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रविवार, 1 नवंबर 2026

स्कूल से छूटे बच्चों तक खुद पहुँचे शिक्षक: कर्डिले सर की ‘गृहभेंट मुहिम’

मुंबई के परेल भोईवाडा महानगर पालिका मराठी शाला के शिक्षक कर्डिले सर गृहभेंट और अभिभावकों से संवाद के ज़रिए पढ़ाई से दूर हुए बच्चों को दोबारा स्कूल से जोड़ रहे हैं।

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किसी बच्चे का स्कूल में सिर्फ दाख़िला हो जाना काफ़ी नहीं है। असली चुनौती यह है कि बच्चा नियमित स्कूल आता रहे और सीखता रहे। आर्थिक तंगी, परिवार में अचानक आई मुश्किलें या स्कूल का बदल जाना, ऐसी कई वजहें हैं जिनसे बच्चे धीरे-धीरे पढ़ाई से दूर हो जाते हैं। मुंबई के परेल भोईवाडा महानगर पालिका मराठी शाला  के शिक्षक कर्डिले सर ऐसे ही बच्चों को खोजकर उन्हें दोबारा स्कूल से जोड़ने का काम कर रहे हैं।

अनुपस्थिति के पीछे की कहानी समझना

कर्डिले सर मानते हैं कि किसी बच्चे की लगातार अनुपस्थिति अपने आप में एक संकेत है। उसके पीछे अक्सर घर की कोई ऐसी परिस्थिति होती है, जिसे कक्षा में बैठकर नहीं समझा जा सकता। इसलिए वे सिर्फ़ बच्चे को “स्कूल आओ” कहकर नहीं रुकते, बल्कि उसके घर जाते हैं। वे अभिभावकों से बात करते हैं, उनकी परेशानियाँ सुनते हैं और भरोसा देते हैं। इसी भरोसे के सहारे परिवार बच्चे को फिर से स्कूल भेजने के लिए तैयार होता है।

अदिती और सेजल: दो बच्चियाँ, दो अलग कहानियाँ

अदिती के पिता के निधन के बाद वह अपनी माँ के साथ मुंबई में मामा के घर रहने लगी। घर बदला, हालात बदले और इसका असर उसकी पढ़ाई पर पड़ा। स्कूल में उसकी अनुपस्थिति बढ़ने लगी। कर्डिले सर ने परिवार से लगातार संवाद किया और अदिती को दोबारा नियमित पढ़ाई से जोड़ा।

सेजल की कहानी अलग है। वह पहले एक गुजराती माध्यम के स्कूल में पढ़ती थी। कम नामांकन के कारण उसके स्कूल का दूसरे स्कूल में विलय हो गया और सेजल की पढ़ाई बीच में छूट गई थी। लगातार प्रोत्साहन के बाद वह फिर से स्कूल आने लगी। नए माहौल और नई भाषा के बीच उसका आत्मविश्वास बना रहे, इस पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

ये दोनों उदाहरण बताते हैं कि सही समय पर एक शिक्षक की संवेदनशील पहल किसी बच्चे की पढ़ाई को छूटने से बचा सकती है।

स्कूल में नियमित उपस्थिति बनाए रखना भी है जरूरी

बच्चे को स्कूल वापस लाना तो पहला कदम भर है। उसे रोज़ स्कूल आने के लिए प्रेरित रखना उतना ही ज़रूरी है। इसके लिए कर्डिले सर अभिभावकों से नियमित संपर्क में रहते हैं और कक्षा को बच्चों के लिए रोचक बनाने पर ज़ोर देते हैं। गतिविधि-आधारित शिक्षण, डिजिटल माध्यमों और नए प्रयोगों के ज़रिए वे कोशिश करते हैं कि बच्चे स्कूल में सहज महसूस करें और सीखने में उनकी रुचि बनी रहे।

कक्षा की दीवारों से आगे शिक्षक की भूमिका

यह पहल इस बात की याद दिलाती है कि शिक्षक का काम पाठ्यक्रम पूरा कराने तक सीमित नहीं है। बच्चे की परिस्थिति को समझना, परिवार से रिश्ता बनाना और यह सुनिश्चित करना कि कोई बच्चा पीछे न छूटे, यह भी शिक्षक की ज़िम्मेदारी का हिस्सा है। जब स्कूल, शिक्षक, अभिभावक और समुदाय साथ आते हैं, तो पढ़ाई से दूर हुए बच्चे भी लौट आते हैं।

विद्यालय नेतृत्व का साथ

इस प्रयास में विद्यालय के प्रधानाध्यापक कांताराम खंडवी का पूरा सहयोग मिल रहा है। वे कर्डिले सर को लगातार मार्गदर्शन देते हैं और इस अभियान को स्कूल की प्राथमिकता के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं। उनका स्पष्ट मत है कि कोई भी बच्चा परिस्थितियों की वजह से शिक्षा से वंचित नहीं रहना चाहिए। यह शैक्षिक नेतृत्व का एक अच्छा उदाहरण है, जहाँ प्रधानाध्यापक शिक्षक की पहल को संस्थागत समर्थन देकर उसे मज़बूत बनाते हैं।

कर्डिले सर का सपना है कि हर बच्चा स्कूल पहुँचे, हर बच्चा सीखे और मुश्किल हालात में भी पढ़ाई की निरंतरता जारी रखने के लिए बच्चों को जरूरी सहयोग और प्रोत्साहन मिलता रहे।

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