लेख- ‘गणित विषय से दोस्ती की पहली सीढ़ी है ‘संख्या पूर्व अवधारणा’

बच्चों के गणित विषय से डरने और सीखने में पीछे रहने का मूल कारण केवल संख्या न समझ पाना नहीं होता। इसकी शुरुआत अक्सर उससे भी पहले होती है। यदि बच्चे एक-एक की संगति, छोटे-बड़े का क्रम, वर्गीकरण और पैटर्न पहचान जैसी बुनियादी अवधारणाएँ नहीं समझ पाते, तो आगे चलकर संख्याएँ, जोड़-घटाव, स्थानीय मान और अन्य गणितीय अवधारणाएँ उनके लिए कठिन हो जाती हैं।
गणित विषय में बच्चों के सीखने को लेकर हुए शोध और जमीनी अनुभव भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि अगर संख्या पूर्व अवधारणाओं की समझ मजबूत न हो और बच्चों के साथ ठोस चीजों व चित्रों की मदद से पर्याप्त काम न किया जाए तो समझ की शुरुआत नींव कमजोर रह जाती है। इसलिए निपुण भारत मिशन के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि बच्चों को संख्या पहचान या संख्या समझ कब सिखाया जाएँ, बल्कि यह है कि क्या हम संख्या पहचान पर काम करने से पहले संख्या पूर्व अवधारणाओं को कक्षा-कक्ष में शिक्षण-अधिगम का हिस्सा बना रहे हैं और बच्चों को खुद से अनुभव करने व अपनी समझ बनाने के लिए अभ्यास के पर्याप्त मौके दे रहे हैं।
संख्या-पूर्व अवधारणा
संख्या-पूर्व अवधारणाएँ वे बुनियादी अनुभव हैं जो बच्चों को संख्या सीखने से पहले प्राप्त होने चाहिए। उदाहरण के तौर पर छोटा-बड़ा, आगे-पीछे ऊपर, नीचे, दाएं-बाएं और रंग, आकृति व अन्य आधार पर वस्तुओं को अलग-अलग समूहों में छांटना इत्यादि। इनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित तीन पहलू शामिल हैं—
- एक-एक की संगति
- क्रम की समझ
- पैटर्न की समझ
ये तीनों कौशल केवल गणित तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बच्चों की तार्किक सोच, अवलोकन क्षमता और समस्या समाधान कौशल के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
एक-एक की संगति, संख्या समझ की पहली सीढ़ी
जब बच्चा किसी समूह की प्रत्येक वस्तु को किसी दूसरी वस्तु से जोड़ना सीखता है, तब वह एक-एक की संगति की अवधारणा विकसित करता है। उदाहरण के लिए, प्रत्येक बच्चे को एक-एक पेंसिल देना या प्रत्येक ताले के साथ एक चाबी को मिलाना। यही अनुभव आगे चलकर तुलना (कम–ज्यादा), गिनती तथा संख्या की मात्रा समझने की नींव बनते हैं।

कक्षा में लागू करने योग्य कुछ उपयोगी गतिविधियां –
- प्रत्येक बच्चे को एक-एक गें या पेंसिल देना।
- प्रत्येक ताले के साथ एक चाबी मिलाना।
- कुर्सियों और बच्चों का मिलान करना।
- शिक्षक जितनी उँगलियाँ दिखाएँ, उतनीं गेंद उठाकर देना।
क्रम की समझ कैसे विकसित करें?
वस्तुओं को एक क्रम में व्यवस्थित करना सीखना एक जरूरी दक्षता है। संख्या सीखने से पहले बच्चों को वस्तुओं को विभिन्न आधारों पर क्रमबद्ध करना आना चाहिए। इसके कई आधार हो सकते हैं जैसे – लंबाई, आकार, कम से ज्यादा, छोटे से बड़े इत्यादि। प्रारंभिक कक्षाओं में गणित शिक्षण की शुरुआत हमेशा ठोस सामग्री से की जानी चाहिए। जैसे— अलग-अलग लंबाई की रस्सियाँ, विभिन्न आकार के पत्ते, बोतलें, पत्थर और लकड़ी के टुकड़े इत्यादि। जब बच्चे इन वास्तविक वस्तुओं को एक व्यवस्थित क्रम में लगाने लगते हैं, तब धीरे-धीरे चित्रों और कार्यपत्रकों की ओर बढ़ना चाहिए।
क्रमबद्धता बच्चों को यह समझने में सहायता करती है कि वस्तुओं के बीच संबंध कैसे स्थापित किए जाते हैं। यही कौशल आगे चलकर संख्याओं के क्रम को समझने, संख्याओं को आरोही-अवरोही क्रम में व्यवस्थित करने, स्थानीय मान की समझ विकसित करने और मापन जैसी अवधारणाओं को सीखने और समझने में सहायक होते हैं।
बच्चों को पैटर्न बनाना और समझना दोनों सिखाएं
यदि कोई बच्चा बार-बार दोहराए जाने वाले क्रम को पहचान सकता है, तो वह गणितीय सोच की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ा चुका है। वास्तविक जीवन में पैटर्न केवल चित्रों तक सीमित नहीं हैं। बच्चे इन्हें समझ सकते हैं— हाथ की तालियों के निश्चित क्रम से, खड़े होने की व्यवस्था से, पत्तियों, कंकड़ों और लकड़ियों से, रंगों से और आकृतियों से। उदाहरण के तौर आप अलग-अलग रंगों की गेंद का एक पैटर्न बना सकते हैं जैसे नीली गेंद, पीली गेंद, नीली गेंद और फिर पीली गेंद तो बच्चे बता देंगे कि अब तो नीली गेंद की बारी है। ऐसे अन्य परिवेशीय उदाहरणों से बच्चों में पैटर्न की बेहतर समझ विकसित कर सकते हैं।

