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शिक्षक दिवस की चिट्ठी, “प्यारे बच्चों, मैं भी आपसे सीखता हूँ”

प्रिय बच्चों,                                                                                          

शिक्षक दिवस पर आप सभी की शुभकामनाएं, मुझे हमेशा मिलती है। आज मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ। आज मैं आपको अपने बचपन की एक घटना सुनाना चाहता हूँ। उस समय मैं कक्षा 7 में पढ़ता था। तब मैंने अपने विद्यालय की वार्षिक पत्रिका के लिए एक कविता लिखी थी। लेकिन उस समय मेरे भीतर इतना आत्मविश्वास नहीं था कि मैं अपने अध्यापक को वह कविता अपने नाम से दे सकूँ। इस डर और झिझक के कारण मैंने उस कविता के नीचे अपने भाई का नाम लिख दिया। वह कविता स्कूल की पत्रिका में छप भी गई।

आज उस घटना को लगभग 22-23 साल हो चुके हैं। लेकिन जब मैं आप सभी को आत्मविश्वास के साथ लिखते हुए देखता हूँ तो मुझे अपना बचपन याद आ जाता है। सच कहूँ तो उस समय मुझमें इतना आत्मविश्वास नहीं था, जितना आज आप सभी में है। आपके साथ काम करते-करते मुझमें भी आत्मविश्वास लौटा है। पिछले कुछ वर्षों में जब से मैंने आपकी दीवार पत्रिका के लिए संपादकीय लिखना शुरू किया, तो मुझे लगा कि वह लिखने की आदत, जो कहीं खो गई थी, आप सभी की वजह से फिर से जाग गई है।

शिक्षक दिवस के इस मौके पर मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि एक अध्यापक के रूप में जितना मैं आपको सिखाता हूँ, उतना ही मैं आपसे भी सीखता हूँ। आप सभी के साथ मैंने इतनी सुंदर और अच्छी किताबें पढ़ी जिनकी मैंने कभी कल्पना भी नही की थी। आपसे मैंने बहुत कुछ सीखा है। मुझे कबूतरों की “उड़ान” के बारे में, ट्रैक्टरों की कुश्ती के बारे में, तोरई के फूल की सब्ज़ी और खेती-किसानी से जुड़ी बातें, केशु और झांझी आदि बातें आपसे ही पता चलीं।

मैंने आपसे यह भी जाना कि किसानी और मजदूरी काम करना कितना मुश्किल है। कैसे छोटी छोटी आवश्यकता की वस्तुओं को पाने के लिए आप संघर्ष करते हैं। जीवन के तमाम अभावों के बावजूद आप खुश रहते हैं और रोज किसी ना किसी नई बात पर चर्चा करते हैं। अपनी छोटी-छोटी ख़ुशियों और परेशानियों को ईमानदारी से मुझे बता देते हैं।

 

आप सभी बहुत अच्छा डांस करते हैं और गाने भी गाते हैं। मैं खुद न तो डांस कर पाता हूँ और न ही अच्छा गाना गा पाता हूँ, लेकिन जब आपको देखता हूँ तो लगता है कि यह भी एक अद्भुत कला है। आपकी कविताएँ और लेख पढ़कर मैं और अधिक संवेदनशील व्यक्ति बन पा रहा हूँ। पिछले दिनों हम सबने मिलकर कागज़ की टोपी, विंडमिल  और कागज के  पक्षी बनाए। सच कहूँ तो यह भी मुझे पहले नहीं आता था। लेकिन आप सभी के साथ सीखने में मुझे बहुत मज़ा आया । 1 सितम्बर को जब हमने विद्यालय में बारिश में नाव चलाई, तो मेरा बचपन फिर से लौट आया। मैं आपको यह भी बताना चाहता हूँ कि मैंने अपने जीवन में कभी भी अपने स्कूल में नाव नहीं चलाई थी।

प्रिय बच्चों,आप सब अपनी-अपनी क्षमताओं के अनुसार खूब मेहनत कर रहे हो। यह मेरे लिए सबसे बड़ी प्रेरणा है। सीखना कभी रुकता नहीं है — न आपके लिए, न मेरे लिए। मुझे अभी आपसे बहुत सारी अच्छी बातें सीखना बाकी है जैसे- निश्छल और सरल होना ,दयालु होना और अभावों में भी मुस्कराना।  मैं आपसे वादा करता हूँ कि हमेशा आपकी तरह सीखता रहूँगा। आप इसी तरह पढ़ाई, खेल, कला और जीवन के हर क्षेत्र में सतत आगे बढ़ते रहो। आप सभी को ढेर सारा प्यार और आशीर्वाद।

आपका शिक्षक और एक विद्यार्थी

 

अरविंद कुमार सिंह

प्राथमिक विद्यालय बंगला पूठरी ,बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश।

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Anonymous

it’s true …hm bhi baccho s seekhte hai 👌

Anonymous

Lajabab

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