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शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

अफरोज को डाँट नहीं, शिक्षक का भरोसा चाहिए – शालिनी सिंह

एक शिक्षिका के धीरज और अपनेपन ने कक्षा-7 के अफरोज को बदल दिया। जानिए शिक्षक-छात्र रिश्ते में भरोसा बच्चे को सीखने को प्रोत्साहन देता है।

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आमतौर पर स्कूल की चर्चा अक्सर अंकों और परीक्षा परिणाम तक सिमट जाती है। कौन-सा बच्चा कितने अंक लाया, किस कक्षा का परिणाम कैसा रहा, यही हमारी सफलता की सामान्य कसौटी बन गई है।

लेकिन हर कक्षा में कुछ ऐसे बच्चे भी होते हैं, जिनकी असली लड़ाई किताबों से पहले ज़िंदगी से शुरू होती है। उनके लिए समय पर स्कूल पहुँच पाना भी एक उपलब्धि होती है। ऐसे बच्चों को अक्सर “शरारती”, “लापरवाह” या “पढ़ाई में कमज़ोर” कहकर छोड़ दिया जाता है। एक बाल मनोविज्ञान की समझ का इस्तेमाल बच्चों को समझने और उनसे ऐसे सवाल पूछने में कम ही करते हैं। ताकि हम जान सकें कि किसी बच्चे के खास व्यवहार के पीछे कौन-कौन से कारण और परिस्थितियाँ हैं।

एजुकेशन मिरर पर लखनऊ के आदर्श माध्यमिक विद्यालय, जनभवन में सहायक अध्यापक (विज्ञान-JHS) शिक्षिका शालिनी सिंह की यह पहली शिक्षक डायरी है। सबसे ग़ौर करने वाली बात है कि इसमें उन्होंने एक ऐसे बच्चे में बदलाव की प्रक्रिया को दर्ज किया है जिसे शुरुआती दिनों में लिखना भी नहीं आता था। जो अपनी विशेष पारिवारिक परिस्थिति के कारण विद्यालय देर से आता था। लेकिन इस बच्चे पर भरोसे, धैर्य के साथ काम करने और अपनेपन से भरे रिश्ते वे बच्चे के जीवन में बदलाव की रौशनी जला दी।

अफरोज की पारिवारिक पृष्ठभूमि

किसी बच्चे की कॉपी का एक पन्ना देखकर हम अक्सर स्कूल और शिक्षकों के बारे में राय बना लेते हैं। लेकिन हर पन्ने के पीछे एक कहानी होती है। यह कहानी है कक्षा-7 के अफरोज (काल्पनिक नाम) की। कुछ महीने पहले तक अफरोज के लिए कक्षा में अपनी सीट पर टिककर बैठना भी मुश्किल था। दिन भर दूसरों की शिकायत करना, दूसरों का सामान ले लेना और तरह-तरह की शरारतें करना, यही उसकी पहचान बन गई थी।

अफरोज के पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। उसकी माँ का एक ऑपरेशन हुआ है और वे अक्सर बीमार रहती हैं। घर चलाने में हाथ बँटाने के लिए अफरोज एक दुकान पर मैकेनिक का काम सीखने जाता था। वहाँ भी उसे डाँट और मार मिलती थी। घर हो या बाहर, हर जगह उसे डाँट ही सुनने को मिलती थी।

घर पर उसे सुबह जगाने वाला कोई नहीं था। इसलिए वह देर तक सोता रह जाता और रोज़ लगभग एक घंटा देर से स्कूल पहुँचता। जिस बच्चे को हर जगह डाँट ही मिली हो, उसके लिए कक्षा भी शुरुआत में एक और ऐसी ही जगह थी। हमें सबसे पहले यही बदलना था।

बदलाव का दिन

अप्रैल से अक्टूबर तक हम लगातार, धीरज के साथ उससे जुड़े रहे। उसे डाँटने के बजाय समझाने की कोशिश की। उसकी बात सुनी। फिर अर्धवार्षिक परीक्षा के पहले दिन अचानक एक बदलाव दिखा। उस दिन अफरोज समय से पहले स्कूल पहुँच गया था। उस दिन के बाद से वह लगभग हर बात ध्यान से सुनता और मानता है।

आज अफरोज की कॉपी देखकर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ। मुझे लगा कि मेरी मेहनत सफल हो गई। अब उसके मन में नए-नए विचार आते हैं कि कक्षा के काम और अच्छे ढंग से कैसे किए जा सकते हैं। अफरोज ने ख़ुद मुझसे कहा, “मुझे अब तक ऐसे समझाने वाला कोई शिक्षक नहीं मिला था।”

