कहानी: ज्ञानी चाचा और बच्चे
भारत में कहानी को सुनाने की एक समृद्ध मौखिक परंपरा रही है। ऐसी ही एक कहानी लिखी है संजीव शर्मा जी ने जो अलीगढ़ में बतौर SRG सदस्य काम कर रहे हैं।
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21वीं शताब्दी में बच्चों की परवरिश यानि पैरेंटिंग बिल्कुल नए स्वरूप में सामने आ रही हैं। सिंगल पैरेंट्स, ज्वाइंट फेमिली में रहने वाले पैरेंट्स और वर्किंग पैरेंट्स की चुनौतियां बिल्कुल नई हैं। इन मुद्दों पर चर्चा, जागरूकता और समझ बनाने के लिए संवाद का सिलसिला शुरू करने और जारी रखने की जरूरत है।
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भारत में कहानी को सुनाने की एक समृद्ध मौखिक परंपरा रही है। ऐसी ही एक कहानी लिखी है संजीव शर्मा जी ने जो अलीगढ़ में बतौर SRG सदस्य काम कर रहे हैं।
इस शिक्षक दिवस पर पढ़िए एक शिक्षक की चिट्ठी अपने बच्चों के नाम।
बच्चों के जीवन में प्रारंभिक वर्ष उनके मानसिक और भावनात्मक विकास की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।
इस अनुभव को पढ़ने के बाद बच्चों का स्क्रीन टाइम कम होने की संभावना है, लेकिन आपका अपना 'स्क्रीन टाइम' जरूर कम होगा।
बच्चों का विकास एक देश और समाज की साझी चिंता वाला मुद्दा है। इसे व्यक्तिगत सवाल के रूप में देखने वाले नजरिये में बदलाव की जरूरत है।
लेखक और पत्रकार दयाशंकर मिश्र लिखते हैं, "बच्चों को प्रोडक्ट मत बनाइए। बच्चे आपसे हैं। आपके लिए नहीं हैं।"