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कैसे पूरा होगा गिजूभाई बधेका का ‘दिवास्पन’?

गिजूभाई बधेका की पुस्तक ‘दिवास्पन’ को शैक्षिक प्रयोगों की एक कालजयी पुस्तक माना जाता है। उनकी इस पुस्तक को प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में होने वाले प्रयोगों का एक महत्वपूर्ण संकलन माना जाता है। दिवास्वपन ने बहुत से शिक्षकों, शिक्षाविदों, अभिभावकों और शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े लोगों को काफ़ी प्रेरित किया है। इस किताब के बारे में लोगों की जिज्ञासाओ का आलम यह है कि लोग आज भी उनकी किताब के बारे में जानना, समझना, पढ़ना और उस पर संवाद करना चाहते हैं।

गिजूभाई के शैक्षिक नवाचार

गिजूभाई के बारे में मनोज शुक्ल कहते हैं, “गिजूभाई बधेका ने 20वीं शताब्दी के पहले दशकों में शिक्षा क्षेत्र में अनूठे प्रयोग किए। आज करीब एक शताब्दी के बाद जब हम उनकी पुस्तक दिवास्पन पर नज़र डालते हैं तो हमें लगता है कि हमें आज भी ठीक वैसे ही चलते रहना होगा एक-एक क़दम आगे। आज जैसा कि गिजूभाई चाहते थे शिक्षा बाल केंद्रित हो आज ऐसे प्रयास हो रहे हैं। बदलते समय में हमारे भी लक्ष्य वहीं हैं, यह हो सकता है कि हमारे दृष्टिकोण में परिवर्तन आया हो। लेकिन हमारे स्वपन वही हैं जो गिजुभाई के थे।”

गिजुभाई का बाल साहित्य व्यापक था। बच्चों की उनकी समझ उसमें साफ़ झलकती है।  हाँ, इतना जरूर है कि उनकी पुस्तक दिवास्वपन भावनगर के दक्षिणमूर्ति में किए गए उनके प्रयोगों का लेखा-जोखा है। हमारे मन में अक्सर यह बात उठती है कि कैसे रहे होंगे गिजुभाई? उनको समझने की शुरुआत कहाँ से करें? उनके बारे में शिक्षाविद् रमेश दवे कहते हैं, “दिवास्वन गिजुभाई बधेका की श्रेष्ठतम कृति है। इसमें उनके सारे प्रयोगों का संग्रह है। दिवास्पन का मतलब होता है बहुत ही कठिन या जटिल काम, जिस तरह से दिन में सपने देखना बहुत कठिन काम होता है उसी तरीके से उन्होंने दिन में सपने देखने की कोशिश की थी और एक असंभव लगने वाले काम को संभव कर दिखाया था।”

भारत के स्कूलों के संदर्भ में उपयोगी हैं गिजूभाई के प्रयोग

लेखक अरविंद गुप्ता कहते हैं, “सबसे पहले राजस्थान सरकार एक पत्रिका निकाला करती थी, जिसका नाम टीचर्स टुडे था। उसमें आज से 15-20 साल पहले एक विशेषांक में पूरी दिवास्वपन हिंदी और अंग्रेजी में छाप दी। मैं वो पढ़ करके एकदम गदगद हो गया क्योंकि इससे पहले शिक्षा पर काफ़ी कुछ साहित्य पढ़ा था, मगर हमारे देश में इस तरह का सुंदर प्रयोग हुआ है, यह मैंने पहली बार पढ़ा।”

गिजूभाई की पोती सीमा भट्ट कहती हैं, “हमें बचपन से ही लगता था कि हमारे घर में गिजुभाई के विचार जीवंत हैं। क्योंकि मेरे माता-पिता भी गिजुभाई की जो बातें थी, उनकी जो मान्यताएं थीं उसी हिसाब से उन्होंने हमारी परवरिश की। हमको ऐसा लगता है कि हमारे घर का माहौल गिजूभाई के घर जैसा ही रहा होगा।”

