
मुझे राजस्थान के जयपुर जिले के एक प्राथमिक विद्यालय में काम करते हुए मेरे तीन वर्ष पूरे हो गए हैं। ये तीन वर्ष मेरे लिए केवल नौकरी के वर्ष नहीं रहे। ये मेरे लिए सीखने, सिखाने और स्वयं को बेहतर बनाने की एक सुंदर यात्रा रही है।
इन वर्षों में मैंने बहुत कुछ ऐसा सीखा जो किताबों से सीखना संभव नहीं था। बहुत से लोगों से मिली, सबके साथ मिलकर काम किया और ढेर सारी यादें इकट्ठी कीं। इस यात्रा में कुछ लोग ऐसे भी मिले जो अब जीवन का एक बेहतरीन हिस्सा बन गए हैं। शायद इसीलिए कहा जाता है कि नौकरी सिर्फ़ अच्छी तनख़्वाह ही नहीं देती, अच्छे दोस्त भी देती है।
पर इन सबमें जो मुझे सबसे अनमोल मिला, वह है मेरे स्कूल के बच्चे। या यूँ कहूँ, मेरे बच्चे।
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कभी सोचा न था कि ये इतने अपने हो जाएँगे
जब पहली बार विद्यालय के बच्चों से मिली थी, तो मन में सवाल था, “मैं इनके साथ तालमेल कैसे बैठा पाऊँगी? इन्हें कैसे समझ पाऊँगी?” आज हाल यह है कि हमें एक-दूसरे को समझने के लिए शब्दों की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।
इन बच्चों से इतना अपनापन हो गया है कि दो दिन से ज़्यादा की छुट्टी हो जाए तो इनकी याद आने लगती है। इनका साथ अब आदत बन चुका है।
रोज़ सुबह जब मैं स्कूल पहुँचती हूँ, तो बच्चों की एक ही पंक्ति होती है: “मैम, आज आप बहुत सुंदर लग रही हो!” यही पंक्ति मेरे लिए दुनिया की सबसे अच्छी तारीफ़ बन जाती है।
मेरे लिए बच्चों को पढ़ाना सिर्फ़ एक काम नहीं है। यह एक बहुत प्यारा एहसास है।
हर बच्चा अपनी अलग दुनिया लेकर आता है
पढ़ाते हुए मैंने महसूस किया कि हर बच्चा कक्षा में अपनी अलग क्षमता, रुचि और प्रतिभा लेकर आता है। इसलिए हमें हर बच्चे को खुद को अभिव्यक्त करने का पूरा अवसर देना चाहिए।

बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते मैंने उनसे भी बहुत कुछ सीखा। उनसे सीखी सबसे प्यारी बात यह है, “परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, हमारे चेहरे की मुस्कान कम नहीं होनी चाहिए।”
अपने सहकर्मियों से भी मैंने बहुत कुछ सीखा। मैंने टीम के साथ मिलकर काम करना, विद्यालय की ज़िम्मेदारियाँ निभाना और नई परिस्थितियों में स्वयं को ढालना सीखा।
इन तीन वर्षों की सबसे बड़ी सीख
इन तीन वर्षों ने मुझे ज़िम्मेदार और आत्मविश्वासी बनाया है। सबसे बड़ी बात यह है कि इन्होंने मुझे अपने काम से प्यार करना सिखाया है, क्योंकि काम चाहे कोई भी हो, सबसे ज़रूरी है कि हम उससे प्यार करें।

एक शिक्षक होने के नाते हमारा काम केवल पाठ्यक्रम पूरा करवाना नहीं है। बच्चों के व्यक्तित्व और भविष्य को आकार देना भी हमारी महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी है।
मैं अपने सभी सहकर्मियों, विद्यार्थियों और अभिभावकों का हृदय से आभार व्यक्त करती हूँ, जिन्होंने मेरी इस यात्रा को यादगार बनाया। आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद!— अंजली
(परिचय: अंजली बुनकर, पिछले तीन वर्षों से राजस्थान के जयपुर जिले के गाँव में स्थित सरकारी विद्यालय में बतौर शिक्षक काम कर रही हैं। बच्चों के अभिभावकों का भरोसा आपको प्रोत्साहित करता है। कक्षा-कक्ष में बच्चों के सीखने के अनूकूल माहौल बनाना और विभिन्न शिक्षण सामग्री (TLM) का उपयोग करके हुए सीखने की प्रक्रिया को आनंददायी बनाना बच्चों के सीखने को लेकर आपकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।)
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