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47 + 36 = 713 क्यों लिखते हैं बच्चे?

इस लेख में हम बच्चों द्वारा जोड़ के सवालों को हल करते समय होने वाली सामान्य गलतियों या भूल का विश्लेषण करेंगे। इसका मुख्य उद्देश्य गलतियों के मूल कारण को समझना और कक्षा-कक्ष में शिक्षण अधिगम की प्रक्रिया में जरूरी बदलाव करके उसका समाधान करना है। इस विश्लेषण को गहराई देने के लिए शोध सामग्री के साथ-साथ बच्चों के साथ काम करने के प्रत्यक्ष अनुभवों का भी सहारा लिया गया है। 

इस लेख का पार्ट-1 पढ़ें – जोड़ के सवाल: ‘गलतियों के पैटर्न’ का प्रभावी शिक्षण में कैसे इस्तेमाल करें?

बच्चों की गलतियां बेतरतीब नहीं, उनमें एक पैटर्न है 

अपनी कॉपी में जोड़ का सवाल हल करते समय एक बच्चा लिखता है, 28 + 15 = 313। हमें पहली नज़र में यह उत्तर बेतुका लग सकता है। लेकिन पूछने पर वह बताता है: “8 और 5 मिलकर 13, 2 और 1 मिलकर 3।” उसकी दोनों गणनाएँ सही हैं। छूटा केवल एक विचार है: 13 इकाइयाँ इकाई के स्थान पर नहीं रह सकतीं; उनमें से 10 मिलकर 1 दहाई बनती हैं। मुझे कक्षा 2 की कॉपियों में गलतियों का यही पैटर्न/नियम बार-बार दिखा: 47 + 36 = “7 13”, 58 + 27 = “7 15”, 65 + 28 = “8 13”, 39 + 45 = “7 14”। चार सवाल, एक ही पैटर्न या नियम की बार-बार पुनरावृत्ति।

इस थीम पर एक शोध पत्र पढ़ने के दौरान पता चला कि गणित शिक्षा के शोध में यह बात बहुत पहले दर्ज हो चुकी है। ब्राउन और बर्टन (1978) ने एक बच्चे का उदाहरण दिया, जो साल के बड़े हिस्से तक 365 + 574 = 819 जैसे उत्तर लिखता रहा और शिक्षक उन्हें बेतरतीब मानते रहे। असल में उसका नियम एक ही था: जिस कॉलम का योग 10 या उससे अधिक हो, वहाँ हासिल का अंक लिखो और इकाई छोड़ दो। लेखकों के अनुसार बच्चे प्रक्रिया को बड़ी लगन से अपनाते हैं, बस कई बार प्रक्रिया ही गलत होती है।

सीख: “गलत है, दोबारा करो” कहने पर बच्चा वही नियम दोबारा लगाएगा। इसलिए पहले बच्चे की गलती का पैटर्न या नियम पहचानें, फिर उसके लिए उचित समाधान की रणनीति चुनें।

जोड़ के दौरान ध्यान रखने वाली तीन बातें

दो अंकों का जोड़ देखने में तो आसान दिखता है, पर उसके लिए बच्चे को तीन बातें एक साथ देखनी होती हैं:

1. किसी अंक का मूल्य उसके स्थानीय मान से तय होता है: 25 में 2 का अर्थ “दो” नहीं, “बीस” है।

2. दस पर समूह बनता है: हर स्थान पर 0 से 9 तक ही अंक आते हैं। 10 होते ही समूह बनकर अगले स्थान पर जाता है। हासिल इसी नियम का लिखित रूप है।

3. गणना की दिशा: बच्चे बाएँ से दाएँ पढ़ना सीखते हैं, इसलिए दहाई से जोड़ना शुरू करना उन्हें स्वाभाविक लगता है। बिना हासिल वाले सवालों में यह तरीका सही उत्तर भी देता है, इसलिए गलती तभी पकड़ में आती है जब हासिल आता है।

