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भाषा शिक्षण

भाषा शिक्षण: प्रवाह के साथ ‘शब्द पठन’ सिखाना क्यों जरूरी है?

एक विद्यालय में बच्चे किताबें पढ़ रहे थे। मैंने एक बच्चे के पास ठहरकर उसके पढ़ने का अवलोकन किया। मैंने देखा कि वह बच्चा किताब को शब्द को पढ़ रहा, मात्रा /इ/, क, त पर ‘बड़ा आ’ की मात्रा ता और इसके बाद उसने बोला किताब। बच्चे के इस तरीके से पढ़ने के अवलोकन से मुझे 2 बातें स्पष्ट तौर पर दिखाई दीं पहली यह की बच्चे वर्णों और मात्राओं के प्रतीकों को अच्छे से पहचान रहे हैं और दूसरी बात- बच्चे वर्णों और मात्राओं को अलग-अलग पढ़ रहे हैं। इसके कारण उनको लिखें हुए शब्दों की डिकोडिंग यानि उच्चारण में इतनी जटिलता का सामना करना पड़ रहा है।

बच्चे कैसे करते हैं शब्द पठन

शिक्षक साथियों के साथ बच्चों के इस तरह से पढ़ने को लेकर बात हुई। उन्होंने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि बच्चे कुछ समय तक ऐसे पढ़ते हैं फिर धीरे-धीरे उनके पढ़ने के तरीके में एक प्रवाह आ जाता है। इसके बाद वे शब्दों को बिना अटके यानि शब्द को शब्द की तरह पढ़ना शुरु कर देते हैं। इसके साथ ही उन्होंने एक बात जोड़ी कि हम बच्चों को वर्णों और मात्राओं के प्रतीक की पहचान तो आसानी से सिखा पा रहे हैं कि लेकिन बच्चे मात्राओं को वर्णों के साथ मिलाकर पढ़ने में चुनौती का सामना कर रहे हैं।

इसके बाद मैंने कक्षा-2 के बच्चों के साथ मात्राओं की पहचान को लेकर डेमो किया। कॉलम में एक तरफ उन वर्णों को लिखा (क, र, न, म, स)  जिनको बच्चे पहले से पहचान रहे थे। दूसरे कॉलम में ऊपर उस मात्रा का प्रतीक लिखा जिसे बच्चों को वर्णों के साथ मिलाकर पढ़ना सिखाना था। वर्ण के उच्चारण के बाद उसमें मात्रा की आवाज को जोड़कर मैंने एक-एक वर्ण की ध्वनि और उसमें मात्रा लगने के बाद आने वाले बदलाव को सहजता के साथ स्पष्ट किया।

यह भी बताया कि मात्रा लगने के कारण किसी वर्ण की ध्वनि में लगने वाली मात्रा के अनुरूप ही बदलाव आता है। यानि मात्रा लगी, तो आवाज बदली और यह बदली हुई आवाज लगी हुई मात्रा की आवाज होगी। ऐसी स्थिति में बड़ी ई. छोटी इ, छोटा उ, बड़ा ऊ बोलने ,से बच्चों को वर्णों को ध्वनि के साथ मिलाने में चुनौती होती है। इसलिए जब हम बच्चों को वर्ण की पहचान करा रहे हैं तभी से वर्णों की ध्वनि और उसके प्रतीक के स्पष्ट संयोजन पर काम करना चाहिए ताकि वर्ण की अच्छी पहचान हो। यही समझ उनको मात्राओं को मिलाकर पढ़ने में भी मदद करती है।

शब्द की ‘पहली ध्वनि’ पहचान पर काम क्यों करें? 