अरविंद गुप्ता बताते हैं, “गिजूभाई पेशे से तो वक़ील थे और गांधी जी की तरह कुछ वर्ष दक्षिण अफ़्रीका में जाकर रहे। वहां से वापस आने के बाद वह बंबई के हाईकोर्ट में वकालत करने लगे। उसी समय उनके बेटे नरेंद्र भाई का जन्म हुआ और नरेंद्रभाई के लालन-पालन के लिए वह शिक्षा साहित्य का अध्ययन करने लगे। एक ओर वक़ालत से उनका दिल ऊब गया था, झूठ..फरेब..यह सारी चीज़ें उनके वश की बात नहीं थीं और दूसरी तरफ़ नरेंद्र भाई के लालन-पालन की जिम्मेदारी थी। उस समय 1910-15 के दौर में मारिया मांटेसरी जानी-मानी शिक्षाविद् थीं, उन्होंने मांटेसरी का बहुत गहन अध्ययन किया और उनकी शिक्षा प्रणाली के अनुसार ही नरेंद्रभाई की परवरिश की। कह सकते हैं कि यह शिक्षा के साथ उनका पहला इत्तिफाक था। बाद में दक्षिणमूर्ति बाल मंदिर में 20 साल तक बिल्कुल ठोस प्रयोग किए बच्चों के साथ में।”

बाल केंद्रित शिक्षण के पक्षधर

नेशनल बुक ट्रस्ट की पूर्व निदेशक वर्षा दास कहती हैं, ” गिजूभाई बधेका ने बच्चों को केंद्र में रखा। बच्चे को आनंद आता है या नहीं आता है, यही मुख्य बात थी। बच्चों के आनंद के लिए उन्होंने कई प्रयोग किए। लेकिन दिवास्पन में हम पढ़ते हैं कि गिजूभाई अपने पहले प्रयोग में ही विफल हो गए थे। उन्होंने सोचा था कि ओम शांति कहके सारे बच्चे शांत हो जाएंगे, लेकिन सब बच्चे शांत नहीं हुए। लेकिन वो हारे नहीं और वे प्रयोग करते रहे।”

शिक्षाविद् रमेश दवे कहते हैं, “बच्चे सीखें, बच्चे करें, बच्चे खेलें, गिजूभाई का बच्चों के प्रति इतना लगाव था कि वह बच्चों को देवता मानते थे। आज तक हमने ऐसी परंपरा कहीं नहीं देखी कि जब बच्चे स्कूल आते थे तो गिजूभाई दरवाज़े पर खड़े होकर उनको रिसीव करते थे। कहते थे आओ सोहन भाई, आओ मोहन भाई..आओ नीलम…इस तरह से कहकरके उनको वह रिसीव करते थे और जब बच्चे छुट्टी के बाद जाया करते थे तो वो कहा करते थे फिर आओ लीला बहन, फिर आओ मोहन भाई…इस तरीके से वह उनको फिर आमंत्रित करते थे।

वर्षा दास अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहती हैं, “बच्चा ख़ुश है या नहीं। उसके नाखून साफ़ हैं या नहीं। उसकी टोपी मैली है नहीं। मतलब गिजूभाई हर चीज़ पर ध्यान देते थे, जबकि उनके समय के शिक्षक यह सोचते थे कि हमारा काम तो केवल पाठ्यपुस्तक से है। हमें बच्चे के ख़ुश होने या न होने या स्वच्छ होने या अस्वच्छ होने से हमारा क्या संबंध है? लेकिन गिजूभाई ने पूरा उनका नज़रिया बदल दिया और बताने की कोशिश की बच्चे का स्वस्थ होना शिक्षा का पहला क़दम होना चाहिए।”

पुरानी मान्यताओं का पुरजोर विरोध

गिजूभाई के बारे में बताते हुए लेखक अरविंद गुप्ता कहते हैं, “गिजूभाई का काफ़ी कम उम्र में देहांत हो गया। जब उनका देहांत हुआ वह 54 साल के थे। उन्होंने बच्चों के लिए 200 से ज़्यादा कहानियां लिखी हैं। उस समय गुजरात के अंदर एक मुहिम जैसा था…यह 20 का दशक था जब बच्चों की बहुत ज़्यादा पिटाई लगती थी। ऐसा समझा जाता था कि जबतक छड़ी से मारोगे नहीं तबतक बच्चे सीखेंगे नहीं।”