हासिल में मिली छोटी संख्या 1, वास्तव में 10 है

  • कक्षा में हम कहते हैं (उदाहरण: 29 + 14): “9 और 4 को जोड़ने पर 13 आया, 3 लिखो, 1 हासिल ले लो।” बच्चा दहाई के ऊपर छोटा-सा 1 लिख देता है।
  • पर यह 1 वास्तव में “एक” नहीं, एक दहाई यानी दस है।
  • जब तक बच्चा यह नहीं देखता, हासिल उसके लिए एक नियम रहता है जिसे याद रखना है, समझना नहीं।
  • इसीलिए कुछ बच्चे हासिल लिखकर भी उसे जोड़ना भूल जाते हैं (58 + 27 = 75), और कुछ उसे लिखते ही नहीं (65 + 28 = 83)।

समाधान: “हासिल” शब्द का अर्थ बोलकर स्पष्ट करें: “13 इकाइयों में से 10 का एक बंडल बना, वह दहाई में गया।” “एक संख्या के कई नाम” वाली गतिविधि (13 = 1 दहाई 3 इकाई; 83 = 7 दहाई 13 इकाई = 8 दहाई 3 इकाई) इस समझ की असली नींव है।

शाब्दिक सवाल: जोड़ की चार स्थितियाँ

किसी बच्चे के लिए “जोड़ें या घटाएँ?” वाली उलझन इसलिए होती है क्योंकि जोड़ का हर सवाल एक जैसा नहीं होता। इसको नीचे दिए गए चित्र के माध्यम से समझते हैं – 

मानक विधि से पहले: बच्चों की अपनी रणनीतियाँ

47 + 36 को हल करने के कई सही रास्ते हैं, और हर रास्ता संख्या की एक अलग समझ को मज़बूत करता है।

  • पहली रणनीति “7 13” वाली गलती का सीधा समाधान है। बच्चा देखता है कि 70 और 13 मिलकर 83 बनते हैं, और फिर समझ पाता है कि मानक विधि का छोटा 1 इसी 13 में छिपी दहाई है।
  • शोध (कामी और डोमिनिक, 1998; फ़्यूसन, 1990) बताता है कि मानक विधि बहुत जल्दी सिखाने से स्थानीय मान की समझ कमज़ोर रह सकती है।
  • इसका अर्थ मानक विधि को छोड़ना नहीं, उसे सही समय पर लाना है: जब बच्चा उसे अपनी रणनीतियों के छोटे रूप में पहचान सके।

यहाँ एक अनुभव जोड़ना जरूरी है। एक प्रशिक्षण के दौरान मैंने 47 + 36 = 713 वाली गलती का उदाहरण लिया। शिक्षकों को यह बात स्पष्टता के साथ समझ में आ गई कि यहाँ पर इकाई को जोड़ने के बाद बनने वाली संख्या को ज्यों का त्यों लिख दिया गया है, इकाई से मिलकर बनने वाली दहाई को दहाई में अलग से नहीं जोड़ा गया है। इसी प्रश्न को ठोस सामग्री, 10 के बंडल और खुली तीलियों के माध्यम से करने का मौका देने पर उनका जवाब था कि इस तरीके से सिखाने पर तो 713 बनेगा ही नहीं।

चित्र : 47 + 36 को बंडल (दहाई) और खुली तीलियों (इकाई) से हल करना

एक शिक्षक साथी ने डेमो करते हुए पहले दहाइयों (4 बंडल और 3 बंडल मिलकर हो गए 7 बंडल यानि 70) को जोड़ा, फिर शेष इकाइयों (7 और 6) को जोड़कर 13 यानि एक दहाई (10) और खुली तीली (3) के रूप में अलग किया। आखिर में 7 बंडल में 1 और बंडल मिलाकर 80 बनाया और तीन खुली तीलियों को मिलाकर कुल उत्तर 83 बताया। इस प्रक्रिया में पुनर्समूहन की अवधारणा बेहद स्पष्टता के साथ शिक्षकों को समझ में आई।