भाषा शिक्षण की वर्तमान पद्धति में वर्णों को रटाने की बजाय ‘पहली आवाज की पहचान पर काम’ करके सिखाया जाता है तो बच्चों के पास एक से ज्यादा शब्दों के विकल्प होते हैं। जैसे मगर, मगन, मटर, मकान, मलाई शब्द में पहली आवाज है /म/ इस बात को बच्चे पहले समझते हैं इसके बाद फिर म के प्रतीक से परिचित होते हैं। इसके साथ ही साथ उन चित्रों से भी जिनकी पहली ध्वनि या पहली आवाज /म/ होती है जैसे मछली, मगर, मकान इत्यादि। अगर ध्वनि की पहचान पर काम के बाद यह काम किया जाए तो मात्राओं को सिखाने के लिए वर्ण की ध्वनि में मात्राओं की ध्वनि मिलाकर पढ़ने का अभ्यास भी आसानी से करवाया जा सकता है।

लेकिन यहाँ पर एक महत्वपूर्ण सवाल है कि जब बच्चे म से मछली चित्र देखकर पहचान लेते हैं तो फिर यह नया तरीका क्यों अपनाया जाए? यह सवाल बहुत से शिक्षक साथी कार्यशालाओं में पूछते हैं। इसका जवाब हो सकता है जब बच्चों को म वर्ण किसी शब्द (उदाहरण के तौर पर मटर शब्द ले लेते हैं) में पढ़ना है और बच्चे म से मछली, ट से टमाटर और र से रस्सी बोलते हैं तो फिर ध्वनियों पर अलग से फोकस नहीं कर पाते और यहीं पर उनको आवाजों को मिलाकर शब्द बनाने यानि ब्लेंडिंग की चुनौती का सामना करना पड़ता है।    

वर्ण और मात्रा, जैसे ‘पानी और चीनी से बना शर्बत’

इस चर्चा के समेकन में कह सकते हैं कि वर्ण और मात्राओं को आपस में पानी और चीनी की भांति अच्छी तरह घुलकर अक्षर (वर्ण और मात्रा का मिला हुआ स्वरूप जैसे मा, मी, मे इत्यादि) का शर्बत बना लेना चाहिए। अच्छा शर्बत वही माना जाता है जिसमें पानी में चीनी अच्छी तरह घुल जाएं और चीनी अलग से न दिखाई दे। इस तरह से पढ़ने से बच्चों के लिए ब्लेंडिंग करना यानि वर्णों व अक्षरों को मिलाकर शब्द पढ़ना सिखाने की राह आसान हो जाएगी।

उदाहरण के तौर पर कोई बच्चा अगर मोर शब्द मिलाकर पढ़ रहा है तो उसके लिए आवाजों के दो ही हिस्से को मिलाना होगा जैसे मो  र – मोर। लेकिन अगर कोई बच्चा मोर शब्द को म खाली, म पर ओ की मात्रा मो, और र बोलकर फिर मोर बोल रहा है तो उसके साथ वर्णों और मात्राओं को मिलाकर पढ़ना क्रमिक ग्रिड और अक्रमिक ग्रिड से सिखाएं। इसके बाद वर्णों व अक्षरों को मिलाकर शब्द को पढ़ने का अभ्यास करवाएं तो बच्चे एक महीने के भीतर पहले बिना मात्रा वाले शब्दों को शब्द की तरह पढ़ने लगते हैं, इसके बाद मात्राओं वाले शब्दों को भी पढ़ने लगते हैं।

मात्रा /आ/ एक कमाल की मात्रा है जिसको सिखाने के बाद आप बहुत से परिचित शब्द बनाने का अभ्यास बच्चों के साथ कर सकते हैं और इसमें बच्चों को बहुत मजा भी आता है जैसे मामा, काका, नाना, चाचा, अगर आप ध्यान से देखें तो यहाँ पर एक ही वर्ण और मात्रा की दो बार पुनरावृत्ति प्रत्येक शब्द में हो रही है इसलिए बच्चों को शब्द बनाने में बहुत ही आसानी होती है। इन शब्दों का बच्चों के परिवेश से भी बहुत गहरा जुड़ाव है, इसलिए भी बच्चे शब्द को शब्द की तरह पढ़ने का आत्मविश्वास शुरुआती दिनों में ही महसूस करने लगते हैं। तो क्या आप भी अपने विद्यालय में बच्चों को शब्द को मिलाकर पढ़ने यानि एक साथ बोलने के लिए काम करने के लिए तैयार हैं?

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