वो आगे कहते हैं, “इस परंपरा के ख़िलाफ़ गिजूभाई ने बच्चों की एक बानर सेना जैसी गठित की और बच्चों को अगर कोई माँ-बाप मारता तो बच्चों की बानर सेना उनके माँ-बाप के पास प्रश्न पूछवेने के लिए पहुंच जाती थी। तो इससे कुछ राहत मिली और उन्होंने गुजरात के अंदर इस तरह के बाल मंदिरों की एक एक पूरी शृंखला जैसी शुरू की। गिजूभाई ने माता-पिता और शिक्षकों के लिए 20 किताबें लिखीं। सभी गुजराती में थीं। मान लीजिए अगर उन्होंने अपने जीवन में एक किताब लिखी होती ‘दिवास्वपन’ तो विश्व के महान शिक्षाविद् के रूप में उनकी प्रतिष्ठा होती।”

बाल मुक्ति अभियान की शुरुआत

गिजूभाई की पोती सीमा भट्ट कहती हैं, “उन्होंने 18-20 साल शिक्षण के विचार और पद्धति के बारे में इतना ज़्यादा लिखा और 20 साल तक पढ़ाने का काम किया। आज 70 साल भी कोई इतना ज़्यादा काम नहीं कर पाया है। बच्चों के प्रति उनके भीतर समर्पण का जज्बा था। उनका दिल बच्चों जैसा था। वह बच्चों के मन में चलने वाले विचार, मान्यताओं, अंदर के गहरे डर हैं…उसकी अनुभूति उन्होंने की।”

शिक्षाविद् रमेश दवे बच्चों के बारे में गिजूभाई का नज़रिया बताते हुए कहते हैं, “बाल दर्शन में छोटे-छोटे कोटेशन हैं। इसमें उन्होंने बच्चों को कहा कि ये मेरे बाल देवता हैं। बच्चे प्रश्न कर रहे हैं कि मैं खेलूं कहाँ, मैं कूदूं कहाँ, यदि मैं खेलता हूँ, कूदता हूँ या आवाज़ करता हूँ तो माँ-बाप, भाई-बहन सब मना करते हैं। किसी को गिरने का डर है, किसी को शोर होने की वजह से दिक्कत है। इस तरह से मुझ पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए जाते हैं। गिजूभाई पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने बच्चों की स्वतंत्रता या बाल मुक्ति का अभियान चलाया।”

वहीं लेखक अरविंद गुप्ता कहते हैं, “एक यह भी चीज़ है कि उन्होंने देखा होगा कि हमारी जो पूरी शिक्षा पद्धति थी वह बहुत ज़्यादा रटंत पद्धति पर आधारित थी। इम्तिहान है, हाज़िरी है, रचना है ये सब एक तरह के प्रतीक हैं जैसे हम किसी मंदिर में जाते हैं तो लोग फूल, नारियल, अगरबत्ती आदि चीज़ें लेकर जाते हैं। चाहें हमारे दिल में श्रद्धा हो या न हो, प्रतीकों का ध्यान रखते हैं।”

अपनी बात आगे बढ़ाते हुए वो कहते हैं, “शिक्षा में आजकल प्रतीकों के ऊपर ज़्यादा ध्यान है कि बच्चों का एक यूनीफार्म हो, हाज़िरी हो, होमवर्क हो, पाठ्यपुस्तकें हों…पर उन्होंने कहा कि इनका सीखने-सिखाने से कोई लेना-देना नहीं है। तो मेरे ख़्याल से एक बुनियादी सोच वाले व्यक्ति थे। उन्होंने मांटेसरी को ज़्यों का त्यों नहीं अपनाया। बहुत सारे मुद्दों पर मांटेसरी के साथ उनके मतभेद थे। उन्होंने मांटेसरी के मूल सार को अपनाया और उसको भारत के ठोस धरातल पर अपनाने की चेष्टा की।”

‘अपने जमाने से बहुत आगे थे गिजूभाई’

