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बाल-साहित्य में कविताएंः ‘चाहता हूँ देश की जमीन को’

इन दिनों हिंदी बाल कविताओं को पढ़ने का अवसर मिला। कविताओं में सीख, संदेश, उपदेश, आदर्श से इतर ऐसी रचनाओं का आनंद लेना था, जो वाकई बाल मन का प्रतिनिधित्व करती हों। उन कविताओं में बच्चों के स्वर हों। सीमित पुस्तकों और अपनी क्षमताओं के अनुसार मैं पिछले सौ से एक सौ तीस सालों के मध्य की कविताएं पढ़ सका। वे कविताएँ जिन तक मैं पहुँच सका। लगभग 1700 कविताएँ पढ़ने का समय मिला। मुझे हैरानी हुई कि मात्र छह फीसदी कविताएं ही मुझे आनन्द दे सकीं। मैं यह मानता और जानता हूँ कि आनंद की अपनी सीमा है। हर किसी की अपनी मनोवृत्ति भी है।

यह क़तई ज़रूरी नहीं है कि मुझे पसंद आने वाली कविताएँ आपको भी पसंद आएँ। यह भी हुआ कि पढ़ते-पढ़ते मैं कई बार अपना बालमन छोड़कर बड़ापन में आ गया। कभी मुझे लगा कि ये कविता तो बड़ों की कविता है! कभी लगा कि ये कविता बच्चों के लिए हो ही नहीं सकती ! कभी-कभी लगा कि यह कविता तो सभी को अच्छी लगेगी। कभी-कभी ऐसी कविताएं भी आँखों के सामने से गुजरीं जिन्हें पढ़कर मन प्रसन्न हुआ। ऐसी कई कविताएं भी पढ़ने को मिलीं जो बोझिल लगीं। गैर-ज़रूरी लगी। किसी रचना को बोझिल बताने के मेरे अपने कारण हैं। अपनी कमजोरियाँ। कई बार बेहद कठिन शब्दावली ने उचाट पैदा की। कई बार लंबी-लंबी कविताओं ने नीरसता फैला दी। कई बार ऐसा हुआ कि कविता बेहद छोटी थीं पर उसका विस्तार बहुत बड़ा था।

कविताओं की विविधता

कई बार एक ही भाव-बोध की कविताएं सामने आती गईं। लगा, कि यह तो वैसी ही है जैसी अभी-अभी पढ़ी थी। बस किसी में दूध ज़्यादा है तो किसी में चीनी कम। थीं वे चाय हीं। ऐसी कविताएँ जिन्हें मैंने बार-बार पढ़ा है और वे बेहद लोकप्रिय हैं, उन्हें छोड़ना ठीक समझा। छूटी तो वे भी हैं जो मेरी पसंद की श्रेणी में नहीं आईं। लेकिन वे संभव है कि आपकी पसंदीदा कविता हों। समय-समय पर मैंने कई अन्य कविताओं की चर्चा की हैं। उन्हें भी यहाँ छोड़ दिया गया है। बाल-साहित्य प्रकाशित करने वाली पत्रिकाओं नंदन,बालवाणी, बाल भारती,बच्चों का देश, नन्ही दुनिया के कई अंकों की कविताएं पढ़ीं। अंतरजाल पर तो साहित्यिक पत्रिकाओं की बाढ़ आई हुई हैं। उन्हें भी खगाला। कृष्ण शलभ के संपादकत्व में प्रकाशित बचपन एक समंदर की 666 कविताएं भी पढ़ीं। दिविक रमेश के संपादकत्व में प्रकाशित प्रतिनिधि बाल कविता-संचयन की 518 कविताएं भी पढ़ीं।

