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रीडिंग रिसर्चःबच्चों में पढ़ने का आत्मविश्वास कहां से आता है?

मिट्टी के खिलौने, बच्चा का खेल, गांव का जीवन, बच्चे कैसे सीखते हैं

एक गाँव में मिट्टी के खिलौने बनाते हुए बच्चे।

बच्चों में पढ़ने का आत्मविश्वास कहां से आता है? अगर हम इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश करें तो पाएंगे कि जब बच्चे किताबों में चित्र देखकर अनुमान लगाकर कहानी पर अपने अर्थ आरोपित कर रहे होते हैं। उन्हीं दिनों से बच्चे के भीतर पढ़ने का आत्मविश्वास आकार लेने लगता है।मगर बहुत से बच्चे जैसे ही लिखित शब्दों की दुनिया से रूबरू होते हैं तो उनका यह आत्मविश्वास डगमगाने लगता है।

अपने हिलते आत्मविश्वास को कुछ बच्चे जल्दी संभाल लेते हैं। बाकी बच्चों के लिए इस स्थिति से उबरने में लंबा समय लगता है। जब कोई बच्चा अक्षरों और शब्दों को पहचानने लगता है और अपने छोटे-छोटे प्रयासों के लिए शिक्षक की तारीफें हासिल करता है तो उसका आत्मविश्वास फिर से बढ़ने लगता है। क्लासरूम के बाकी बच्चों की सकारात्मक या नकारात्मक टिप्पणी भी पढ़ने के आत्मविश्वास को प्रभावित करती है।

उदाहरण के तौर पर अगर कोई शिक्षक बच्चों के बारे में कहना शुरू कर दें कि अरे, यह तो ठोटी है। ठोटी यानि जिसको पढ़ना-लिखना न आता हो तो बच्चे भी इस बात को अपने बारे में सच मानकर जीना शुरु कर देते हैं। हर बच्चे में ऐसी आत्मछवि को खुद से तोड़ने का माद्दा नहीं होता। अगर शिक्षक अपने बच्चों में सीखने के प्रति लगन को बाकी बच्चों के सामने रेखांकित करें तो इसका बच्चे के आत्मविश्वास पर बड़ा सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

हाल ही में एक बच्चे की क्लास में पढ़ने वाली छात्रा की प्रगति के बारे में उसे बताया गया। इस पर उसकी हैरानी भरी प्रतिक्रिया थी, “अरे! वह पढ़ने में इतनी होशियार है?” मेरा जवाब था, “हाँ।” जिस बच्ची की यहां बात हो रही है, उसके बारे में पूरे क्लास को लगता था कि वह ठोटी यानि पढ़ाई में कमज़ोर है। उसे कुछ भी नहीं आता। वह कभी भी पढ़ना नहीं सीख पाएगी।

सीखने की भूख

इस बच्ची से उसकी पढ़ने की आदत और रुचि के बारे में बात हो रही था। मैंने सवाल किया तुम्हें पढ़ाई में पीछे रहना है क्या? अपने स्टाइल में उसने कहा, “नहीं।” फिर उससे रोज़ाना घर पर पढ़ने और क्लास में पढ़ाई पर ध्यान देने को लेकर बात हुई। इसका असर उसके ऊपर दिखाई दिया। इस बच्ची की बड़ी बहन बता रही थी कि उसने घर पर पढ़ाई की। दूसरे दिन फिर वह क्लास में पढ़ने की जिद कर रही थी।मगर बाकी बच्चों के लिए समय निर्धारित होने के कारण उसे खुद से पढ़ने के लिए कहा गया।

एक शिक्षक का काम होता है किसी बच्चे में सीखने की भूख पैदा करना। कभी-कभी यह काम शिक्षक प्रशिक्षक को भी करना होता है ताकि शिक्षक के लिए रोल मॉडलिंग हो पाए और उनको काम करने के लिए रास्ता मिल सके। शिक्षण प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा है बच्चों से सार्थक बातचीत करना और सवालों के माध्यम से उनको खुद सोचने का मौका देना। इसी कड़ी का एक अहम हिस्सा है हर बच्चे में अपनी बात आत्मविश्वास के साथ रखने का माद्दा पैदा करना। इससे बच्चा बिना झिझक से सवाल पूछ पाता है। अपनी बात कह पाता है।

डर के माहौल का असर

डर के माहौल में बच्चे ग़लत पढ़ते हैं। एक बार उनको ग़लत पढ़कर बचाव करने की आदत लग गई तो फिर उनको चीज़ों को समझने की दिशा में प्रेरित करना काफी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में बेहतर होगा कि बच्चों से बात करें। उनको पढ़कर बताएं कि पढ़ने का सही तरीका क्या है? वहां तक कैसे पहुंच सकते हैं, इसके बारे में बच्चों को बताएं। उनके सामने उदाहरण प्रस्तुत करें। उनको खुद करने का मौका दें और अगर फिर भी उनके कोई सवाल रह जाते हैं तो उनका सहजता के साथ जवाब दें।

बच्चों की ग़लतियों पर मुस्कुराएं, मगर यह मुस्कुराहट मजाक वाली न होकर सपोर्ट करने वाली होनी चाहिए कि कोई बात नहीं यह चीज़ तुमको नहीं आती। इसे बताने की जिम्मेदारी अब मेरी है। ऐसा संवाद बच्चों को सहज बनाता है। अगर ऐसी बातचीत बच्चों के साथ वन-टू-वन वाले मोड में हो तो काफी अच्छा रहता है। वे बाकी बच्चों की प्रतिक्रियाओं से परे हटकर सहजता से अपनी बात कह पाते हैं। अपने पंखों को खोलने का हौसला बटोर पाते हैं जो कई बार भीड़ के दबाव में संभव नहीं होता है।

बच्चों को पियर लर्निंग के साथ-साथ खुद से भी सीखकर आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। भविष्य में यह चीज़ उनको स्वतंत्र पाठक, लेखक, चिंतक और सर्जक बनने में सहायक होगी।

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shameem ahmad

kab milenge leptop

Virjesh Singh

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