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‘क्लासरूम में अनुशासन से ज्यादा जरूरी है, बच्चों से जुड़ाव’ – अंजली

राजस्थान के जयपुर जिले में स्थित एक सरकारी विद्यालय में पढ़ाने वाली शिक्षिका अंजली को प्राथमिक स्तर के बच्चों के साथ शिक्षण करना और उनके सीखने की प्रक्रिया में अपने शिक्षण में बदलाव करना बेहद पसंद है। एजुकेशन मिरर के साथ उन्होंने अपनी इस यात्रा को साझा किया है।

उनका मानना है कि छोटे बच्चों को पढ़ाना अपने आप में एक रोचक अनुभव होता है। हमें रोज बच्चों से नई-नई चीजें सीखने को मिलती हैं। मैंने बच्चों से जो सबसे अच्छी चीज सीखी है, वह है, “‘चाहे जो भी हो जाए, जीवन की कैसी भी परिस्थिति हो, हमें कभी भी अपने चेहरे की मुस्कुराहट को खोने नहीं देना है।” शायद इसी संदर्भ में एक बात कही गई है कि जिसकी मस्ती जिन्दा है, उसी की हस्ती जिंदा है।

‘अनुशासन से ज्यादा जरूरी है, बच्चों से जुड़ाव’

मुझे अपनी कक्षा में बहुत अनुशासन से पढ़ाना पसंद है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों के अनुभव से अब मैं यह कह सकती हूँ कि छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए अनुशासन से ज्यादा, उनको अपने आप से जोड़कर रखना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

इस विचार तो वास्तविकता के धरातल पर लाने के लिए मैंने छोटे-छोटे प्रयास शुरू किए जैसे मैं बच्चों को उनके साथ बैठकर पढ़ाने लगी। जब मैंने ऐसा किया तो पाया कि बच्चे अब मेरे साथ बहुत ज्यादा सहज महसूस कर रहे हैं। वे हँस रहे हैं, पढ़ रहे हैं और मेरे साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हैं मानो मैं उनके घर की एक सदस्य हूँ। इस अनुभव से मेरे सोचने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया और मुझे एक गहरी बात समझ में आयी कि बच्चों से जुड़ने के लिए, अपनी कुर्सी तो छोड़नी पड़ेगी।

प्रखर राजस्थान-2.0 के रोचक अनुभव

आजकल मैं प्रखर राजस्थान- 2.0 के तहत बच्चों के साथ वर्णों/मात्राओं की पहचान और उसके उच्चारण पर काम कर रही हूँ। इसके लिए मैं सहायक सामग्री जैसे फ्लैश कार्ड्स, वर्ण चकरी, चित्र कार्ड, पुस्तकालय की किताबों के साथ ही हाव-भाव और एक्शन से बच्चों को कविताएं और कहानियां सुनाने का काम कर रही हूँ। ताकि बच्चों में पढ़ने और सीखने की ललक का स्वाभाविक रूप से विकास हो सके।

कहानियाँ सुनाने के बाद मैं अपनी कक्षा में बच्चों से विभिन्न सवालों पर चर्चा भी करती हूँ। ऐसी चर्चाओं के दौरान कभी-कभी मुझे ऐसे जवाब मिलते हैं, जिसकी मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकती। संक्षेप में कह सकती हूँ कि बच्चों के विचार व चिंतन का दायरा हमारी सोच से भी कहीं ज्यादा विस्तृत होता है।

‘आपको कौन सा रंग पसंद है?’

इसका एक उदाहरण आपके साथ साझा है – एक दिन मैंने अपनी कक्षा में बच्चों से सवाल किया कि आप लोगों को कौन-कौन सा रंग पसंद है? सबकी पसंद अलग-अलग थी, किसी ने कहा लाल, किसी ने गुलाबी तो किसी ने कहा कि उसे हरा रंग बहुत पसंद है।

एक बच्चा बोला, “मैम जब दुनिया में इतने सारे रंग होते हैं तो फिर हम सिर्फ केवल एक ही रंग क्यों पसंद करें? क्या सारे रंग हमारी मन की पसंद नहीं हो सकते?