यह पढ़ने का जो सिलसिला बना, उससे बाल-साहित्य के सन्दर्भ में कुछ आलोचनात्मक या कहूँ समीक्षात्मक लेख बन पड़ेंगे। निकट भविष्य में जिनका मक़सद संभवतः पढ़ने-लिखने की संस्कृति में बाल कविताओं का योगदान, भाषाई कौशलों के विकास में बाल साहित्य की भूमिका, हम, हमारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण और बाल-साहित्य आदि की पड़ताल करना होगा। पढ़ते-पढ़ते कई सारी बातों का बोध हुआ। उन बातों को साझा अवश्य करूंगा। फिलहाल मुझे पढ़ते-पढ़ते पूरी कविता न भी पसंद आई हो पर कविता का कोई अंश मानस पटल पर क्लिक कर गया, तो मैं ठहर गया। उसे फिर पढ़ा। मुस्कराया और आगे बढ़ गया। हाँ। आगे बढ़ने से पहले मैंने उसे रेखांकित अवश्य किया। बस। यहाँ वही अंश दर्ज़ कर रहा हूँ। पूरी कविता तो आप स्वयं तलाशें। रचनाकार का नाम दिया गया है ताकि सजग पाठक उसकी पूरी कविता खोज सकें और पढ़ सकें। यहाँ साझा करने का मात्र मक़सद यह है कि हम इन रचनाकारों को अपने पास मौजूद संग्रहों में तलाशें। उनकी रचनाएं पढ़ें। स्वयं को समृद्ध करें। अंतरजाल में तो अकूत खजाना सार्वजनिक ही है।

कविताओं के समंदर में

बालस्वरूप राही बाल-साहित्य में लोकप्रिय नाम है। उनकी कविताएं बच्चों का प्रतिनिधित्व करती हैं। वे बच्चों का मनोरंजन तो करते ही हैं और कहीं न कहीं हौले से समझ पिरोने वाली कविताएं भी उन्होंने बाल-साहित्य को दी हैं।
एक अंश-
एक रोज़ मुर्गे जी जा कर
कहीं चढ़ा आए कुछ भाँग,
सोचा-चाहे कुछ हो जाए,
आज नहीं देंगे हम बाँग।

‘चाहता हूँ देश की ज़मीन को’

भवानीप्रसाद मिश्र ने निरर्थक शब्दों में भी जान फूंकने का प्रयास किया। उनकी कविताओं में तुलनात्मक चरित्र भी खूब अच्छे लगते हैं। पढ़ते-पढ़ते पूरा रेखाचित्र खींच जाता है।
एक अंश-
अक्कड़-मक्कड़ धूल में धक्कड़,
दोनों मूरख, दोनों अक्खड़
हाट से लौटे,ठाट से लौटे,
एक साथ एक बाट से लौटे।
भवानीप्रसाद मिश्र की अन्य कविता का दूसरा अंश विचारों की बात को सुंदर ढग से कहता है-
चाहता हूँ देश की जमीन को
इंग्लैंड को रूस को चीन को
पूरी दुनिया को चाहता हूँ
पूरे मन से चाहता हूँ

भवानीप्रसाद मिश्र की एक अन्य कविता है जो बालमन के गहरे विमर्श की पड़ताल करती है।
एक अंश-
एक रात होती है
जो रात-भर रोती है
आज हम दोनों को मिला दें
एक बोतल में भरकर
दोनों को हिला दें..!

‘रोटी अगर पेड़ पर लगती’

द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की कविता ‘सुनहरी धूप’ अलहदा अंदाज़ की कविता है। बीस पँक्तियों की यह कविता कहीं भी गर्मी या धूप को औरों की तरह आफत के तौर पर प्रस्तुत नहीं करती। एक अंश-
एक रात भी रह जाए गर वह घर मेरे
कर लूँ अपने मन की उससे दो-दो बातें
कहूँ-गर्मियों में मत गुस्सा किया करो तुम
छोड़ा करो न साथ जब कि जाड़े की रातें।
निरंकारदेव सेवक का बालमन सभी को भाता है। ‘रोटी का पेड़’ एक बालमन की चिंता में पिता का श्रम भी शामिल है। इस तरह की मासूम और संवेदनायुक्त अभिव्यक्ति बालमन की ही हो सकती है-
रोटी अगर पेड़ पर लगती
तोड़-तोड़कर खाते,
तो पापा क्यों गेहूँ लाते
और उन्हें पिसवाते?