उनकी पोती सीमा भट्ट कहती हैं, “उनके कई राइटिंग या दूसरी जो पुस्तकें हैं उसमें उन्होंने लिखा भी है कि क्या पता लोग सोचेंगे कि मैं ये क्या लिख रहा हूँ। लोग मुझे पागल ही समझेंगे तो जरूर अकेले होंगे क्योंकि वह अपने जमाने से वह बहुत आगे बढ़कर सोच रहे थे।”

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गिजूभाई बधेका (तस्वीर- साभार विकीपीडिया)

शिक्षाविद् रमेश दवे, “स्कूल बच्चों को बुलाना चाहिए यह बात गिजूभाई ने साबित की। मेरा मानना है कि गिजूभाई ने ऐसा केवल कहा नहीं करके दिखाया। गांधी ने कहा बहुत लेकिन गांधी ने कार्य दूसरे को सौंपा क्योंकि उनके पास इतना समय नहीं था कि सभी काम वह अकेले करते। बिनोबा ने भी सोचा, लेकिन उन्होंने सर्वोदय पर ज़्यादा काम किया, जे कृष्णमूर्ति ने सोचा लेकिन उन्होंने हमारी भारतीय अस्मिता के बारे में ज़्यादा बात कही। गिजूभाई ने कहा कि नहीं मैं तो जिनके लिए बात कह रहा हूँ सीधा उनके पास जाऊंगा, तो वह पहले व्यक्ति थे जो स्वयं बच्चों में चले गए।”

तो वहीं वर्षा दास कहती हैं, “गिजूभाई जैसे एक-एक बच्चे के साथ जुड़ते थे। ऐसे शिक्षकों के प्रशिक्षण में हमें भी एक-एक शिक्षक के साथ जुड़ना होगा। उनकी क्या समझ है, उनकी क्या रुचि है यह देखकर उनको समझाना होगा। उनमें से कुछ हैं जो खुले होंगे और यह कहेंगे कि हाँ हम यह प्रयोग करना चाहते हैं और कुछ ऐसे भी होंगे जो सोचेंगे कि नहीं-नहीं इससे तो समय नष्ट होगा, हमारा कोर्स कब पूरा होगा? हम इन बातों में नहीं पड़ना चाहते हैं तो यहां पर भी शिक्षकों के सामने वही समस्या है जो कि बच्चों के साथ रही है।”

‘गिजूभाई की आत्मा ख़ुश तो नहीं होगी’

स्कूलों की वर्तमान स्थिति की तरफ़ ध्यान आकर्षित करते हुए लेखक अरविंद गुप्ता कहते हैं, “मेरे ख़्याल से देश के स्कूलों की जो हालत है उसको देखकर गिजूभाई की आत्मा ख़ुश तो नहीं होगी। सवाल तो महत्वपूर्ण है कि उनके सपने को कैसे पूरा किया जाए? उन्होंने अपने जीवन में बच्चों के लिए जो किया वह अभूतपूर्व था। गांधी जी ने उनसे ख़ुद कहा देखो मैं तो बच्चों के साथ इतना काम नहीं कर पाया, जितना तुमने किया।”

वो आगे बताते हैं, “गिजूभाई की लंबी-लंबी मूछें थीं तो महात्मा गांधी ने उनको मुछाली माँ यानि मूँछ वाली माँ का खिताब दिया था। मेरे ख़्याल से इससे बड़ा तमगा या ख़िताब कोई किसी को नहीं दे सकता क्योंकि उस इंसान में माँ जैसी एक असीम ममता थी और मेरे ख़्याल से दिवास्वपन को पढ़कर हमारे देश के हज़ारों शिक्षक प्रेरित होंगे क्योंकि इसमें प्रगति की ओर बढ़ने के लिए एक रौशनी की एक किरण उन्हें दिखाई दी है।”