बच्चे की यह पंक्ति मुझे सच में बहुत अच्छी लगी और मैंने पाया कि बच्चे सच में बहुत अलग और मौलिक ढंग से सोचते हैं। शिक्षक होने के नाते केवल हम ही बच्चों को सिखाते हैं, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। वास्तव में हम भी बच्चों से बहुत कुछ सीख सकते हैं। बच्चों को हँसने, रोने, बोलने, गाने और यहाँ तक कि शोर मचाने का भी मौका देना चाहिए। क्योंकि हम बच्चों के रूप में इंसानों को पढ़ाते हैं, मशीनों को नहीं।

(परिचय: अंजली बुनकर, लगभग दो वर्षों से राजस्थान के जयपुर जिले के गाँव में स्थित सरकारी विद्यालय में बतौर शिक्षक काम कर रही हैं। बच्चों के अभिभावकों का भरोसा आपको प्रोत्साहित करता है। कक्षा-कक्ष में बच्चों के सीखने के अनूकूल माहौल बनाना और विभिन्न शिक्षण सामग्री (TLM) का उपयोग करके हुए सीखने की प्रक्रिया को आनंददायी बनाना बच्चों के सीखने को लेकर आपकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।)

(आप एजुकेशन मिरर से फ़ेसबुकएक्स और यूट्यूब पर जुड़ सकते हैं। रेगुलर अपडेट के लिए हमारे  WhatsApp चैनल को फॉलो करें। आप अपने लेख हमें ईमेल कर सकते हैं educationmirrors@gmail.com पर।)

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Anonymous
Anonymous
10 months ago

Very nice work maam🤩

Durga
Durga
10 months ago

शानदार लेख
Maam को बहुत बहुत बधाई 💐💐💐
शिक्षकों को बच्चों से जुड़ना बहुत जरूरी है , जुड़ाव और लगाव संजीवनी की तरह कार्य करते है , जो हर समस्या का हल ढूंढने में कारगार है । बच्चों की मुस्कुराहट हमें जीवंत रहना सीखती है ।

जय शेखर
जय शेखर
10 months ago

बहुत अच्छा निरीक्षण है ख़ास करके कुर्सी छोड़कर बच्चों के साथ उनके बीच बैठना. इसके साथ ही बच्चे का यह कहना कि मैं एक ही रंग क्यों पसंद करूँ? यह दर्शाता है कि कक्षा का माहौल कितना भय-रहित और सौहार्द पूर्ण है. अंजली जी को बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएँ! – जय शेखर, शिक्षक, प्राथमिक विद्यालय, उत्तर प्रदेश।

Anonymous
Anonymous
10 months ago

GOOD

Anonymous
Anonymous
10 months ago

सच में सिस्टर बहुत अच्छी थिकिंग हैं आपकी और शिक्षा में बदलाव के प्रयास का यह रोचक तरीका वो भी सरकारी स्कूलो में काफी सराहनीय हैं,,, आप जैसे टीचर्स रहे तो सरकारी स्कूलो की कंडीशन भी अच्छी होगी,,सच कहा बच्चों का भविष्य अध्यापक के हाथ में है, आपका यह पहला लेख काफ़ी प्रशंसनीय है

बहुत खुशी हुई 😊

Anonymous
Anonymous
10 months ago

बढ़िया लिखा है और कुर्सी छोड़ने वाला अनुभव बहुत प्रभावशाली है. विस्तृत वार्तालाप और बच्चों को बोलने के अधिक से अधिक अवसर देना महत्वपूर्ण और बच्चे का यह कहना की एक ही रंग ही क्यों पसंदीदा हो? यह भी बताता है कि कक्षा का माहौल कितना सौहार्द पूर्ण और भय रहित है .

Anonymous
Anonymous
10 months ago

मैं इस बात से सहमत हूँ कि बच्चों को पढ़ने के लिए कुर्सी को छोड़ना पड़ेगा । आप का काम सराहनीय है ।

Anonymous
Anonymous
10 months ago

Bahut acha kaam kr rhi ho aap ase hi aage badti rho

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