िया। किसी ने ग़लत किया तो दूसरे बच्‍चों ने बताया कि ये ऐसे नहीं ऐसे होगा। जिसने जो नाटक किया वो बोल कर बता रहे थे, जैसे, चूहे के पीछे बिल्‍ली गई तो वो आटे के ड्रम में चला गया। वो तो सफेद हो गया। ऐसे सारे बच्‍चे बोल रहे थे। ऐसे स्‍कूल के अंदर शोर का माहौल था।‘’
 

कहानी पर आधारित नाटक के रोल प्ले में सभी बच्चों की सक्रिय भागीदारी रही।

 
‘’मैंने नाटक का कालांश सप्‍ताह में बुधवार व शनिवार को रखा था। अब बच्‍चे नाटक वाले दिन का बेसब्री से इंतज़ार करते। बच्चे मुझे पहले से ही मुझे बता देते कि मैडम जी हम अगली बार इस किताब पर नाटक करेंगे। सभी बच्‍चों ने अपना अपना एक समूह बना ल‍िया और वे समूह के अनुसार अपनी पसंद की किताब चुनते थे। जैसे, पमतू का स्‍वेटर, हाथी की हिचकी, किसने खाए मालपुए। एक माह में, मैं 8 बार किताबों की कहानी पर आधारित नाटक करवाती थी। दो माह में बच्‍चे खुद से नाटक करने लग गए। अंतिम दिनों में मैंने ‘’ऊंट का फूल’’ कहानी पर नाटक करवाया। तब सभी बच्‍चों ने बड़े मज़े से विभिन्‍न प्रकार के फूलों का पात्र निभाया और फूलों के बारे में बताया और कहानी को आगे भी बढ़ाया। इस कहानी पर होने वाली चर्चा के अंत में जब मैंने पूछा कि तुम सब किसके फूल हो तो उन्‍होंने बताया कि हम इंसान के फूल हैं।‘’ – शिक्षक/शिक्षि‍का 

 

जब बच्चों ने किताबें घर ले जाने के लिए मांगी……

शुरुआत में जो डर शिक्षकों के मन में बच्‍चों को कक्षा में क‍िताबें देने के मामले में हावी था, वही डर तब फिर उभर आया जब बच्‍चे किताबों को घर ले जाने के लिए मांगने लगे। ज्‍़यादातर शिक्षक अपने इस डर पर काबू नहीं पा सके और उन्‍होंने बच्‍चों को अपने घर पर ले जाने के लिए क‍िताबें नहीं दी। लेकिन ऐसे भी शिक्षक थे जिन्‍होंने बच्‍चों को किताबें ले जाने की इजाज़त दी। जब बच्‍चों ने किताब अपने घर ले जाने के ल‍िए मांगी। जब बच्‍चों को कि‍ताबों में रूचि बढ़ने लगी तब बच्‍चों ने किताब घर ले जाने को कहा तो मैंने किताबें देने से मना कर दिया। क्‍योंकि मुझे आशंका थी कि वे किताबें घर पर ही रख देंगे या वापिस नहीं लाएंगे या फाड़ देंगे। इसलिए मैंने किताबें घर पर ले जाने के लिए नहीं दी।
 

                                     बच्चों को कहानी पर अपने विचारों को लिखने का भी मौका दिया गया।

 
‘’जब मेरे सेंटर पर बच्‍चे किताब को घर पर ले गए या मांगी की तब मैंने जो बच्‍चे हिंदी जानते थे उनको देने में कोई संकोच नहीं किया, क्‍योंकि उन्‍होंने कहा कि हम सारांश लिखेंगे, प्रश्‍न उत्‍तर करेंगे। परंतु जो बच्‍चे नहीं पढ़ पाते थे उनको देने में थोड़ा संकोच किया और मना कर दिया। बच्‍चों को थोड़ा बुरा लगा, वे घर चले गए। मुझे भी अफसोस हुआ कि बच्‍चे पढ़ नहीं पाते तो क्‍या हुआ वे चित्र देखेंगे, सोचेंगे, चित्र बनाएंगे। अगले दिन मैंने बच्‍चों को किताबें दे दी और कहा कि किताबों को फाड़ें नहीं और अगले दिन वापिस लाएं। सभी बच्‍चे ऐसा ही करते थे और कुछ बच्‍चे नहीं भी ले जाते थे वे भी दूसरों को देख कर किताब ले जाने लग गए। ऐसे में कुछ किताबें खो भी गईं।‘’ (शिक्षि‍का/शिक्षक)
 
इस अनुभव के आधार पर हम यह उम्‍मीद कर सकते हैं कि इनमें से कुछ शिक्षक अगर अगली बार फिर बच्‍चों के साथ काम करें तो संभवत: वे पहले ही दिन से बच्‍चों के हाथ में किताबें दें, पहले ही सप्‍ताह से किताबों पर नाटक करवाएं, किताबों का प्रस्‍तुतीकरण करवाएं और बच्‍चों को किताबें अपने घरों में ले जाने की अनुमति दें। अगली बार वे संभवत: वे खुद भी किताबों से दोस्‍ती कर पाएं और क‍िताबों पर काम के नए तरीके आजमाने का हौसला भी खुद में पाएं। 
 
(लेखक परिचयः रवि कांत शैक्षिक सलाहकार के तौर पर विभिन्न संस्थाओं व शिक्षकों के साथ काम कर रहे हैं। शिक्षण सामग्री, पाठ्यपुस्तकें, प्रशिक्षण संदर्शिकाएं आदि का निर्माण, शैक्षिक शोध तथा अनुवाद कार्य में सक्रिय हैं। गणित शिक्षण-अधिगम की प्रक्रिया को समझने-समझाने में खास रुचि और शिक्षकों के क्षमतावर्धन में विशेषज्ञता। आपने गणित विषय पर कई मॉड्यूल और पुस्तकों का लेखन किया है, जिसका संदर्भ विभिन्न संस्थाओं द्वारा बनाए गए मॉड्यूल में प्रमुखता से आता है।)
 
(नोट-यह आलेख सेंटर फॉर लेबर रिसर्च एंड एक्‍शन उर्फ सीएलआर द्वारा अजमेर,भीलवाड़ा व जयपुर में ईंट भट्टों पर संचालित शिक्षा केन्‍द्रों के साथ किए गए काम के अनुभव पर आधारित है। उपरोक्‍त शिक्षा केन्‍द्र छत्‍तीसगढ़, बिहार, उत्‍तरप्रदेश, झारखंड आदि राज्‍यों से राजस्‍थान के ईंट भट्टों पर काम करने के लिए आने वाले अपने परिवारों के साथ आने वाले बच्‍चों के लिए चलाए जाते हैं, जो बहुत कम उम्र में अपने परिवार के साथ उनके कामों में हाथ बंटाना शुरू कर देते हैं।)
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