जोड़ की ‘समझ जाँचने के लिए’ 8 सवाल

  • एक सवाल पर्याप्त नहीं: अलग-अलग गलत नियम कभी-कभी एक जैसा उत्तर दे देते हैं, और गलत नियम वाला बच्चा भी कुछ सवाल सही कर लेता है। इसलिए हर प्रकार के लिए कम से कम दो सवाल रखें।
  • सही जवाब वाले अंक नहीं, गलती का प्रकार दर्ज करें: ब्राउन और बर्टन के आँकड़ों में 107 बच्चों ने केवल एक गलती के कारण 15 में से 6 सवाल गलत किए थे। उन्हें “60%” देना उनकी समझ का सही आकलन नहीं है।
  • दो-तीन सवालों पर पूछें: “तुमने यह कैसे किया?”

ब्राउन और बर्टन के शोध से क्या सीख सकते हैं? 

ब्राउन और बर्टन ने शिक्षकों के साथ एक खेल खेला, जिसमें कंप्यूटर “गलती करने वाला बच्चा” बनता था और शिक्षक उसका नियम या पैटर्न खोजते थे। इससे पता चला कि गलती पहचानने में शिक्षक भी चूकते हैं:

आखिर में हम कह सकते हैं कि जोड़ की गलतियाँ किसी बच्चे की कमज़ोरी का प्रमाण नहीं, उसके सोचने के तरीके को समझने का एक माध्यम हैं। 47 + 36 = 7 13 लिखने वाला बच्चा बता रहा है कि उसे जोड़ के तथ्य आते हैं, दहाई और इकाई अलग-अलग जोड़ना आता है, और उसकी अगली ज़रूरत है 10 इकाइयों को 1 दहाई के रूप में देखना। पर हर गलती के पीछे पक्का नियम नहीं होता। कुछ बच्चों को एक नियम पर काम चाहिए, कुछ को पूरी प्रक्रिया दोबारा। सही समाधान तभी संभव है जब शिक्षक पहले गलती को पहचाने, फिर ठोस सामग्री, बच्चों की अपनी रणनीतियों और सही सवालों से आगे बढ़े। अगली बार कोई बच्चा गलत उत्तर लिखे, तो रुकिए और जिज्ञासा के साथ पूछिए: “तुमने यह सवाल कैसे हल किया?”

संदर्भ

  1. Brown, J. S., & Burton, R. R. (1978). Diagnostic models for procedural bugs in basic mathematical skills. Cognitive Science, 2(2), 155–192.
  2. Carpenter, T. P., Fennema, E., Franke, M. L., Levi, L., & Empson, S. B. (2014). Children’s Mathematics: Cognitively Guided Instruction (2nd ed.). Heinemann.
  3. Fuson, K. C. (1990). Conceptual structures for multiunit numbers: Implications for learning and teaching multidigit addition, subtraction, and place value. Cognition and Instruction, 7(4), 343–403.
  4. Kamii, C., & Dominick, A. (1998). The harmful effects of algorithms in grades 1–4. In L. J. Morrow & M. J. Kenney (Eds.), The Teaching and Learning of Algorithms in School Mathematics (1998 Yearbook). NCTM.
  5. Ministry of Education, Government of India. (2021). NIPUN Bharat: Guidelines for Implementation.
  6. NCERT. (2022). National Curriculum Framework for Foundational Stage.

(लेखक परिचय: वृजेश सिंह पिछले एक दशक से अधिक समय से शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत हैं। उन्हें बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मकता (FLN) और पुस्तकालय कार्यक्रम को बड़े स्तर पर क्रियान्वयन और नेतृत्व करने का गहन अनुभव है। शिक्षा क्षेत्र के अनुभवों को कक्षा-कक्ष में लागू किए जा सकने वाले व्यावहारिक विचारों में ढालना उनके काम की एक विशेष पहचान है। उन्होंने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ (TISS), मुंबई से प्रारंभिक शिक्षा में स्नातकोत्तर किया है।)

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