इस चित्र में आप फूल और पत्ती का पैटर्न पहचान सकते हैं (पहले दो फूल, फिर एक पत्ती…..) और बच्चों को इस पैर्टन को आगे बढ़ाने का मौका देना, उनकी समझ को बेहतर बनाने में काफी उपयोगी होता है। ध्यान रखें कि आप इसे एक गतिविधि और सीखने के आनंद के रूप में परिचित कराएं, न कि बोझिल सवाल के रूप में जिसे बच्चों को हल करना है और एक निश्चित जवाब देना है। ऐसी गतिविधियों से बच्चे केवल पैटर्न पूरा करना नहीं सीखते, बल्कि उसके पीछे का तर्क भी समझते हैं।
बच्चों को “रेडीमेड उत्तर” नहीं, सीखने-समझने का अनुभव दें
संख्या-पूर्व अवधारणाओं पर काम करने का उद्देश्य बच्चों को उत्तर रटाना नहीं है। बल्कि इसका उद्देश्य यह है कि बच्चे स्वयं वस्तुओं को छुएँ, क्रम से व्यवस्थित करें, तुलना करें और अपने अनुभवों के आधार पर निष्कर्ष निकालें। इसलिए शिक्षण के दौरान बच्चों के साथ बातचीत को प्राथमिकता दें। बच्चों को सोचने और फिर जवाब देने का समय दें। ऐसी गतिविधियों के लिए दैनिक जीवन में सुगमता से उपलब्ध वस्तुओं का उपयोग करें। सिखाने की शुरुआत हमेशा ठोस सामग्री से शुरुआत करें और फिर धीरे-धीरे चित्रों और कार्यपत्रकों तक पहुँचें। बच्चों को अपने शब्दों में कारण बताने का मौका दें और पूछें कि तुमने ऐसा क्यों किया? इससे बच्चों में तार्किक चिंतन का विकास होगा। हमारे विद्यालयों में आने वाले अनेक बच्चे औपचारिक पूर्व-प्राथमिक शिक्षा (आँगनबाड़ी या अन्य विकल्प) का अनुभव लेकर नहीं आते। ऐसे में कक्षा-1 के शुरुआती महीनों में संख्या-पूर्व अवधारणाओं पर विशेष ध्यान देना आवश्यक हो जाता है। यदि यह आधार मजबूत नहीं होगा, तो आगे चलकर संख्या पहचान, जोड़-घटाव और अन्य गणितीय कौशलों में कठिनाइयाँ दिखाई देना स्वाभाविक है।

आखिर में हम कह सकते हैं कि केवल संख्या सीखना और 1, 2, 3… रट लेना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक संख्या ज्ञान तब विकसित होता है जब बच्चा वस्तुओं के बीच संबंध स्थापित कर सके, उन्हें विभिन्न आधारों पर क्रमबद्ध कर सके और उनके भीतर छिपे पैटर्न को पहचान सके। इसलिए पहली कक्षा में एक-एक की संगति, क्रम की समझ और पैटर्न की समझ पर किया गया प्रत्येक छोटा प्रयास आगे चलकर बच्चों की सम्पूर्ण गणितीय यात्रा को सुगम, सार्थक और आनंददायी बना सकता है। एक शिक्षक के रूप में यदि हम इन शुरुआती अनुभवों को समृद्ध बना दें, तो बच्चे केवल संख्याएँ नहीं सीखेंगे, बल्कि गणित को समझना और उसे अपने जीवन से जोड़ना भी सीखेंगे।

(लेखक परिचयः वृजेश सिंह पिछले 10 वर्षों से शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। बुनियादी साक्षरता, संख्यात्मकता (FLN), पुस्तकालय और शिक्षक विकास कार्यक्रमों के माध्यम से बच्चों के अधिगम स्तर को बेहतर बनाने में योगदान दे रहे हैं। निपुण भारत मिशन को बड़े पैमाने पर कक्षा में लागू करने में सक्रिय भूमिका निभाई है।
उनका दृष्टिकोण सरल है: शिक्षकों को मजबूत करें, प्रभावी शिक्षण-अधिगम तरीकों का उपयोग और विद्यालय-आधारित बेहतर ऑन साइट सपोर्ट। शोध और साक्ष्य को व्यावहारिक, शिक्षक-केंद्रित संसाधनों में परिवर्तित करना उनकी विशेष रुचि है।)
गणित में विषय में रुचि उत्पन्न करता लेख
जीवन में हर आयाम में गणित का महत्त्व है।
लेख को पढ़कर अपने बचपन की घटना याद आ गई , जब मैं पाँचवीं कक्षा तक पढ़ रही थी तब तक गणित विषय की अवधारणाएं मेरे शिक्षक द्वारा पूर्ण रूप से स्पष्ट करवाई गई , जिससे मेरी रुचि गणित में थी , लेकिन माध्यमिक कक्षाओं में गणित शिक्षक न होने से गणित में कमजोर हो गई।पहले आज की तरह साधन नहीं होते थे