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शिक्षक डायरी: ‘सात बार टूटी, मगर आँसुओं के बीच जगी जिद ने बनाया कॉलेज टॉपर’

स्वालिहा खातून लिखती हैं, “बेंगलुरु की तेज रफ्तार जिंदगी और बड़ी-बड़ी इमारतें मेरे लिए बिल्कुल नई थीं। मैं यहाँ के श्री रमण महर्षि अकादमी फॉर द ब्लाइंड, बेंगलुरु में स्पेशल डी.एड. (विजुअल इम्पेयरमेंट) का कोर्स करने बड़े सपनों के साथ आई थी। लेकिन यहाँ पर कदम रखते ही एक बहुत बड़ी दीवार मेरे सामने आ खड़ी हुई—अंग्रेजी भाषा।” 

अबतक हिंदी माध्यम से पढ़ी होने के कारण मेरे लिए हर लेक्चर, हर प्रोजेक्ट और सहपाठियों से बातचीत एक बड़ी चुनौती बन गई थी। मेरे आसपास के लोग फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते, और मैं मन ही मन शब्दों को जोड़ने की कोशिश करती। यहाँ पढ़ाई से ज़्यादा संघर्ष खुद को साबित करने का था। हर दिन ऐसा लगता मानो एक नई चुनौती मेरा इंतज़ार कर रही हो।

अंग्रेजी भाषा में बोलने और लेखन की दक्षता में बाकी सहपाठियों की तरह सहज न होने की वजह से मुझे हर मोड़ पर कड़े संघर्ष करना पड़ रहा था। मेरी मुश्किलें तब और बढ़ गईं जब पहली बार मेरा प्रोजेक्ट रिजेक्ट हो गया। फिर दूसरी बार, तीसरी बार… और देखते-देखते सात बार मेरा प्रोजेक्ट खारिज कर दिया गया। हर रिजेक्शन के साथ लोग मेरी काबिलियत पर सवाल उठाने लगे। कुछ सहपाठियों ने तो यहाँ तक कह दिया कि यहाँ पढ़ना तुम्हारे बस की बात नहीं है, अपने घर वापस लौट जाओ।

सात बार मिला रिजेक्शन, लेकिन नहीं टूटा हौसला

लगातार सातवीं बार प्रोजेक्ट रिजेक्ट होने के बाद मैं अंदर से पूरी तरह टूट चुकी थी और हॉस्टल के अपने कमरे में बैठकर बहुत रोई। लेकिन उसी रात, आंसुओं के बीच मेरे भीतर एक जिद ने जनम लिया। मैंने खुद से कहा, “मैं हिंदी मीडियम से हूँ तो क्या हुआ? हार मानकर वापस जाने के लिए मैं घर से इतनी दूर नहीं आई हूँ। अब तो मैं कुछ करके ही दिखाऊँगी।” मैंने दिन-रात एक कर दिया। एक तरफ प्रोजेक्ट की कमियों को सुधारा और दूसरी तरफ अंग्रेजी को समझने की जी-तोड़ मेहनत की। मैंने ठान लिया था कि अंग्रेजी भाषा को अपनी काबिलियत के आड़े नहीं आने दूँगी।

आँसुओं के बीच जगी जिद ने बनाया कॉलेज टॉपर

आखिरकार, आठवीं बार जब मैंने अपना प्रोजेक्ट जमा किया, तो मेरे शिक्षक ने न सिर्फ उसे पास किया बल्कि मेरे अनोखे आइडिया की जमकर तारीफ भी की। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। मेरा यह अटूट संकल्प मुझे और आगे ले गया। जब कोर्स का फाइनल रिजल्ट आया, तो सब दंग रह गए—जिस लड़की को भाषा की वजह से कमजोर समझा जा रहा था, उसने पूरे कॉलेज में टॉप किया था, फिर हमें रैंक अवार्ड और डिसिप्लिन अवार्ड दोनों से सम्मानित किया गया। सात असफलताओं के बाद मिली वह आठवीं सफलता मेरे जीवन की सबसे बड़ी सीख बन गई।