श्रीप्रसाद ने कमाल की रचनाएँ बाल-साहित्य को दी हैं। अधिकतर कविताएँ अलग-अलग भाव-बोध की हैं। अलग चित्र प्रस्तुत करती हैं। बालमन की उड़ान भरती कविताएँ नए तरीके का कहन कहती हैं। एक कविता का अंश-

छोटी-छोटी कविताओं में
छोटी-छोटी बातें हैं
छोटा चंदा, छोटे तारे
छोटी-छोटी रातें हैं
श्रीप्रसाद की दूसरी कविता का एक अंश सीधे बालमन की कल्पना को बयां करती है-
कान बड़े होते दोनों ही
दो केले के पत्ते से
तो मैं सुन लेता मामा की
बातें सब कलकत्ते से.

(मनोहर चमोली जी शिक्षा और बाल साहित्य लेखन व अध्ययन में सक्रियता से काम कर रहे हैं। इस लेख के बारे में मनोहर चमोली कहते हैं, “आपके सुझाव की प्रतीक्षा है। किसी को ज़्यादा तरज़ीह देना और किसी को नज़रअंदाज़ करना उद्देश्य नहीं था। मक़सद था कि पढ़ते-पढ़ते ऐसी कौन-सी बात मुझे रोकती है! हैरान करती है! ऐसा क्या मिला कि कविता या कविता की कुछ पँक्तियों को रेखांकित करना बाध्यकारी हो गया? और यह मैंने किया।)

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Manohar Chamoli

virjesh Singh ji जी अभिवादन। यह मेरे लिए बड़ी बात है कि आपने मेरे प्रयासों का यहाँ स्थान दिया। मैंने तो ये रचनाएं यूँ ही बगैर किसी पेशेवर तैयारी और तामझाम के साझा की हैं। आपने इन्हें विस्तार दिया है। यह बड़ी बात है। इसका अर्थ यह हुआ कि मुझे और गंभीरता से इसे करना चाहिए। एक बात जो मेरे मन में है, वह यह है कि हम अपनी-अपनी क्यों हाँके? मैं महसूस करता हूँ कि मेरे समक्ष पहले से ही जानदार,शानदार और असरदार रचनाएँ उपलब्ध हैं। उनका आस्वाद मैं क्यों न लूँ। आत्ममुग्धता से परे हम अपने स्तर पर खुद को भाने वाली रचनाओं का प्रचार-प्रसार करें, बगैर किसी पूर्वाग्रह के। सादर,

Manohar Chamoli

जय शेखर जी अभिवादन। यह मेरे लिए बड़ी बात है कि मैंने तो अपने लिए इन रचनाओं का आनंद लेना चाहा। वेब में यह साझा मेरा प्रयास नहीं है। न ही आग्रह। हम सोचते हैं कि हमारे आस-पास बहुत-सी बेहतरीन रचनाएं हैं। हम उन्हें पढ़ें। सुनाएँ। साहित्य की कई खूबियों में एक खूबी यह भी है कि हर रचना हर पाठक को अलग-अलग स्वाद देती है। आनंद की अनुभूति भी अलग होती है। इन दिनों अपनी बात तो हर कोई कर रहा है मज़ा तो तब है जब मैं आपकी बात कहूं और आप भी सुनें और दूसरे भी। सादर,

Jai Shekhar

बालसाहित्य और कविताएं पढ़ने का सुख ही अलग है।
जैसा आपने लगा कि पढ़ी बहुत, मजा आया, हृदय तक कम ही पहुँची, मुझे लगता है यही साहित्य का अंतः पोषित गुण है।
कब किस बात पर कौन मोहित हो जाए, क्या जाने।
मैंने भी बहुत सी कविताएं इन दिनों पढ़ी जिसमे प्रभात जी के कई कविता संग्रह थे । इसके अलावा कई बाल पत्रिकाओं को भी कविता के लिए पढ़ा।
कभी कभी कविता जो लिखता है, उससे सुनने का आनंद अलग होता है।
कोई ऐसा प्रयास होता की कविताएं सुनने को मिलती अपने मूल रचनाकार द्वारा तो शायद समझ और आनंद बढ़ जाता।

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