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‘आधे से ज्यादा सिलेबस बाकी है, और आप चाहते हैं मैं कहानी सुनाऊं’

बच्चे, पढ़ना सीखना, बच्चे का शब्द भण्डार कैसे बनता है

बच्चों को कहानी की किताबें पढ़ना और सुनना बहुत अच्छा लगता है।

शिक्षक बहुत कुछ करना चाहते हैं, पर हममें से ज्यादातर लोगों को इस बात पर भरोसा ही नहीं होता। आठवीं तक के एक स्कूल में जहां केवल चार शिक्षक हैं, वे पूरे दिन सारी कक्षाओं को कैसे मैनेज करते होंगे, इसका आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं। अगर आपको यक़ीन नहीं हो रहा हो कि यह एक मुश्किल काम है तो पड़ोस में स्थिति किसी सिंगल टीचर स्कूल में जाकर प्रत्यक्ष अनुभव ले सकते हैं। या किसी सिंगल टीचर स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक से बात कर सकते हैं।

आज एक स्कूल में शिक्षक साथियों से बात हो रही थी कि आप छोटे बच्चों को एक कालांश में कहानी सुना दिया करें ताकि बच्चों को हिंदी भाषा सीखने-समझने में मदद मिल सके। इस अनुरोध पर एक शिक्षक साथी का जवाब था, “आठवीं कक्षा का 70 प्रतिशत से ज्यादा पाठ्यक्रम बाकी है और आप चाहते हैं मैं कहानी सुनाऊं। इस बार आठवीं में बोर्ड की परीक्षा होनी है। परीक्षाएं मार्च में हो रही हैं। इस सत्र में तो यह काम संभव ही नहीं है।”

कहानी का महत्व

कहानी सुनाना कितना जरूरी है? इसका अंदाजा आपको शिक्षक साथी के जवाब से लग गया होगा। ख़ैर उनके इस जवाब के कहानी सुनाने का वास्तविक महत्व कम तो नहीं हो जाता। इसलिए मैंने कहा कि भले ही आप छोटी कक्षाओं को कहानी न सुना सकें। मगर बड़ी कक्षाओं को कहानी की किताबें दो दे ही सकते हैं। इस पर उन्होंने सातवीं कक्षा के बच्चों को किताबें इश्यु करने की जिम्मेदारी स्वीकार की।

बाकी शिक्षक साथियों ने छोटे बच्चों को कहानी सुनाने की जिम्मेदारी ली। ताकि किसी एक शिक्षक के ऊपर विशेष भार न पड़े। मगर बोर्ड की परीक्षाएं होने से बच्चों से ज्यादा दबाव शिक्षकों पर है। हालांकि शिक्षक किसी बच्चे को फेल नहीं कर सकते। मगर बोर्ड की परीक्षाएं हो रही हों तो थोड़ा बहुत डर तो होता ही है। परीक्षाओं के खौफ से न डरना तो हैरान करने वाली बात होगी।

भले ही सिलेबस बाकी है, मगर बच्चों को कहानी सुनने का मौका मिलेगा। यह सुनिश्चित करना भी कम ख़ुशी की बात नहीं है। ऐसे लोग जो चाहते हैं कि स्कूलों में कहानियों और किताबों के लिए जगह बनी और बची रहे। उस दिशा में यह एक छोटी सी कोशिश भर है। आखिर में कहानी सुनाने के क्या फ़ायदे हैं? इस सवाल के जवाब पर एक नज़रः

  • कहानी सुनने से बच्चों में सुनकर समझने की क्षमता का विकास होता है।
  • कहानी पर होने वाली बातचीत से बच्चे चीज़ों को अपने अनुभवों से जोड़कर देख पाते हैं।
  • किसी कहानी के पात्र पर होने वाली चर्चा के माध्यम से बच्चे अपनी प्रतिक्रिया की कल्पना कर पाते हैं कि वे अगर उस जगह होते तो क्या करते?
  • कहानियां सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं होतीं। वे मनोरंजन के साथ-साथ बच्चों को अपनी भाषायी क्षमता के विभिन्न उपयोग के लिए तैयार भी करती हैं। जैसे फ़ैसला लेना, पूर्वानुमान लगाना, किसी परिस्थिति का सामना करना और अचानक से आने वाले किसी सवाल का जवाब खोजना इत्यादि।

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