आज मैं उत्तर प्रदेश के एक प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापिका के रूप में काम कर रही हूँ। अक्सर कहा जाता है कि एक अच्छा शिक्षक अपने अनुभव से बनता है। मेरे लिए वह अनुभव दिव्यांग बच्चों के साथ काम करते हुए मिला। उन्होंने मुझे सिखाया कि हर बच्चा सीख सकता है—यदि उसे उसकी ज़रूरत के अनुसार अवसर, सहयोग और विश्वास मिले।

प्राथमिक विद्यालय गणेशपुर-प्रथम, जनपद बस्ती में कार्य करते हुए मैंने समावेशी शिक्षा को केवल सिद्धांत के रूप में नहीं, बल्कि अपनी रोज़मर्रा की शिक्षण प्रक्रिया का हिस्सा बनाया। प्रत्येक बच्चे की सीखने की गति और आवश्यकता को समझते हुए शिक्षण की रणनीतियाँ बदलीं। इसी अनुभव पर आधारित मेरा लेख “समावेशी शिक्षा की अवधारणा और उद्देश्य” पुस्तक “शिक्षा में समानता एवं समावेशन में शिक्षक की भूमिका” (जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान, बस्ती) में प्रकाशित हुआ।

शिक्षा में समावेशन के लिए जारी हैं प्रयास

कक्षा में मैंने सरल भाषा, चित्रों, गतिविधि-आधारित और खेल-आधारित शिक्षण को अपनाया। बच्चों की ज़रूरत के अनुसार बैठने की व्यवस्था बदली, अतिरिक्त समय दिया, घर जाकर व्यक्तिगत सहयोग किया और पूरी कक्षा में सहयोग तथा सम्मान की संस्कृति विकसित करने का प्रयास किया। इन छोटे-छोटे प्रयासों ने बड़ा बदलाव पैदा किया। जो बच्चे पहले संकोच करते थे, वे आत्मविश्वास के साथ कक्षा की गतिविधियों में भाग लेने लगे। सीखना उनके लिए बोझ नहीं, आनंद का अनुभव बनने लगा।

मेरे जीवन की सबसे बड़ी संतुष्टि उन उपलब्धियों में नहीं है जो मुझे मिलीं, बल्कि उन बच्चों की प्रगति में है जिन्हें सीखने का अवसर मिला। जिन विद्यार्थियों को मैंने पढ़ाया, उनमें से एक पूर्ण रूप से शारीरिक दिव्यांग बच्चा आज उत्तर प्रदेश में हाईस्कूल की पढ़ाई कर रहा है। जब भी आवश्यकता पड़ती, मैं उसे व्हीलचेयर, शिक्षण-सामग्री और अन्य आवश्यक संसाधनों के साथ बी.आर.सी. में आयोजित शिविरों तक लेकर जाती थी। देखने में यह एक छोटा-सा सहयोग था, लेकिन उसी सहयोग ने एक बच्चे की शिक्षा की राह आसान बना दी।

आज जब पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो बेंगलुरु के उस छोटे-से कमरे में रोती हुई लड़की और गणेशपुर-प्रथम की कक्षा में मुस्कुराते बच्चों के बीच एक ही सूत्र दिखाई देता है—संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता। अगर शिक्षक धैर्य रखे, सीखना न छोड़े और हर बच्चे की क्षमता पर विश्वास करे, तो परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, सफलता का रास्ता हमेशा निकल आता है। क्योंकि शिक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य केवल पढ़ाना नहीं, बल्कि हर बच्चे को यह विश्वास दिलाना है कि वह भी सीख सकता है, आगे बढ़ सकता है और अपनी मंज़िल तक पहुँच सकता है।

(लेखक परिचय: स्वालिहा खातून, उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद के प्राथमिक विद्यालय गणेशपुर-प्रथम में सहायक अध्यापिका हैं। आपका मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल पढ़ाना नहीं, बल्कि हर बच्चे में सीखने का आत्मविश्वास जगाना है। इसी विश्वास के साथ आप बच्चों के लिए समावेशी, आनंददायक और बाल-केंद्रित शिक्षण वातावरण बनाने का निरंतर प्रयास कर रही हूँ। समावेशन से जुड़े मुद्दों पर चिंतन और लेखन के माध्यम से आप लगातार शिक्षा के क्षेत्र में अपना योगदान दे रही हैं।)

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