समझाने का तरीक़ा

आज शुक्रवार था और अफरोज को जुमे की नमाज़ के लिए जाना था। इसी बहाने हमने कक्षा के सभी बच्चों से पढ़ाई के महत्त्व पर बात की। हमने बताया कि धर्म हमें कर्म करना सिखाता है। यह बात कभी विस्तार से और कभी कम शब्दों में समझाई। एक शिक्षक के रूप में मेरा अनुभव कहता है कि बच्चे बहुत समझदार होते हैं। अगर हम उन्हें तथ्यों के साथ समझाइए, तो वे बात को सकारात्मक ढंग से, ख़ुशी-ख़ुशी अपना लेते हैं।

आज मैं कक्षा में थी, जब अफरोज अपने दोस्तों से कह रहा था, “ध्यानपूर्वक काम करना चाहिए।” यह सुनकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई। जो शब्द पहले बच्चों को कठिन लगते थे, वे अब उनकी बातचीत में अपने-आप और सहजता से आने लगे हैं।

जब बच्चा कक्षा की भाषा को अपनी रोज़ की बातचीत में बरतने लगे, तो समझिए कि सीखना केवल कॉपी तक सीमित नहीं रहा। वह उसके सोचने और बोलने का हिस्सा बन गया है।

एक शिक्षक को और क्या चाहिए?

इन छह महीनों में अफरोज के भीतर कई बदलाव दिखे। उसमें अपनापन आया। अब उसे भरोसा है कि कोई उसे समझता है। उसमें आत्मनिर्भरता आई, यानी अपना काम ख़ुद से करने का विश्वास। वह अपनी मुश्किलों का हल ख़ुद ढूँढना सीख रहा है। वह सोचना सीख रहा है और ख़ुश रहने लगा है। सबसे सुंदर बदलाव सच बोलने में दिखा। एक दिन अफरोज ख़ुद मेरे पास आया और बोला, “मैम, दो पेज हमने अप्पी (बड़ी बहन) से लिखवाए हैं। देखिए, हम आपसे झूठ नहीं बोल रहे, ख़ुद आकर बता रहे हैं।”

एक शिक्षक को और क्या चाहिए, जब उसकी कक्षा में देश का एक ज़िम्मेदार नागरिक तैयार हो रहा है। अफरोज की कहानी हमें याद दिलाती है कि सीखने की शुरुआत पाठ्यपुस्तक से नहीं, रिश्ते से होती है। जब बच्चे को लगता है कि कक्षा में उसे सुना और समझा जाता है, तो वह धीरे-धीरे अपने व्यवहार, अपनी आदतों और अपनी पढ़ाई की ज़िम्मेदारी ख़ुद लेने लगता है।

अफरोज का समय पर स्कूल आना, कॉपी में मन लगाकर लिखना, नए शब्दों को अपनी बोली में अपनाना और अपनी ग़लती ख़ुद आकर स्वीकार करना छोटी बातें लग सकती हैं। पर ये सब बदलाव भीतर से आए हैं। ऐसे बदलाव ही टिकते हैं।

हर विद्यालय में कोई न कोई अफरोज जरूर होता है, जिसकी कहानी उसकी कॉपी के पन्नों के पीछे छिपी रहती है। ज़रूरत है कि हम उस कहानी को पढ़ने का धीरज रखें। हमें बच्चे को उसकी परिस्थितियों के साथ देखना होगा और उस पर भरोसा बनाए रखना होगा। तब बदलाव भले देर से आए, पर आता ज़रूर है। बतौर शिक्षक अपने सैकड़ों अनुभवों में से पहली बार किसी अनुभव को मैंने लिखने का फैसला किया। अपने इस फैसले पर मुझे आज मुझे गर्व है कि मैं अफरोज की कहानी आप सबको बता रही हूँ।

(लेखक परिचय: शालिनी सिंह लखनऊ के आदर्श माध्यमिक विद्यालय, जनभवन में सहायक अध्यापक (विज्ञान – JHS) की भूमिका में काम कर रही हैं। उनका विश्वास है कि हर बच्चा सीख सकता है, बस उसे समझने और उस पर भरोसा करने वाला चाहिए। एक छात्र के भीतर होने वाला बदलाव एक शिक्षक को प्रेरित करता है। आपका इस अनुभव को शब्द देना और उसे लिखना इस बात का प्रमाण है।)

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