बदलाव की उम्मीद के साथ वर्षा दास कहती हैं, “गिजूभाई की पुस्तक ‘दिवास्वपन’ के प्रत्येक प्रयोग को हमारे स्कूलों में अपनाया जाए तो आने वाला कल बहुत ही सुहाना हो जाएगा। इसलिए क्योंकि उस शिक्षा से गुजरे हुए विद्यार्थी अलग तरह के होंगे। उनकी सोच अलग तरह की होगी। उनका विकास अलग तरह का होगा तो इसलिए गिजूभाई को हमें बहुत ही सीरियसली लेना चाहिए ख़ासकर उनकी पुस्तक दिवास्पन को।”

बच्चों को समझना चाहिए

वहीं शिक्षाविद् रमेश दवे एक रोचक बात कहते हैं, “गिजूभाई को समझने के लिए हमें अपने बच्चों को समझना चाहिए। एक माँ-बाप के हैसियत से, शिक्षक की हैसियत से, गुरू की हैसियत से, समाज की हैसियत से, अभिभावक की हैसियत से, शिक्षा नीति बनाने वाले की हैसियत से, शिक्षा के कार्यक्रम लागू करने वाली संस्थाओं के रूप में उसकी हैसियत से अगर हम सब मिलकरके यह सोचें कि बच्चे इस देश की आत्मा हैं। बच्चे ही देश हैं यह मान लें तो गिजूभाई सार्थक हो जाएंगे।”

एक शिक्षिका ने गिजूभाई की किताब ‘दिवास्वपन’ को पढ़ा। उसे लगा कि कितना सुंदर था उनका प्रयास! सच बात तो यह थी उसे लगता था कि यह सब आज भी किया जा सकता है। क्या आपको भी ऐसा ही महसूस होता है? अगर हाँ, तो यह दर्शाता है कि गिजूभाई आज भी प्रासंगिक है। उनके जैसे संवेदनशील अध्यापकों की आवश्यकता हमारे समाज में आज भी है।

(साभारः केन्द्रीय शैक्षिक प्रोद्योगिकी संस्थान, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद की तरफ़ से तैयार वीडियो का लिखित रूपांतरण)

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2 Comments on कैसे पूरा होगा गिजूभाई बधेका का ‘दिवास्पन’?

  1. बहुत-बहुत शुक्रिया ऋषिकेश जी, आपकी तारीफ बहुत मायने रखती है। इस सफर को जारी रखने में ऐसे प्रोत्साहन से हौसला मिलता है। आपने शिक्षा के मुद्दे के साथ-साथ, भाषा और प्रवाह वाले बिंदु की तरफ ध्यान दिलाया था। एजुकेशन मिरर की शुरुआत इसी मकसद के साथ हुई थी कि शिक्षकों व शिक्षक प्रशिक्षकों व शिक्षा से जुड़े विभिन्न लोगों व इसमें रुचि रखने वाले जनसामान्य के साथ बेहद सहजता के साथ संवाद हो पाये। जहाँ केवल समस्याओं की बात न हो, उनके समाधान पर भी ग़ौर किया जाये। हर पोस्ट में कुछ ऐसे विचार जरूर हों जिन्हें व्यावहारिक रूप से स्कूल में लागू किया जा सके। आप जैसे पाठकों की प्रतिक्रियाओं से लगता है कि सफर सही दिशा में जा रहा है।

  2. ऋषिकेश // May 14, 2016 at 9:58 am //

    श्री वृजेश जी, नमस्कार ,
    आपका पहला ब्लॉग जहाँ ‘सेर’ (शेर )है, तो वहीँ पर ‘एजुकेशन मिरर’ ‘सवा सेर’ सिद्ध हो रहा है. यदि कोई ईमानदार पाठक आपके किसी भी लेख को पढ़ेगा तो, घड़ी भर के लिए ही सही, खुद से संवाद करने को विवश हो जाएगा, आप एक तरफ जहाँ चुनौतियों को रेखांकित करते हैं तो वहीँ पर समाधान भी सुझाते हैं, साथ ही व्यवस्था को कटघरे में भी खड़ा करते हैं,
    इन सबके बिच आपकी सहज भाषा शैली है, जिसे पढ़ते हुए पाठक को लगता है मानों किसी नदी की लहर को देख रहा है, जिसके लिए आपको साधुवाद तो बनता ही है.
    शेष फिर …..
    आपका अपना ही
    ऋषिकेश

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